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बात करने की कला

Posted On August - 11 - 2019

मोनिका अग्रवाल

दरअसल, बात कह देना ही काफी नहीं होता। बात को ठीक प्रकार से कहना एक कला है। कहने का अभिप्राय है कि जितनी भी बात की जाए वह अर्थपूर्ण हो। पुरानी कहावत है कि निरर्थक बात से ज्यादा अच्छी अर्थपूर्ण चुप्पी है। बेसिर-पैर की बातें सिर्फ हंसी का पात्र ही बनाएंगी।
अगर आप सामने वाले व्यक्ति से खराब तरीके से बात करेंगे तो जवाब भी कुछ उसी तरह का मिलेगा। बेहतर है कि आप अपनी बात बिना किसी डर के विनम्रता से साफ कहें, ताकी सामने वाले को भी आपका व्यवहार स्पष्ट साफ-सुथरा लगे। अगर आप बेवजह डर कर अपनी बात कहेंगे तो सामने वाले को आपके व्यवहार में कुछ कमी या संदेह होगा।
ऐसा तो नहीं आप बोलते-बोलते चुप हो जाते हों। जहां बोलने की आवश्यकता हो, वहां अनावश्यक चुप्पी न साधें। अचानक साधी गई चुप्पी से आप सामने वाले को हीन भावना से ग्रस्त लगेंगे।
सामने वाले की बात को भी ध्यानपूर्वक, चुपचाप सुनें और धीरे-धीरे गम्भीरतापूर्वक, मुस्कुराते हुए, स्पष्ट आवाज़ में, सद‍्भावना के साथ बात करें। पहले सोचें-विचारें और फिर उत्तर दें। आपने- सामने वाले की बात को कितना धैर्यपूर्वक सुना, यह आपके सद्गुण को दर्शाएगा। दो लोगों की बातचीत में अधिक सुनना व कम बोलना खास शिष्टाचार है।

बेवजह बोलना अशिष्टता की निशानी
कुछ लोगों में आदत होती हैं कि वह बात करते समय इधर-उधर देखते हैं, यह उचित व्यवहार नहीं है। आप जब भी बात कर रहे हों तो सामने देखकर बात करें। बात करते समय संकोच न करें।
एक ऐसा व्यक्ति, जो बिना वजह काफी बोलता है और इस बात का भी ध्यान नहीं करता कि सामने वाला किस तरह की बात में रुचि रखता है, ऐसे व्यक्ति से लोग बात करने से कतराते हैं, कन्नी काटने लगते हैं। जरूरी है कि आप बोलते समय सामने वाले की रुचि का भी ध्यान रखें। सोच-समझ कर, संतुलित रूप से अपनी बात रखें और आपके हावभाव स्पष्ट हों।

मर्यादा का पालन करें
अपने मित्रों या हमउम्रों के बीच वार्ता होने का मतलब यह नहीं है कि आप किसी भी हद तक चले जाएं, अपनी मर्यादा भूल जाएं। आपस में सद्भाव व आत्मीयता का भाव बना रहे। हंसी-मज़ाक में भी शालीनता बनाए रखें। यदि आप किसी विषय की जानकारी नहीं रखते तो अनावश्यक बीच में बार-बार बोलने से कोई फायदा नहीं। आसपास के लोग आपका मजाक ही बनाएंगे।
बेहतर होगा कि आप चुपचाप शांति के साथ उन लोगों के बीच की बात को सुनें और समझने की कोशिश करें। यदि बातचीत सुनने के दौरान आपके मन में कोई जिज्ञासा या प्रश्न है तो बड़े ही विनम्र तरीके से पहले उनसे अपना सवाल रखने की आज्ञा ले लें।

बिन मांगे सलाह न दें
कुछ लोगों की आदत होती है बिना मांगे सलाह देने की। जब तक कोई आपकी राय या सलाह न मांगे आप चुप रहें, यही आप की शालीनता है। यदि कुछ लोगों का अपना-अपना ग्रुप है, जिसमें आपस में बैठे बातचीत कर रहे हैं तो आप दूर बैठे व्यक्ति से जोर-जोर से तेज आवाज में बात न करें। उठकर उनके करीब जाएं और आराम से बात करें। जब आप सभी लोगों के बीच में सबके साथ हैं तो कानाफूसी करना, बिल्कुल मुंह के पास जाकर बात करना उचित नहीं। ऐसा करने पर आपकी भूमिका संदेहास्पद हो जाएगी।

सांकेतिक भाषा से बचें
बातचीत के दौरान बार-बार किसी की ओर अंगुली उठाना सही नहीं। यदि किसी व्यक्ति से काफी समय बाद मिल रहे हैं और आपको उनका नाम या परिचय याद नहीं तो उनसे उनका विनम्रता के साथ नाम या परिचय मांगे। लेकिन यह नहीं कहें कि मैं आपको नहीं जानता या जानती। सब लोगों के बीच किसी भी तरह की सांकेतिक या ऐसी भाषा में भी मत बोलें, जो आपके बोलचाल की सामान्य भाषा नहीं है।

शालीनता ओढ़े रखें
यदि आप किसी के प्रति संवेदना दर्शा रहे हैं तो वह बनावटी न लगे। कोई ऐसा व्यक्ति जो बुरी तरह से ज़ख्मी है और अपने घाव पर बांधने के लिये कपड़े का टुकड़ा तलाश रहा है तो आप उस व्यक्ति को अपना रूमाल दे सकते हैं।
याद रखें, शालीनता से जुड़े शिष्टाचार का यदि पालन नहीं किया जाता है तो सामाजिक अस्वीकृति का सामना करना  पड़ता है।


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