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मीठे से मोह के पक्के धागे

Posted On August - 11 - 2019

दीप्ति अंगरीश

राखी बंधन है प्रेम का, प्यार का दुलार का और एक मीठे से मोह का। यहां हम बाज़ारीकरण की चमक-धमक से लबरेज़ धागों की किस्मों पर चर्चा नहीं कर रहे। बात हो रही है राखी में छिपे मोह की, जो अपनों के अलावा कभी-कभी परायों को भी अपना बना लेता है। भाई-बहन के प्रेम का यह धागा, सगे रिश्तों के अलावा कई बार अजनबी लोगों को भी प्रेम और मीठे से मोह के इस सूत्र में बांधता है। यानी जिससे दूर-दूर तक कोई नाता नहीं, राखी के धागे और दिल के जज़्बात उसके साथ भी ज़िंदगी भर का रिश्ता जोड़ लेते हैं।
अमूमन लोग राखी के बंधन को सगे भाई-बहनों तक ही सीमित रखते हैं। भले ही दुनिया की नज़र में यह असल पैमाना है, लेकिन यह आधा सच है। बता दें कि संबंधों की तारें मन से जुड़ी होती हैं। यानी मन से मन मिल गया, सोच एक जैसी हो गई तो खून के रिश्तों से ज्यादा अहमियत ले लेते हैं मोह के धागों से बने ये बंधन। राखी के इस बंधन में बहुत सारे भाई-बहन ऐसे ही गुथे हुए होते हैं। जहां न जाति मायने रखती है और न ही धर्म और न ही सगे-सौतेले का फर्क। यह बंधन क्षेत्र और बोली से आगे बढ़कर मन से जुड़ा होता है। बहन ने कलाई पर राखी बांधी और ताउम्र संवेदनाओं के सहारे संबंध प्रगाढ़ होता जाता है।
एक अटूट राज़दार
कभी-कभी देखा जाता है कि भाई-बहन के रिश्तों के बीच कुछ औपचारिकताएं मात्र शेष रह जाती हैं। मन का मिलन शून्य हो जाता है। भाई-बहन को एक-दूजे की जिंदगी में ताक-झांक करने की फुर्सत नहीं होती। खासतौर से शादी के बाद।
कारण समय का अभाव हो, संबंधों में कड़वाहट हो या शिष्टाचार वाली दूरियां। ऐसे में देखा गया है मन वाले भाई-बहन आपस में कई पहलुओं को साझा करते हैं। वे एक-दूजे के राज़दार, जिगरी दोस्त, कड़े आलोचक और सगे संबंधी की भी भूमिका निभाते हैं।
राखी है धर्म से परे
राखी का रिश्ता धर्म और मज़हब नहीं देखता। इतिहास भी इसके कई उदाहरण हमारे सामने पेश करता है। रिश्तों में सच्चाई और दिलों में पाकीज़गी हो तो मज़हब की दीवारें त्योहार को मनाने में आड़े नहीं आती। राखी का यह त्योहार भाई-बहन के रिश्ते की पाकीज़गी का त्योहार है।
एक दिशा का रिश्ता
रक्षाबंधन में कोई औपचारिकता नहीं होती। किसी अजनबी शख्स को भाई-बहन के रिश्ते में बंधने के लिए एक-दूसरे को जानना-समझना और मन से मन का मिलन ज़रूरी है। फिर यह रिश्ता अजनबी नहीं रह जाता बल्कि ताउम्र दिशा देता है। यानी सही-गलत की पहचान करवाता है और ऐसे रिश्तों में बंधकर हम खुश भी रहते हैं। तो ऐसे भाई-बहनों का आदर करें और स्वयं भी ऐसे बंधन में बंधें और जीवन को सटीक दिशा दें।
इसका मतलब यह नहीं है कि इन्हें आप हर समय खोजिए। असल में यह रिश्ता आपको खुद पहचान लेगा। बस समय दें।


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