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साहित्यिक सिनेमा से मोहभंग

Posted On August - 17 - 2019

असीम चक्रवर्ती

चार्ल्स डिकेन्स के ‘द ग्रेट एक्सपेक्टेशन’ पर बनी फिल्म ‘फितूर’ से बुरी तरह हाथ जला बैठे निर्देशक अभिषेक कपूर की नज़र अब फिर साहित्यिक रचनाओं पर है। वैसे इसके बाद की उनकी फिल्म केदारनाथ भी फ्लॉप थी। वैसे यहां यह बताना ज़रूरी है कि उनकी पूर्व फिल्म ‘फितूर’ की हीरोइन कटरीना कैफ को चार्ल्स डिकेन्स का ‘द ग्रेट एक्सपेक्टेशन’ बहुत पसंद था। उन्होंने कई बार इस सिलसिले में कहा था कि वह उपन्यास पर बनने वाली फिल्म पर काम करना चाहती थीं। पूर्व में चेतन भगत के लोकप्रिय उपन्यास ‘द थ्री मिस्टेक्स ऑफ माई लाइफ’ पर फिल्म ‘काई पो छे’ बना चुके निर्देशक अभिषेक कपूर इस फिल्म की बेहतर स्क्रिप्टिंग के लिए हमेशा सराहे गये। लेकिन तब कैट ने उन्हें भी इसकी स्क्रिप्टिंग के लिए खूब दौड़ाया था। लेकिन इस फिल्म का जो हश्र हुआ, वह सबको मालूम है।

‘जज्बा’ अंग्रेज़ी नॉवेल पर बेस्ड थी
ऐश्वर्या और इरफान की ‘जज्बा’ भी एक अंग्रेजी नॉवेल पर बेस्ड थी। वैसे जज्बा के निर्देशक संजय गुप्ता की पिछली फिल्म ‘शूटआउट एट वडाला’ एस. हुसैन जैदी की किताब ‘डोंगरी टु दुबई’ पर बनी थी। लेकिन इन सबके बीच सबसे ज्यादा चेतन भगत की मांग है। उनके लगभग सभी नॉवेल पर फिल्में बन चुकी हैं। उनकी नॉवेल ‘हाफ गर्लफ्रेंड’ पर मोहित सूरी, एकता कपूर ने फिल्म बनाई, लेकिन वह पिट गई। पर उनकी पिछली फिल्म ‘टू स्टेट्स’ ने सौ करोड़ से ज्यादा का बिजनेस किया था। दूसरी तरफ नये दौर के निर्देशक दिबाकर बनर्जी की फिल्म ‘ब्योमकेश बख्शी’, सत्यजित रे की कुछ शॉर्ट स्टोरी पर आधारित थी। चंद्रप्रकाश द्विवेदी की ‘अस्सी मोहल्ला’ साहित्यकार डॉक्टर केदार नाथ सिंह के उपन्यास ‘काशी का अस्सी’ पर बेस्ड थी। आमिर की फिल्म ‘ठग्स ऑफ हिन्दुस्तान’ भी फिलिप मिडोज टेलर की लिखी किताब ‘कॉनफेशन ऑफ ठग’ पर बेस्ड थी।

हिट की कोई गारंटी नहीं
देखा जाये तो लोकप्रिय और साहित्यिक किताबों पर अचानक निर्माताओं का ध्यान गया है। वैसे बेस्टसेलर किताब पर बनने वाली फिल्म भी हिट होगी, इसकी कोई गारंटी नहीं है। हाल-फिलहाल की कुछ फिल्मों पर बात करें, तो कुछ साल पहले आयी रॅस्किन बॉन्ड के अंग्रेजी उपन्यास पर आधारित विशाल भारद्वाज की फिल्म ‘सात खून माफ’ का हश्र बुरा हुआ था। विशाल तो चर्चित कृतियों पर फिल्म बनाने के लिए बेहद मशहूर हैं। उनकी ‘ओमकारा’-ओथेलो, ‘मकबूल’-मेकबेथ और ‘हैदर’-हेमलेट पर बेस्ड थी। मानिनी चटर्जी के चर्चित अंग्रेज़ी उपन्यास ‘डू ओर डाई’ पर आधारित आशुतोष गोवारिकर की हिंदी फिल्म ‘खेलेंगे जी जान’ से नहीं चली, लेकिन यह एक अच्छी फिल्म थी।
पढ़ने और देखने का फर्क
प्रसिद्ध फिल्मकार महेश भट्ट, जो अमूमन किसी किताब या साहित्य पर कम ही फिल्में बनाते हैं, इसका पूरा दोष अच्छी स्क्रिप्ट पर मढ़ते हैं। वे कहते हैं, ‘हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि पढ़ने और देखने में एक बड़ा फर्क होता है। कई ऐसी किताबें हैं, जो मुझे बहुत पठनीय और रोचक लगीं, मगर उन पर फिल्म बनाने का ख्याल मुझे कभी नहीं आया। वजह साफ है, इन पर फिल्म बनाते समय इनकी स्क्रिप्ट में मुझे बहुत परिवर्तन करना पड़ेगा। यह बात शायद मूल लेखक को पसंद न आये।’ काफी हद तक यह बात सही है। ऐसे ढेरों विवाद हैं, जिसमें किसी लेखक ने फिल्मकार पर उसकी कृति को कचरा बना देने का आरोप लगाया। इसकी एक अच्छी मिसाल राजकुमार हिरानी की सुपर हिट फिल्म ‘थ्री इडियट्स’ बनी थी। अंग्रेजी लेखक चेतन भगत के अत्यंत चर्चित उपन्यास ‘फाइव प्वायंट्स समवन’ पर यह फिल्म बनी थी।
फिल्म के प्रदर्शन के बाद इसके मूल लेखक चेतन भगत ने इसके निर्माताओं पर खुलेआम यह आरोप लगाया था कि उन्होंने न सिर्फ इसमें ज़बरदस्त परिवर्तन किया, बल्कि उन्हें पूरा क्रेडिट भी नहीं दिया।

स्क्रिप्ट की चुनौती
स्वर्गीय शक्ति सामंत ने ‘आराधना’, ‘अमर प्रेम’, ‘अमानुष’, ‘आनंद’, और ‘आश्रम’ जैसी कई उम्दा फिल्में दर्शकों को दी हैं। ‘आराधना’ के बाद उन्होंने पूरी तरह से अपनी दिशा बदल ली थी। वह अपनी फिल्मों के लिए बंगाल के साहित्य पर कुछ ज्यादा आश्रित हो गये थे। वे सफल भी खूब हुए क्योंकि वह इन फिल्मों की स्क्रिप्ट पर ज़रूरत से ज्यादा ध्यान देते थे। वह इसके लिए अक्सर प्रसिद्ध साहित्यकार कमलेश्वर की मदद लेते थे।
वैसे शक्ति दा से इतर देखें तो बिमल राय, ऋषि दा जैसे धाकड़ फिल्मकार फिल्म की स्क्रिप्ट में तमाम योगदान देने के बावजूद अपनी फिल्म की स्क्रिप्ट लेखन से हमेशा दूर रहते थे। इस मामले में इन्होंने बराबर इसी क्षेत्र के गुणी व्यक्ति पर भरोसा किया। सभी जानते हैं कि पुनर्जन्म पर आधारित उनकी एक बहुत उम्दा फिल्म ‘मधुमति’ की स्क्रिप्ट ऋत्विक घटक ने लिखी थी। खैर, अभी कुछ साल पहले ऋत्विक घटक के सहायक ऋषि जेना ने प्रेमंचद की कहानी ‘कफन’ पर इसी नाम से एक फिल्म बनायी थी। राजपाल यादव और नेत्रा रघुरामन की मुख्य भूमिका से सजी यह फिल्म अभी भी थियेटर का मुंह देखने के लिए तरस रही है। इसकी एक बड़ी वजह इसकी स्टार कास्ट है। वितरकों के पास समय भी नहीं हैं।

भंसाली क्या कहते हैं
‘पद्मावत’ के बाद भंसाली की नई फिल्म ‘इंशाअल्लाह’ भी एक चर्चित किताब पर बेस्ड है। लेकिन इसे भी उन्होंने अपनी पिछली फिल्म की तरह थोड़ा तोड़ा-मरोड़ा है। वह इस बात से इनकार नहीं करते हैं कि ऐसा करते समय एक फिल्मकार पर आलोचकों का बहुत दबाव होता है। वह कहते हैं, ‘बात यदि किसी साहित्यिक कृति की हो तो आलोचकों की नज़र और तेज़ हो जाती है।
‘देवदास’ के बाद मुझ पर भी ऐसे आरोप लगे कि मैंने शरत बाबू की कृति से बहुत छेड़खानी की है। बतौर निर्देशक यह छूट लेने का मुझे पूरा अधिकार था। मैंने शरतचंद्र का यह उपन्यास कई बार पढ़ा था, किंतु देवदास को मैंने जिस रूप में देखा, अनुभव किया था, उसे आज के संदर्भ में मैं उसी ढंग से बनाना चाहता था। तभी कहानी में मैंने कुछ परिवर्तन किया।’

हमारे पास साहित्य का भंडार
अभिनेता नाना पाटेकर भी इसका सारा दोष फिल्मकारों पर मढ़ते हैं। उनके मुताबिक हमारे यहां पर्याप्त साहित्य है, लेकिन इनकी नज़र किसी साहित्यिक कृति पर कम ही पड़ती है। वह अपना दुख व्यक्त करते हैं, ‘इस ओर हमारे फिल्मकारों का ध्यान कम ही जाता है। मैं मराठी मानुष हूं। मराठी के बाद हिंदी के बारे में सोचता हूं। रही बात अंग्रेजी की तो मैं अभी तक ठीक तरह से बोल नहीं पाता हूं। खैर, मराठी हो या हिंदी या कोई दूसरी भाषा, हमारे यहां साहित्य का भंडार है। जब भी किसी फिल्मकार की नज़र उस पर पड़ेगी, मेरा पूरा समर्थन उन्हें मिलेगा।’
खैर, आज भले ही व्यावसायिक सिनेमा ने साहित्य को फिल्मों से दूर कर दिया हो, लेकिन साहित्यिक कहानियां निश्चित अंतराल के बाद बॉलीवुड में नज़र आ ही जाती है। जहां तक साहित्य पर बनी फिल्मों की सफलता और असफलता का सवाल है तो ज्यादातर फिल्मकार मानते हैं कि उनकी कहानी अच्छी होनी चाहिए। फिल्मकार मनोज कुमार की यह बात गौरतलब है, ‘इस प्रसंग में मैं एक बात कहना चाहूंगा कि कभी हमारे कई साथी फिल्मकार किसी कृति की आत्मा के साथ छेड़खानी करने लगते हैं। जो बहुत गलत है।’

साहित्यिक कृतियों पर बनीं कुछ और फिल्में
निर्मला, गोदान, गबन, कफन, शतरंज के खिलाड़ी-प्रेमचंद।
बिंदों का लल्ला, देवदास, परिणीता, निस्कृति, मझली दीदी, बिराज बहू, पंडित मोशाय सहित और भी कई उपन्यास और कहानियां-शरतचंद्र।
दस्तक, एक चादर मैली सी-राजेंद्र सिंह बेदी।
गणदेवता-ताराशंकर बंद्योपाध्याय।
कब तक पुकारूं-रांगेय राघव।
राग दरबारी-श्रीलाल शुक्ल।
यही सच है-मन्नू भंडारी।
मारे गये गुलफाम- तीसरी कसम नाम से-फणीश्वरनाथ रेणु।
चारूलता, चोखेरबाली, काबुलीवाला-रवींद्रनाथ टैगोर।
पाथेर पांचाली-विभूतिभूषण मुखोपाध्याय।
गाइड-आर.के.नारायण।
रूदाली, संघर्ष, हजार चौरासी की मां-महाश्वेता देवी।


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