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लोहागर्ल जहां पानी में गल गयी थी भीम की गदा

Posted On August - 11 - 2019

लोहागर्ल का सूर्य जल कुंड। फोटो : सुनील दीक्षित

सुनील दीक्षित
हरियाणा के साथ लगते राजस्थान में कई धार्मिक और ऐतिहासिक स्थान हैं, जहां श्रद्धालुओं व पर्यटकों का 12 माह आना-जाना लगा रहता है। ऐसा ही एक स्थान है लोहागर्ल। अब ‘लुहागरजी’ के नाम से प्रसिद्ध यह धार्मिक रमणीक स्थान झुंझुनू से 30 किलोमीटर की दूरी पर नवलगढ़ तहसील में पहाड़ों की कंदराओं में स्थित है। यहां पर प्राचीन काल में बना सूर्य मंदिर लोगों के आकर्षण का केंद्र है। इस धार्मिक स्थान का महत्व अनादिकाल से जुड़ा बताया जाता है। मान्यता है कि यहां पहाड़ों से निकली एक धारा से अनवरत पानी बह रहा है, जो सूर्य कुंड में जाता रहता है। श्रावण में भक्त इस कुंड से कांवड़ उठाते हैं। यहां हर साल माघ की सप्तमी को सूर्यसप्तमी महोत्सव मनाया जाता है, जिसमें 24 कोस की परिक्रमा कर सूर्यनारायण की शोभायात्रा निकाली जाती है।
सूर्यपीठाधीश्वर सूर्य मंदिर के महंत संतदास, युवाचार्य अवधेश दास और अश्विनी दास ने बताया कि इस स्थान के साथ कई कथाएं जुड़ी हैं। एक कथा है कि अनादिकाल में समुद्र का पुत्र शंखासुर वेद, पुराण और उपनिषदों को चुराकर पानी में छिप गया। वेदों, पुराणों व उपनिषदों की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने अवतार लेकर शंखासुर का वध किया। भगवान विष्णु सभी देवगणों को जल से वेद निकालने का आदेश देकर स्वयं काशी जी निवास करने चले गए। जिस देवगण को जो वेद ऋचा मिली, भगवान विष्णु ने उसे उन्हीं के नाम कर दिया। देवगणों ने इस स्थान का नाम पूछा तो भगवान ने ब्रह्मक्षेत्र बताया।
भगवान परशुराम का प्रायश्चित यज्ञ भी हुआ यहां : अन्य कथा भगवान परशुराम से जुड़ी है। मान्यता है कि त्रेता युग में अपने पिता जमदग्नि ऋषि के अपमान का बदला लेने के लिए क्षत्रियों के सर्वनाश के बाद भगवान परशुराम ने ब्रह्मक्षेत्र, लोहागर्ल में प्रायश्चित यज्ञ किया था। यज्ञ वेदी को ठंडा करने के लिए मंत्रों द्वारा जल प्रवाह करवाया गया, जो आज अविरल रूप से प्रवाहमयी है। यज्ञ पूरा होने पर भगवान सूर्यनारायण ने इस स्थान को पवित्र मानकर भगवान विष्णु जी की सपत्नीक तपस्या की। इससे प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने वरदान के रूप में ब्रह्मकुंड को सूर्यनारायण को अर्पित कर प्रसिद्ध कर दिया।
मोक्ष प्राप्ति का
स्थान : अन्य कथा है कि महाभारत युद्ध के बाद हिमालय पर्वत जाते समय पांडवों को देवर्षि नारद के दर्शन हुए। नारद जी ने उन्हें बताया कि भाई व गुरुजनों को मारने के गोत्र हत्या पाप से मुक्ति के बाद ही आपको मोक्ष मिल सकता है। मुक्ति का उपाय पूछने पर नारद जी ने उन्हें तीर्थों के भ्रमण का आदेश दिया। साथ ही युक्ति बताई कि दुर्योधन की हत्या करने वाली भीमसेन की गदा जल में हल्की होकर तैरने लगे तो समझ लेना कि पाप की मुक्ति हो गई है। पांडव कई तीर्थों पर गये। जहां भी जाते पवित्र जल में भीमसेन की गदा डालकर देखते, लेकिन वह डूबने लगती। लेकिन, सूर्यकुंड में गदा गल गयी। इसलिए इस स्थान का नाम लोहागर्ल पड़ा। काशी में सूर्यभान नामक राजा ने यहां मंदिर का निर्माण कराया। वर्तमान में भीमकुंड के निकट सूर्यमंदिर के पूर्व में संत-महंतों की चरण पादुकाएं स्थित हैं। एक चरण पादुका पर संवत 1419 अंकित है। बताया जाता है कि पूरे विश्व में सूर्यभगवान के 44 मंदिर हैं, जिनमें लोहागर्ल भी एक है। सूर्यकुंड के चारों ओर मंदिर बने हैं। इसके पूर्व में सूर्यनारायण मंदिर, पश्चिम में शंकर भगवान व शुकदेव जी का मंदिर है। उत्तर दिशा में ब्रजबिहारी, राधाकृष्ण और नृसिंह जी का मंदिर है। दक्षिण में बड़ा गोपीनाथ व बांके गोपाल जी का मंदिर है।


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