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विश्वसनीय चुनाव प्रक्रिया के लिए जरूरी

Posted On August - 13 - 2019

ईवीएम की साख

अनूप भटनागर

देश के अनेक राजनीतिक दल चुनावों में इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों के इस्तेमाल का विरोध करते हुए मतपत्र प्रणाली लागू करने की मांग करते रहे हैं वहीं निर्वाचन आयोग ने चुनाव प्रक्रिया में मतपत्र और मतपेटियों के इस्तेमाल की संभावना को एक बार फिर सिरे से नकार दिया है। निर्वाचन आयोग द्वारा मतपत्रों के इस्तेमाल से इनकार किये जाने का साफ मतलब है कि अब देश में ‘बैलेट और बुलेट’ की राजनीति के युग का अवसान हो गया है। इससे एक बात साफ हो जाती है कि अब मतपत्र और मतपेटियां इतिहास बन चुकी हैं।
मुख्य निर्वाचन आयुक्त सुनील अरोड़ा ने हाल ही में कोलकाता में एक कार्यक्रम में मतपत्रों के युग में लौटने की संभावना से इनकार करते हुए दावा किया कि इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनें पूरी तरह भरोसेमंद हैं। इनके साथ वीवीपैट मशीनें भी जोड़ी जा रही हैं ताकि मतदाता यह देखकर आश्वस्त हो सके कि उसका मत किसी अन्य दल को नहीं पड़ा है। अरोड़ा ने उच्चतम न्यायालय के अनेक आदेशों का भी हवाला दिया है। देश में चुनाव में ईवीएम का इस्तेमाल शुरू होने से पहले के कालखंड में मतदान के दिन जगह-जगह हिंसा और मतदान केन्द्रों पर लूटपाट की खबरें आती थीं। इस दौरान हिंसक घटनाओं में बड़ी संख्या में लोग मारे भी जाते थे। चुनाव नतीजे मिलने में समय लगता था क्योंकि कई स्थानों पर मतगणना में दो से तीन दिन का वक्त लग जाता था।
यह सर्वविदित है कि लोकसभा और विधानसभा चुनावों में मतदान के लिये इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों का इस्तेमाल शुरू होने से पहले विभिन्न राज्यों में मतदान के दौरान बड़े पैमाने पर हिंसा होती थी और कई राज्यों में तो राजनीतिक दल के समर्थक और बाहुबली मतदान केन्द्रों पर कब्जा ही कर लेते थे। यही नहीं, इन केन्द्रों पर कब्जा करने के बाद अपनी पसंद के उम्मीदवार के पक्ष में मतपत्रों पर मुहर लगाने की घटनायें लगातार सुर्खियों में रहती थीं। इसमें सफलता नहीं मिलने पर अराजक तत्व अपने पसंदीदा प्रत्याशी के क्षेत्र में मतपेटियां ही लूट लेते थे।
देश में पहली बार 1998 में निर्वाचन आयोग ने मतपत्रों की बजाय प्रयोग के तौर पर मध्य प्रदेश और राजस्थान के पांच-पांच तथा दिल्ली के छह विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों में इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों का इस्तेमाल किया। इस प्रयोग में मिली सफलता के बाद से ही देश में इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों के उपयोग ने गति पकड़ी और मतपत्रों का प्रयोग इतिहास बन गया।
लेकिन, पिछले कुछ सालों से इन मशीनों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हुए राजनीतिक दल चुनाव में मतपत्रों और मतपेटियों के इस्तेमाल की पुरानी व्यवस्था फिर से लागू करने पर जोर देने लगे हैं। हालांकि उन्हें इसमें अभी तक सफलता नहीं मिली है जबकि ईवीएम से होने वाले मतदान की विश्वसनीयता बढ़ाने के लिये इसके साथ वीवीपैट मशीन का प्रयोग शुरू किया गया, जिससे मतदान करते हुए एक पर्ची निकल कर डिब्बे में गिरती है।
हाल ही में संपन्न 17वीं लोकसभा के चुनाव के दौरान भी तेलुगू देशम पार्टी के नेतृत्व में कई राजनीतिक दलों ने उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर की थी। इसमें नमूने के तौर पर एक मतदान केन्द्र पर ईवीएम के साथ लगी वीवीपैट मशीन से निकलने वाली पर्चियों की गणना की बजाय 50 प्रतिशत केन्द्रों पर ऐसी पर्चियों की गणना की मांग की गयी थी लेकिन शीर्ष अदालत ने इसकी बजाय ऐसे मतदान केन्द्रों की संख्या बढ़ाकर पांच कर दी थी। विपक्षी दलों का तर्क है कि ईवीएम की तकनीकी खामियों को देखते हुए कई पश्चिमी देशों ने फिर से मतपत्रों की प्रणाली को अपनाना शुरू कर दिया है लेकिन क्या इस तथ्य से इनकार किया जा सकता है कि आज भी करीब दो दर्जन देशों में ईवीएम का ही इस्तेमाल होता है। भारत जैसे देश, जहां मतदाताओं को तरह-तरह का प्रलोभन देकर किसी राजनीतिक दल विशेष के प्रत्याशी के पक्ष में मतदान के लिये प्रेरित किया जाता हो, में चुनावों में मतपत्रों और मतपेटियों का इस्तेमाल लोकतांत्रिक प्रक्रिया की निष्पक्षता और पारदर्शिता बनाये रखने में मददगार नहीं होगा।
कुछ राजनीतिक दलों द्वारा ईवीएम की बजाय मतपत्रों वाली पुरानी व्यवस्था लागू करने के लिये मोर्चेबंदी करने से तो यही लगता है कि ऐसा करने वाले राजनीतिक दल चुनावों में धनबल और बाहुबल का दखल खत्म करने के हिमायती नहीं हैं।
विपक्षी दलों के विरोध के बावजूद देश के लिये यही बेहतर होगा कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया की निष्पक्षता और पारदर्शिता बनाये रखने के लिये मतपत्रों के युग को अतीत ही रहने दिया जाये। राजनीतिक दलों को ईवीएम की जगह मतपत्रों और मतपेटियों के इस्तेमाल की जिद छोड़कर इस प्रक्रिया को अधिक विश्वसनीय बनाने की दिशा में एकजुट होकर प्रयास करने चाहिए।


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