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मन को मिलता है सुकून

Posted On August - 4 - 2019

सरोज गुप्ता

बहुत पुरानी बात है। मैं उस समय छठी कक्षा में पढ़ती थी। उस समय प्राइवेट स्कूल की फीस भी दो-तीन रुपये हुआ करती थी। लेकिन इतनी राशि भी बहुत अधिक लगती थी। उस दिन फीस जमा कराने का दिन था। क्लास टीचर सभी से रोल नंबर अनुसार फीस लेने लगीं। हमारी छठी कक्षा की फीस ढाई रुपये थी। अपनी बारी आने पर मैंने अपनी फीस जमा करा दी। कुछ देर बाद टीचर ने रोल नंबर 22 बोला तो गीता नाम की लड़की टीचर के पास आकर चुपचाप खड़ी हो गई। वह फीस नहीं लाई थी। टीचर के पूछने पर उसने कोई उत्तर नहीं दिया। वह सिर झुकाए उदास-सी कुछ बोल नहीं पाई। ‘अच्छा, चलो कल ले आना।’ गीता वापस आकर सीट पर बैठ गई।
आधी छुट्टी में मैंने उससे पूछा तो उसने बताया, ‘मेरे पापा खेती का काम करते हैं और वे कुछ दिनों से बीमार होने के कारण काम पर नहीं जा पाए हैं। उनकी दवाइयों में भी काफी पैसे खर्च हो गए हैं। इस समय घर में पैसे बिल्कुल नहीं हैं तो मैं फीस कहां से लाती। सुनो, क्या तुम मुझे मेरी फीस के पैसे उधार दे सकती हो। मैं बहुत जल्दी तुम्हें लौटा दूंगी। देखो, नहीं तो मेरा नाम कट जाएगा।’
मैंने घर आकर मम्मी को बताया कुछ सोचकर मम्मी ने मुझसे पूछा, ‘चारु! तुम्हारे पास कितने पैसे हैं?’ ‘मेरे पास साढ़े चार रुपये हैं, जो मैंने अपने जेब खर्च से बचाकर रखे हैं।’ ‘ठीक है, तुम उनमें से ढाई रुपए कल गीता को दे देना और कहना कि यह उधार नहीं है बल्कि मेरी ओर से उपहार है।’
‘लेकिन मम्मी! आप मेरे पैसों में से क्यों दिलवाना चाहती हैं?’ ‘देखो चारु! तुम अपने पैसों में से दोगी तो तुम्हें अधिक खुशी होगी। मेरी इस सीख को हमेशा याद रखना कि किसी भी ज़रूरतमंद की सहायता करना हमारा मुख्य कर्तव्य है। इससे दूसरे की ज़रूरत तो पूरी होगी ही लेकिन तुम्हें भी बड़ा सुकून मिलेगा।’
बस मैंने मम्मी की सीख गांठ बांध ली और अगले दिन सुबह गीता को अलग ले जाकर ढाई रुपये दे दिए। मैं सबके सामने देकर उसे शर्मिंदा नहीं करना चाहती थी। आज इतनी उम्र हो जाने पर भी मन में यही भावना है कि यथासंभव ज़रूरतमंदों की सहायता करूं।


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