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फ्लैशबैक

Posted On August - 31 - 2019

हिंदी फीचर फिल्म : फिर सुबह होगी

शारा
‘रेलवे प्लेटफार्म’ नामक फिल्म में अपने निर्देशन का लोहा दिखाने के बाद रमेश सहगल ने जब ‘फिर सुबह होगी’ फिल्म का निर्देशन अपने हाथ में लिया तो उन्हें गीतकार के तौर पर साहिर लुधियानवी के अलावा कोई ऐसा प्रगतिशील चेहरा नजर नहीं आया जो दोस्तोयेव्स्की के उपन्यास ‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ की आत्मा का अपने गीतों के जरिए जन-जन से तआरुफ कराए। रमेश सहगल जब फिल्म की पटकथा का मसौदा लेकर साहिर के पास गए तो उन्होंने रमेश सहगल के सामने शर्त रख दी कि वे उनकी फिल्म के लिए गीत तभी लिखेंगे जब वह संगीतकार के तौर पर खय्याम को अनुबंधित करेंगे। चूंकि हीरो के तौर पर रमेश सहगल राजकपूर को साइन कर चुके थे और राजकपूर के हीरो होने के मायने सभी को पता थे कि जहां-जहां राजकपूर, वहां-वहां शंकर जयकिशन की जोड़ी। इस जोड़ी का साथ राजकपूर की कई फिल्मों में रहा और गाने लोकप्रिय भी हुए। फिर खय्याम का नाम तो फिल्मी जगत के लिए नया था, सो रमेश सहगल ने साहिर की शर्त को एक नयी शर्त के साथ मंजूरी दे दी कि अगर खय्याम राजकपूर को संतुष्ट करने में सफल हो जाते हैं तो उन्हें एतराज नहीं होगा। जब खय्याम से राजकपूर को मिलाया गया तो राजकपूर ने खय्याम के हाथ में तानपुरा थमाकर फिल्म का गीत ‘वो सुबह कभी तो आयेगी’ को संगीत देने के लिए कहा। खय्याम ने तानपुरा थाम कर इस गीत के लिए एक नहीं, पूरी पांच धुनें सुनायीं। उनकी धुनों से राजकपूर इतने जज्बाती हो गए कि उन्होंने खय्याम को गले लगा लिया और कहा कि इन गीतों को संगीत से आप ही सजा सकते हैं। यह फिल्म खय्याम के संगीत से इतनी सजी कि इस फिल्म को खय्याम की फिल्म जाना जाता है। रमेश सहगल का निर्देशन कमाल का है लेकिन संगीत ने जो धार दी वह फिल्म को अमर कर गयी। सुनिए जरा आशा भोसले और मुकेश का गाया गीत ‘वो सुबह कभी तो आएगी।’ आरोह-अवरोह क्रम को कैसे संतुलित किया है? एक गीत से सारी फिल्म का सेंट्रल आइडिया आंखों के सामने परत-दर-परत छवियां बनकर आता है। गीत में समाज का सर्वहारा वर्ग है, जो सपने पालता है और उन सपनों को हकीकत में बदलते-बदलते दम तोड़ देता है। लेकिन उसकी आस का पंछी सपनों के फलक को छोड़ता नहीं। क्या करे? सपने न हों तो जीवन का यथार्थ व्यक्ति को एक पल भी जीने न दे। इस फिल्म के जरिए नेहरू के समाजवाद की जितनी बखिया उधेड़ी है, शायद ही किसी फिल्म में ऐसा हुआ हो। पाठक जरा मुकेश के गाये उस गीत को सुनें जो हीरो पर फिल्माया गया है—‘रहने को घर नहीं पर सारा जहां हमारा’ आजादी के बाद बेहतर कल की तलाश में गांव से शहर भागते हर उस युवक का गीत है, जो व्यवस्था से उपजी असमानताओं तथा नेताओं की वादाखिलाफी पर छींटाकशी करता है कि ‘वसुधैव कुटुम्बकम‍्’ का नारा तभी कानों में रस घोलेगा जब सिर पर छत होगी। ऐसी थोथी और ओछी राष्ट्रवादिता उसके किस काम की?
खय्याम अपने संगीत में ग़ज़ल का समावेश करने के लिए मशहूर हैं। इस फिल्म के गानों के अलावा उन्होंने उमराव जान, कभी-कभी, रजिया सुलतान जैसी फिल्मों के लिए भी संगीत दिया। उमराव जान में रेखा की भवें इसीलिए बोल उठती हैं क्योंकि गीत के साथ सुर हैं तभी लय और ताल का तारतम्य हुआ है। रजिया सुलतान फिल्म का गीत ‘ऐ दिले नादां’ याद करिए। ‘ऐ दिले नादां’ के बाद कुछ देर का वकफा दिया गया है। यही खय्याम का संगीत है जो आपको मुरीद बना लेता है। बताते हैं कि राजेश खन्ना खय्याम के संगीत के इस कदर दीवाने हो गए थे कि एक बार उन्होंने खय्याम को अपनी कार तक दे दी थी।
इस संगीतकार की खासियत थी कि वह उन्हीं गीतों को धुनें देते थे जो कविता की श्रेणी में आती थीं। ऐसा बहुत कम हुआ कि उन्होंने ‘चलताऊ’ कविताओं को संगीत दिया हो। उनका अभी पिछले दिनों निधन हुआ। पंजाब के राहों नामक छोटे से कस्बे से निकले इस युवक ने ढेर सारे इनाम जीते। उनकी शादी जगजीत कौर से हुई थी। उमराव जान फिल्म में ‘काहे को ब्याही विदेस’ तथा बाजार फिल्म में ‘देख लो आज हमको जी भर के’ जगजीत कौर द्वारा ही गाये गये थे। लब्बोलुआब यह कि संगीत न होता तो कुछ फिल्में इतनी कलात्मक नहीं बनतीं। ‘फिर सुबह होगी’ के जरिए दोस्तोयेव्स्की को अमर करने वाले साहिर और खय्याम ही थे। दरअसल, फिल्म में इंस्पेक्टर का रोल करने वाले मुबारक दोस्तोयेव्स्की के उपन्यास की पटकथा लेकर रमेश सहगल के पास आए थे। यह फिल्म इतनी हिट हुई कि 1958 में रिलीज चौथी बड़ी कमाऊ फिल्म साबित हुई। इसी साल मधुमति, यहूदी और चलती का नाम गाड़ी भी रिलीज हुई थीं और बॉक्स ऑफिस पर खूब कामयाब हुईं। नेहरू के समाजवाद पर तंज कसती यह फिल्म बाद में भाजपाइयों को खूब भायी जब उनकी पार्टी दिल्ली म्युनिसिपल कमेटी के चुनावों में पिट गयी तो आडवाणी के साथ अटल बिहारी वाजपेयी ने यही फिल्म देखने के बाद कहा था कि हमारी भी फिर सुबह होगी। और उनकी ऐसी सुबह हुई कि एक नेता देश का प्रधानमंत्री बन गया और दूसरा उपप्रधानमंत्री। इसमें राजकपूर अपने सर्वोत्तम अभिनय के साथ दर्शकों से रूबरू हुए हैं। हत्या का गिल्ट लेकर जीना राजकपूर के बूते की बात थी। उसके सपने, उसकी आकांक्षाएं फिर एक सपने को साकार करने के लिए दूसरे सपने की हत्या करना जैसे भावों को राजकपूर ही अभिनीत कर सकते हैं। माला सिन्हा ने भी कमाल की एक्टिंग की है। इस फिल्म में रहमान को बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर के लिए फिल्म फेयर अवार्ड हेतु नामांकित किया गया जबकि राजकपूर को बेस्ट एक्टर के लिए। फिल्म में राम (राजकपूर) कानून की पढ़ाई करने वाला छात्र है, जो मां द्वारा भेजे जाने वाले मनीआर्डर से अपनी रोजी-रोटी तथा कॉलेज की फीस का जुगाड़ करता है। जब कभी मनीआर्डर लेट हो जाता है तो वह सूदखोर बनिये के पास अपनी कोई न कोई चीज गिरवी रख देता है और काम चला लेता है। एक बार वह किसी गरीब बच्चे की जान बचाता है और अपनी फीस के लिए बचा कर रखे पैसों से वह उस डाक्टर की फीस चुका देता है, जिसने बच्चे की जान बचाई है। उसे लगता है कि इन पैसों की बच्चे को ज्यादा जरूरत है। वह बच्चे का हाल जानने के लिए उसके घर जाता है, जहां बच्चे की बहन सोहनी (माला सिन्हा) के प्यार में पड़ जाता है। सोहनी पड़ोसियों के कपड़े सिलकर घर की आजीविका चलाती है। सोहनी का पिता गोपाल (नाना पल्सिकर) शराबी है और सोहनी पर बुरी आंख रखने वाला हरबंस लाल (जगदीश सेठी) गोपाल को उधार शराब इसलिए देता है क्योंकि वह उसकी बेटी सोहनी से शादी करना चाहता है। उधारी की एवज में जब शराबी बाप सोहनी की शादी हरबंस से तय कर देता है तो सोहनी राम से मदद की गुहार करती है। राम हरबंस से बातचीत के जरिए समस्या सुलझाना चाहता है। लेकिन जब बात नहीं बनती तो गोपाल पर बनती हरबंस की उधारी चुकाने के लिए अपने सूदखोर बनिये के यहां डाका डाल देता है। प्रत्युत्तर में मारपीट होने पर किसी तरह राम के हाथों सूदखोर का खून हो जाता है। बाद में शराब की अधिक मात्रा के कारण गोपाल की मृत्यु हो जाती है। उधर राम के कालेज का साथी रहमान (रहमान) हरबंस से सोहनी की शादी रुकवाने में कामयाब हो जाता है। सूदखोर की हत्या के आरोप में पुलिस एक अन्य व्यक्ति को गिरफ्तार कर लेती है और वह जेल जाने वाला होता है कि राम पुलिस के सामने अपने जुर्म का इकबाल कर लेता है। लेकिन अदालत में अपने बचाव में कहता है कि असली कातिल हमारा समाज है जो गांव से आये शरीफ युवकों को इस ओर धकेलता है।

निर्माण टीम
प्रोड्यूसर व निर्देशक : रमेश सहगल
गीतकार : साहिर लुधियानवी
संगीतकार : खय्याम
सिनेमैटोग्राफी : कृष्ण सहगल
सितारे : राजकपूर, माला सिन्हा, मुबारक, रहमान, टुनटुन, नाना पल्सिकर, लीला चिटनिस

गीत
वो सुबह कभी तो आएगी : मुकेश
आसमां पे है खुदा और जमीन पर हम : मुकेश
वो सुबह कभी तो आएगी : मुकेश, आशा भोसले
चीन-ओ-अरब हमारा : मुकेश
फिर न कीजे मेरी गुस्ताख निगाही : मुकेश, आशा भोसले
जिस प्यार में यह हाल हो : मुहम्मद रफी, मुकेश
दो बूंदें सावन की : आशा भोसले


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