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बार-बार बाढ़

Posted On August - 26 - 2019

हरीश लखेड़ा

देश का एक तिहाई से ज्यादा भू-भाग इस मानसून में बारिश के कहर से बेहाल रहा है। जुलाई और अगस्त के दौरान उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक कोई न कोई भू-भाग जल में डूबा रहा है। केरल, कर्नाटक, महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, असम, बिहार के साथ ही इस बार राजस्थान में भी बारिश ने अपना रौद्र रूप दिखाया। यह इतना विकराल था कि सैकड़ों लोगों को अपनी जान गवांनी पड़ी। नदियों के लबालब हो जाने से घरों में पानी घुस गया और लाखों लोगों को घर-बार छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर शरण लेने के लिए मजबूर होना पड़ा। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में भारी बारिश व कई जगह बादल फटने से एक ही पल में मकान समेत कई परिवार गायब हो गए। एनडीआरएफ, पुलिस, केंद्रीय सुरक्षा बल से लेकर सेना को भी राहत व मदद के लिए मैदान में उतारना पड़ा। बाढ़ के कारण इस साल अब तक मृतकों की संख्या 627 पार कर चुकी है। इनके अलावा, सैकड़ों पालतू जानवर और पक्षी भी मारे गए। लाखों लोगों को बेघर होना पड़ा। हजारों हेक्टेयर भूमि पर लगी फसल चौपट हो गई है। 2018 में भी मानसून के दौरान 7 राज्यों में ही बाढ़ और बारिश से हुई घटनाओं में 774 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी। खास बात यह है कि इस मानसून में भी कई क्षेत्र ऐसे हैं, जहां सामान्य से भी कम बारिश हुई है, यानी वे सूखे की चपेट में हैं। वास्तव में बाढ़ और सूखा अब स्थायी समस्या बनते जा रहे हैं।
यह तब हो रहा है, जबकि केंद्र और राज्यों के पास बाकायदा बाढ़ नियंत्रण विभाग हैं और इस काम पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं। देश में मानसून मात्र 4 माह जून, जुलाई, अगस्त व सितंबर तक रहता है, लेकिन इस अवधि में देश के कई क्षेत्र ऐसे हैं, जहां जीवन दूभर हो जाता है। इस बार भी बाढ़ से छोटी-बड़ी सड़कें, राष्ट्रीय राजमार्ग, पुल, रेलवे लाइन व बिजली की लाइनों से लेकर एयरपोर्ट तक क्षतिग्रस्त हो गए। हजारों मकान धवस्त हो गए। खेतों में पानी भर जाने से फसल भी चौपट हो गई। पालतू मवेशियों के साथ ही वन्य जीव-जंतु भी मारे गए। अब इन सभी के आंकड़े भी सामने आएंगे, जब राज्य सरकारें राहत राशि के लिए केंद्र को रिपोर्ट भेजेंगी। लेकिन राज्य सरकारों की रिपोर्ट में सिर्फ मनुष्य और पालतू जानवरों तथा मुर्गी, बतख आदि का ही आंकड़े होंगे, वन्यजीव-जंतुओं के नहीं।
मानसून के विदा होते ही पीड़ितों को हर साल की तरह बाढ़ राहत राशि बांटने की प्रक्रिय शुरू होती है। यह भी कहा जाता है कि बाढ़ वास्तव में सरकारी पैसे की लूट का उत्सव है। इस साल जुलाई से अब तक बाढ़ मीडिया की सुर्खियों में रही है। जुलाई में असम व बिहार और अगस्त में केरल, कर्नाटक, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, राजस्थान से लेकर उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में बारिश ने तांडव मचाया। पूर्वोत्तर में ब्रह्मपुत्र हर साल असम में सैकड़ों लोगों की जीवन लील लेती है। असम में ब्रह्मपुत्र और बिहार में कोसी में हर साल विनाशकारी बाढ़ आती रही है।
आजादी के 70 वर्षों में भी बाढ़ का ठोस समाधान नहीं तलाशा जा सका है। अकेले असम में ही इस बार भी प्रदेश के 33 में से 29 जिले बाढ़ की चपेट में रहे। इनसे 57. 51 लाख लोग प्रभावित हुए। बिहार का भी कमोबेश यही हाल रहता है। अब तो केरल में भी बाढ़ आने लगी है। बारिश के लिए तरसने वाले राजस्थान में भी इस बार बाढ़ आ गई। राजस्थान के जोधपुर, बीकानेर, वनस्थली, अजमेर, भीलवाड़ा व सीकर से लेकर माउंट आबू में एक ही दिन में इतनी बारिश हो गई, जितनी कि साल भर में होती रही है। खास बात यह है कि मई-जून के दौरान देश की बड़ी आबादी सूखे और गर्मी से परेशान थी, लेकिन कुछ समय बाद ही ज्यादा बारिश से बेहाल हो गई। पर्यावरणविद् इसे जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणाम बताते हैं, तभी तो हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में अब लगभग हर साल बादल फटने की घटनाएं बढ़ने लगी हैं।
सरकार भी मानती है कि बाढ़ के कारण 1953 से 2017 के बीच एक लाख से ज्यादा लोग मारे गए। बीते साल राज्यसभा में बारिश और बाढ़ से जुड़े पूछे गए एक प्रश्न के उत्तर में तत्कालीन केंद्रीय जल संसाधन राज्यमंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने बताया था कि 1953 से 2017 तक बारिश और बाढ़ के कारण 1,07,487 लोग मारे गए। जबकि देश को 3.65 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। दरअसल, भारत विश्व के उन देशों में शामिल है। जहां हर साल कोई न कोई भू-भाग बाढ़ की चपेट में रहता है। देश में 1977 की बाढ़ की दुखद स्मृतियां आज भी हैं। इसके बाद, दूसरी सबसे बड़ी आपदा 1988 में आई। तब 4,252 लोग मारे गए थे। सरकारी आंकड़े भी गवाह हैं कि औसतन हर साल 1,654 लोग पानी से आई आपदा की भेंट चढ़ जाते हैं।

इस बार 627 मौतें
इस बार मीडिया में आई सुर्खियां कहती हैं कि अब तक बाढ़ ने 627 से ज्यादा जानें ले लीं। केरल में 121, बिहार में 123, असम में 82, महाराष्ट्र 72, कर्नाटक में 48, मध्यप्रदेश में 32, गुजरात में 22, राजस्थान में 5, हिमाचल प्रदेश में 63 और उत्तराखंड में 59 लोग मारे गए। इन राज्यों में सैकड़ों लोग अब भी लापता हैं। देश में बाढ़ से आई आपदा का काम राज्य सरकारें, केंद्रीय गृह मंत्रालय और जलशक्ति मंत्रालय देख रहे हैैं। लेकिन जानने लायक यह है कि केंद्र सरकार के पास बाढ़ से मारे गए लोगों के आंकड़े तक नहीं हैं। केंद्रीय मंत्रालय कहते हैं कि ये आंकड़े राज्यों के पास होते हैं। उधर, देश के बाढ़ प्रभावित 11 राज्यों में हुए नुकसान के आकलन के लिए गृह, वित्त, कृषि और जल मंत्रालयों द्वारा गठित अंतर-मंत्रालय केंद्रीय टीम ने प्रभावित क्षेत्रों का दौरा शुरू कर कर दिया है। गृह मंत्रालय के संयुक्त सचिव प्रकाश के नेतृत्व में यह टीम मौके पर जाकर राज्य सरकार के अधिकारियों के साथ बाढ़ से हुए नुकसान का आकलन करेगी। टीम बाढ़ प्रभावित राज्यों असम, मेघालय, त्रिपुरा, बिहार, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र तथा केरल जायेगी।

हर साल 3.2 करोड़ लोग प्रभावित
दुनियाभर में भारत एकमात्र ऐसा देश है, जहां बाढ़ से सबसे ज्यादा मौतें होती हैं। विकसित देशों ने तो
इसका समाधान निकाल लिया है, लेकिन भारत अभी भी बाढ़ से जूझ रहा है। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि विश्वभर में बाढ़ से

होने वाली कुल मौतों
में से 20 फीसदी अकेले भारत में होती हैं। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के आंकड़े भी गवाह हैं कि देश में बाढ़ से हर साल औसतन 1,600 से ज्यादा लोग मारे जाते हैं। 3.2 करोड़ लोग प्रभावित होते हैं और लगभग 92 हजार मवेशी जान गंवा देते हैं। हर साल मानसून के सीजन में देश का कोई न कोई कोना बाढ़ की चपेट में होता है।

जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणामों का कहर

इस बार देश का एक तिहाई से ज्यादा भूभाग बाढ़ की चपेट में है। हर साल कोई न काई राज्य बाढ़ की चपेट में आता है। सरकार इससे निपटने के लिए क्या दीर्घकालिक समाधान निकाल रही है?
कई राज्यों में इस बार भी बाढ़ प्राकृतिक आपदा है। एक ही दिन में जब इतनी बारिश हो जाए, जितनी सालभर में होती है तो इससे बाढ़ ही आएगी। मैं मानता हूं कि देश में कोसी, ब्रह्मपुत्र जैसी नदियों के कारण हर साल बाढ़ आती है। इसके लिए उपाय किए जा रहे हैं। कोसी पर बांध बनाने के लिए नेपाल के साथ बातचीत चल रही है। हमें यह भी जानना होगा कि लोग भी नदियों के तटों पर कब्जा कर लेते हैं। ऐसे में जब नदी में पानी बढ़ता है तो वह अपना प्राकृतिक रास्ता नहीं मिलने से उन सबको बहा ले जाती है, जो उसके रास्ते में आता है।
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में नदियों को जोड़ने की योजना बनाई गई थी। आपकी सरकार उस पर क्या कर रही है?
नदियों को जोड़ने की योजना कागजों पर जितनी अच्छी लगती है, उस पर अमल कर पाना उतना ही कठिन है। जल राज्यों का विषय है। नदियां भी कई राज्यों से होकर गुजरती हैं। राज्यों को एकमत कर पाना आसान नहीं होता है, क्योंकि पानी को लेकर राज्यों में पुराने झगड़े चल रहे हैं। केन-बतेवा लिंक योजना पर अमल करने के लिए उत्तर प्रदेश व मध्य प्रदेश में बातचीत अंतिम दौर में है।

नदियां गाद भरने से उथली हो गई हैं और बरसात में पानी बढ़ने से वह तटों की ओर बहने लगता है। एनजीटी नदियों से रेत निकालने पर पाबंदी लगा देता है। ऐसे में नदियों को गहरा कैसे किया जाएगा?
नदियां इसलिए गाद से भर रही हैं कि पहाड़ों में विकास के कार्य हो रहे हैं। वहां पेड़ काटे जा रहे हैं। इससे नदियों में मिट्टी भर रही है। इसका समाधान यही है कि जंगलों को बढ़ाया जाए।

नदियों में गाद भरने का कारण शहरों के नाले भी तो हैं, दिल्ली के सभी नाले यमुना में जा रहे हैं। इससे यमुना में गाद भरी है। इसे रोकने के क्या उपाय किये जा रहे हैं?
नालों का गंदा पानी नदियों में जाने से रोकने के लिए गंगा मिशन के तहत काम किया जा रहा है। इस साल के अंत तक उत्तराखंड में सभी नालों का पानी ट्रीट होने के बाद ही गंगा में जाएगा। यह काम शीघ्र पूरा होने जा रहा है। बाकी राज्यों में भी काम जारी है।

इस बार तो आपके गृह राज्य राजस्थान में भी बाढ़ आ गई। ऐसा कैसे हुआ?
यह सब जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणाम हैं। मेरे जिले में औसतन साल भर में 300 मिमी बारिश होती रही है, लेकिन इस बार एक ही दिन में इतनी बारिश हो गई। ऐसे में भूमि के अंदर कितना पानी जा सकता है, बाकी पानी को समुद्र की ओर ही तो जाना था।

इस बार भी बाढ़ से 600 से ज्यादा लोगों के मारे जाने की सूचना है। सरकार के पास क्या आंकड़े हैं ?
यह आंकड़े गृह मंत्रालय अथवा राज्यों के पास होते हैं, जलशक्ति मंत्रालय के पास नहीं होते।


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