सिल्वर स्क्रीन !    हेलो हाॅलीवुड !    साहित्यिक सिनेमा से मोहभंग !    एक्यूट इंसेफेलाइिटस सिंड्रोम से बच्चों को बचाएं !    चैनल चर्चा !    बेदम न कर दे दमा !    दिल को दुरुस्त रखेंगे ये योग !    कंट्रोवर्सी !    दुबला पतला रहना पसंद !    हिंदी फीचर फिल्म : फर्ज़ !    

मुरझाए मन को दीजिए आशा भरी गगरिया

Posted On August - 11 - 2019

कृष्णलता यादव
जिंदगी के दुरूह सफर में कभी-कभी निराशा के गह‍्वरों से सामना होता है। तब निराशावादी व्यक्ति भाग्य के हाथ का खिलौना बनकर हाथ पर हाथ धरकर बैठ जाता है। वह न घर का रहता है, न घाट का। ऐसे में आशा का मेरुदंड इन गह‍्वरों को पार करने का सम्बल प्रदान करता है। निराश मन को बार-बार समझाया जाता है– आशा के दामन को यूं ही तार-तार न होने दो, बंद हो गये जो दरवाजे, फिर से उनको खुलने दो।
कुंठित सोच की नस-नाड़ियों को सक्रिय करने के लिए उम्मीद एक अचूक मोबिल ऑयल है। यह एक ऐसे नंबर का चश्मा है, जो हर आंख पर ठीक बैठता है। इसकी बदौलत कुंठा, आलस, अकर्मण्यता, अवसादिता रफूचक्कर हो जाती है। कहा जा सकता है– मुरझाए मन को दे दीजिए, आशा-अमि से भरी गगरिया, गति के घुंघरू बांध पांव में, दौड़ेगा तज अलस-चदरिया।
एगर्सन के मतानुसार, ‘आशावादिता उन्नति की नींव है इसलिए मनुष्य को आशा के प्रपात तले भीगते हुए अन्तश्चेतना को ताजा दम करते रहना चाहिए। यह उम्मीद ही है जो दुख को आधा व खुशी को दोगुना करती है।’
अपने खेतों में अन्न की लहलहाती बालियों के सुनहरेपन को देखकर किसान का मन तरंगायित हो उठता है। इन तरंगों का कारण बनती है- उसके मन-प्राण में बसी आशा की यह भावना कि फसल कटेगी, खेत-खलिहान से आए नवान्न से भंडार भरेंगे, अटके काम पूरे होंगे। ऐसी सुमधुर कल्पना का आधार आशा ही तो है। इसलिए कहा जाता है– हवा चली प्रतिकूल, मगर हारे-थके न पांव, मन के आशा भाव से, पहुंच गये निज गांव।
सच पूछा जाए तो आशा रोशनी का वह नाजुक हिस्सा है, जो धुंधले कांच के आर-पार देखने में मदद करता है। आशावादिता एक ऐसी बांसुरी के समान है, जिससे मधुर धुन निकलती रहती है– सूर्यास्त हुआ तो क्या हुआ, फिर सूर्योदय होने वाला, इतना कर बस आने मत दे, अपनी आंखों आगे जाला।
आशावादिता में ठिठुरती आत्मा को गर्माहट देने वाली तपन समाई होती है। वैसे भी सोने के कितने ही चिराग जला लें, उम्मीद का दीया जलाए बिना बात बनती नहीं। इसकी रोशनी निर्बल को महाबली बनाने का मंत्र है। इस विषय में एक बोधकथा है– एक बढ़ई तन्मयता से अपने काम में जुटा था। उसके हाथों की कलाकारी निहार रहे व्यक्ति ने कहा, ‘मिस्त्री जी, आजकल लकड़ी का इस्तेमाल कम हो रहा है, जहां देखो प्लास्टिक और स्टील की घुसपैठ नजर आती है। अगर यूं ही चलता रहा तो एक दिन आपका धंधा चौपट। तब आने वाली पीढ़ियों का क्या होगा?’ बढ़ई ने मुस्कराते हुए कहा, ‘मेरा मन कहता है कि जब तक पेड़-पौधे रहेंगे, हमारे धंधे को कोई खतरा नहीं।’ ‘अजी! कल-कारखाने, कई मंजिला इमारतें और तरह-तरह की योजनाएं जमीन को निगलती जा रही हैं। पेड़-पौधों के लिए जगह ही कहां बचेगी?’ बढ़ई खिलखिला दिया, ‘जिसने उगना है, उसे कहीं न कहीं जगह मिल जाती है; शक हो, तो अपने ठीक सामने दीवार के बीच में उगे पीपल के पौधे को देखिए।’ शंकालु व्यक्ति के पास अब कहने को कुछ न बचा था।

बंजर जमीन पर भी फूल…
जिसके मन का घट आशा-नीर से भरा-पूरा होता है वह कस्सी-कुदाल चलाकर बंजर जमीन में भी पुष्प खिला लेता है, पत्थरों का
सीना चीरकर हीरे-मोती निकाल लेता है और वायु-तरंगों पर
अपना नाम लिख लेता है। वह निराश मन को यह कहने का माद्दा रखता है–
अरे अहेरी! आस छोड़ दी, खाली हाथों घर जाएगा? बच्चों के कुम्हलाये चेहरे, क्या सच में सह पाएगा? माना कि थक-हार चुका है, नहीं हुआ है जंगल खाली तीर निकालो फिर तरकश से, भरी रहेगी तेरी थाली। झरने दो उम्मीदी झरना, वरना तो उत्पात बढ़ेंगे, संघर्षों के पुण्यपथों पर, सुख-सम्पत्त के फूल खिलेंगे।
चूंकि आशावादिता नवसृजन की जननी होती है, इसलिए आस-उम्मीद को बेचारी बनने से रोकने के लिए आशा का दीप सजाकर नगमा गाना होता है– उठेगी, हर हाल उठेगी, काली घटा बरसात की, उम्मीदों से गलबांही हो, बातें हों जज्बात की।
जो व्यक्ति पराजय में भी प्रयत्न की ज्योति प्रज्वलित किए रहते हैं, वे कभी पराजित नहीं होते। उम्मीद की अगुआई में समय को भी अपनी कठोरता त्यागनी पड़ती है। उम्मीद की रचनात्मकता के पक्ष में कहा जाता है– उम्मीदों की गठरी खोली, बड़ा खजाना हाथ लगा, लगता था जो दूर किनारा, हर पल अपने साथ लगा।


Comments Off on मुरझाए मन को दीजिए आशा भरी गगरिया
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading...
Both comments and pings are currently closed.

Comments are closed.

Powered by : Mediology Software Pvt Ltd.