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बढ़ी फीस की टीस

Posted On August - 14 - 2019

शिक्षा की गुणवत्ता हो प्राथमिकता
हाल ही में केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड यानी सीबीएसई ने दसवीं व बारहवीं के बोर्ड परीक्षा शुल्क में अप्रत्याशित वृद्धि की है, जिससे निर्बल वर्गों के अभिभावकों में भारी रोष व्याप्त है। निस्संदेह बोर्ड का निर्णय और उससे जुड़ी दलीलें चौंकाने वाली हैं। एक ओर बोर्ड कह रहा है कि पिछले पांच सालों से फीस में कोई वृद्धि नहीं की गई वहीं अभिभावक पूछ रहे हैं कि क्या एक साथ फीस बढ़ाकर अभिभावकों से पिछला घाटा भी वसूला जा रहा है। चौंकाने वाली बात यह है कि जहां सामान्य वर्ग के बच्चों की परीक्षा फीस दोगुनी की गई है, वहीं अनुसूचित जाति व जनजाति के विद्यार्थियों की फीस में चौबीस गुना वृद्धि की गई है। सीबीएसई से संबंधित स्कूलों में जहां बड़ी संख्या निजी स्कूलों की है वहीं तमाम सरकारी व केंद्रीय विद्यालय इसके अंतर्गत आते हैं। जो अभिभावक निजी स्कूलों का बोझ नहीं उठा सकते, वे ही सरकारी स्कूलों में सीबीएसई पाठ्यक्रम में अपने बच्चों को शिक्षा दिलाते हैं। सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों की फीस भले ही दोगुनी की गई है, मगर इनमें बड़ा तबका उस वर्ग का है जो मुश्किल से अपने परिवार का भरण-पोषण कर पाता है। किसी तरह खर्च का तालमेल करके बच्चों को पढ़ा रहा है। आलोचकों की दलील है कि पहले अभिभावकों को विश्वास में लेकर ऐसा फैसला लिया जाना चाहिए था। मगर सीबीएसई अपनी परेशानियों की दुहाई देकर बढ़ी फीस को तार्किक आधार देने की कोशिश कर रही है। दरअसल, केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड को अपनी आर्थिक चुनौतियों से मुकाबले के लिये अन्य विकल्पों पर विचार करना चाहिए था ताकि बच्चों के अभिभावकों पर अचानक ज्यादा बोझ न पड़े। यह वृद्धि कम भी की जा सकती थी, जिसको लेकर निश्चित ही कोई विरोध सामने नहीं आता। वैसे भी अर्थव्यवस्था में महंगाई इतनी नहीं बढ़ी है कि अचानक फीस में  इतना बड़ा इजाफा कर दिया जाये।
वैसे भी सरकारों का लोकतंत्र में दायित्व बनता है कि कल्याणकारी राज्य की अवधारणा के तहत जनता को बहुत कम लागत में शिक्षा व स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराये। बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति सरकार को बिना लाभ की अवधारणा के साथ करनी चाहिए। मगर विडंबना यही है कि देश में शिक्षा के व्यवसायीकरण का जो दौर चल रहा है, उसमें आम आदमी व पिछड़े तबके के विद्यार्थियों के लिये कोई जगह नहीं है। हकीकत में होना तो यह चाहिए कि शिक्षा बोर्ड की प्राथमिकता शिक्षा की गुणवत्ता हो, न कि मुनाफा कमाना। बच्चों का स्कूल पहुंचना सुनिश्चित करने के साथ यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि उनकी शिक्षा की प्रक्रिया निर्बाध रूप से चलती रहे। उसमें महंगी फीस से कोई व्यवधान उत्पन्न न हो। बच्चों का मनोबल ऊंचा हो। निर्धन व वंचित समाज के बच्चे खुद को सक्षम बनाकर देश के आर्थिक विकास में अपना योगदान दे सकें। कोशिश इस बात की होनी चाहिए कि सरकारी स्कूलों में छात्रों की संख्या पर्याप्त हो। शिक्षा की गुणवत्ता का स्तर सुधरे। सभी सरकारी कर्मचारियों को बाध्य किया जाये कि वे अपने बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ाएं। सरकार को आय के अन्य संसाधन जुटाकर अभिभावकों पर से फीस का बोझ कम करना चाहिए। निस्संदेह पाठयक्रम में गुणवत्ता को बढ़ावा देना हर सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। ऐसे में केंद्र सरकार की शिक्षा नीति में बदलाव करने के दावे बेमानी लगते हैं। दलील है कि शिक्षा प्रणाली में बदलाव की कोशिशें की जा रही हैं। सीबीएसई की फीस को नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओपन स्कूलिंग के समकक्ष करने की दलीलें तार्किक नजर नहीं आतीं। सीबीएसई की औपचारिक पढ़ाई के खर्च व व्यावहारिकता की तुलना दूरस्थ शिक्षा के प्रावधानों से नहीं की जा सकती। ऐसे में सीबीएसई से संबद्ध इक्कीस हजार स्कूलों में फीस बढ़ाने का बोझ आखिरकार अभिभावकों पर ही पड़ेगा। बोर्ड को अपने फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए।


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