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फीकी रह गई साहो की रंगत

Posted On August - 31 - 2019

पिछले करीब एक साल से प्रभास और श्रद्धा कपूर अभिनीत फिल्म साहो की चर्चा थी। फिल्म का पोस्टर जारी हो या टीजर अथवा ट्रेलर, लोग इनके दीवाने हो चुके थे। बॉक्स ऑफिस भी दोनों बांहें फैलाए साहो का स्वागत करने को आतुर था। कुल मिलाकर हॉलीवुड की तरह एक्शन वाली फिल्म को लेकर कयास थे कि फिल्म बाहुबली जैसा प्रदर्शन जरूर करेगी या फिर उससे भी आगे जाएगी। लेकिन जैसा कि कहा जाता है, हर पीली चीज सोना नहीं होती। प्रभास की यह फिल्म कई मायनों में तो चमकी, पर कुछ मायनों में इसकी रंगत फीकी रह गई।
फिल्म में सबकुछ है, एक्शन, गाने, रोमांस, एक्टिंग। फिर ऐसा क्या है कि फिल्म पहले दिन धूम नहीं मचा सकी। इसकी कहानी दो हजार करोड़ रुपए की चोरी की है और उसके बाद ब्लैक बॉक्स का भी चक्कर है। ऐसे में चोरी का मामला निपटाने आते हैं अंडरकवर पुलिस अधिकारी प्रभास। कहानी दुनिया के सबसे ज्यादा शक्तिशाली और सिंडिकेट अपराध माफिया की राइवलरी पर आधारित है, जहां रॉय ग्रुप का चीफ (जैकी श्रॉफ) को साजिश के तहत मार दिया जाता है और चंकी पांडे का किरदार खुद को उसकी गद्दी का वारिस घोषित कर देता है। सत्ता की इस लड़ाई में एक तरफ अरुण विजय और मंदिरा बेदी की पार्टी है, तो दूसरी तरफ चंकी पांडे, महेश मांजरेकर, लाल और टीनू आंनद हैं।
तभी मुंबई में हुई एक बहुत बड़ी और रहस्यमई डकैती के साथ अशोक (प्रभास) की एंट्री होती है। वह अपनी साथी फीमेल कॉप अमृता (श्रद्धा कपूर) और साथी पुलिस वाले डेविड (मुरली शर्मा) के साथ मिलकर डकैती का सुराग हासिल करता है और इस बात का खुलासा करता है कि इस डैकती का मास्टर माइंड नील नितिन का किरदार है। श्रद्धा ने भी खूब दांव-पेंच दिखाए हैं। प्रभास तो इसमें माहिर हैं, लेकिन कहानी कहीं-कहीं पर उलझ जाती है, जिससे फिल्म रुकी हुई सी लगती है।
सुजीत ने निर्देशन की कोशिश की है, लेकिन अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतर पाए। प्रभास की संवाद अदायगी भी अखरती है। चंकी पांडे ने एक्टिंग से दिल जीत लिया है, जबकि श्रद्धा कपूर अपनी अहमियत साबित नहीं कर पाती हैं। छुट्टियों में इसे एक बार देख सकते हैं।
-धर्मपाल

 


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