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समय-समाज की बेबाक सच्चाई

Posted On August - 11 - 2019

प्रेम चंद विज

‘ओक में बूंदें’ हिन्दी और उर्दू के वरिष्ठ साहित्यकार जाबिर हुसेन का चौथा काव्य-संग्रह है। वे हिन्दी-उर्दू साहित्य को दो दर्जन से ज्यादा किताबें दे चुके हैं। काव्य-संग्रह में कुल 60 कविताएं हैं।
इन कविताओं में समाज और व्यवस्था की विसंगतियां परत-दर-परत खुलती हैं। भ्रष्ट शासन व्यवस्था, समाज में फैली बेचैनी, न्याय के खोखलेपन, समाज की विसंगतियां, आम आदमी की वेदना को कवि ने बहुत ही प्रभावशाली ढंग से छुआ है।
‘बच्चे इन दिनों’, ‘डब्बू की चिंता’, ‘बच्चों का डर’, ‘एक दिन बच्चों ने पूछा’, ‘कुछ उत्पाती बच्चे’ आदि में कवि ने बच्चों के माध्यम से अनेक प्रश्न उठाए हैं। भूखे व्यक्ति के सम्मुख बड़े से बड़ा प्रश्न भी निरर्थक हो जाता है। समंुदर और नदी के जरिये कवि ने मछुआरों और वहां की जनता की दुख-तकलीफों का बहुत प्रभावी ढंग से वर्णन किया है।
नारी की पीड़ा और शोषण का भी कवि ने सजीव चित्रण किया है। उसके साथ बाज़ार की तरह व्यवहार हो रहा है। ‘बगिया’ कविता इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। किस तरह से अभी भी बेमेल विवाह हो रहे हैं। ‘इशारों में बताया उसने अपनी सहेलियों को/ बापू ने रचा दी है/ गांव के प्रधान से मेरी शादी/ अब मैं काम नहीं करूंगी/ चाय बगान में/ प्रधान कहता है।’ ‘रूप कंवर’ कविता में भी कवि ने सती-प्रथा पर प्रहार किया है।
कवि केशव को याद करते हुए कहता है कि आपको धरती पर आना पड़ेगा। ‘रात के अंधेरे का फर्क/ मिट जाएगा/ जब पुनीत/ आत्माओं के/ शिविर को/ आग की लपटें घेर लेंगी/ केशव तुम आओगे/ तुमने कहा था/ कई बार कहा था।’
‘फरमान’ कविता में भी व्यवस्था में पनप रहे दमन और शोषण की बात की गई है। शासक का फरमान है कि ‘मेरी सरहद में रहने वाले/ हर शहरी को अब/ आंखों पर पट्टी बांधनी होगी/ लबों पे आहनी ताले/ कलाई में कड़ी/ पैरों में बेड़ी/ डालनी होगी/ वसूलों पर मेरे/ चलना ही होगा।’

0पुस्तक : ओक में बूंदें 0कवि : जाबिर हुसेन 0प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली 0पृष्ठ संख्या : 143 0मूल्य : रु.299.

 


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