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फिर सोनिया गांधी

Posted On August - 12 - 2019

हरीश लखेड़ा
कांग्रेस को फिर सोनिया गांधी की शरण लेनी पड़ी है। राहुल गांधी के ‘रणछोड़ जी’ बनने के बाद संकट में आई कांग्रेस के सामने सोनिया से बेहतर कोई विकल्प भी नहीं था। इसलिए राहुल के कांग्रेस का अगला अध्यक्ष नेहरू-गांधी परिवार से बाहर के व्यक्ति को बनाने के बयान के बावजूद कांग्रेस मौजूदा हालात में ऐसा जोखिम उठाने के लिए तैयार नहीं हुई। इसलिए कांग्रेस की सर्वोच्च नीति निर्धारक संस्था कार्यसमिति (सीडब्ल्यूसी) सिर्फ नेहरू-गांधी परिवार के इर्द-गिर्द ही नया अध्यक्ष तलाशती रही। अध्यक्ष चयन करने को लेकर पार्टी की खोज गांधी परिवार से शुरू होकर गांधी परिवार पर ही खत्म हो गई।
देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस की ओर से सोनिया को अंतरिम अध्यक्ष बनाने के साथ ही यह साफ हो गया है कि देश की आजादी में अग्रणी भूमिका निभाने वाली कांग्रेस के लिए अब नेहरू-गांधी परिवार की छत्रछाया से बाहर रह पाना संभव नहीं है। वह इस परिवार के खूंटे से बंधकर खुद को सुरक्षित मानती है। इसलिए राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद कांग्रेस उन्हें मनाने में जुटी रही। उनके नहीं मानने के बाद जब कार्यसमिति ने 5 समूहों के माध्यम से देशभर के कांग्रेसजनों से राय शुमारी की तो भी अध्यक्ष के लिए पहला नाम राहुल का ही आया। प्रदेश कांंग्रेस अध्यक्षों, विधानसभाओं में कांग्रेस दल के नेताओं से लेकर फ्रंटल संगठनों के नेताओं ने साफ कह दिया कि नेहरू-गांधी परिवार के नेतृत्व के बिना पार्टी बिखर जाएगी। इसके बाद, शनिवार देर रात आखिरकार सोनिया को पार्टी का अंतरिम अध्यक्ष बना दिया गया। कांग्रेस के संविधान के तहत कार्यसमिति अंतरिम अध्यक्ष चुन सकती है। अब पूर्णकालिक अध्यक्ष बनने के लिए कांग्रेस के अधिवेशन में कार्यसमिति के फैसले पर मुहर लगानी होगी। इसलिए कार्यसमिति ने सोनिया को अंतरिम अध्यक्ष चुनने के साथ अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के प्लेनरी सत्र में अध्यक्ष के चुनाव का प्रस्ताव भी पारित किया। इससे साफ है कि अब कांग्रेस का अधिवेशन बुलाकर सोनिया गांधी को पार्टी का फिर से पूर्णकालिक अध्यक्ष बनाने का रास्ता भी साफ कर दिया गया है।
पहले से माना जा रहा था कि नेहरू-गांधी परिवार के रहते हुए पार्टी की कमान किसी बाहर के व्यक्ति को सौंपी जाएगी, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। कांग्रेस के पास विकल्प के तौर पर सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी रह गए थे। अब माना जा रहा है कि कुछ समय कांग्रेस की कमान सोनिया के पास रखने के दौरान प्रियंका के लिए रास्ता तैयार किया जाएगा। प्रियंका को अभी कमान नहीं सौंपने के पीछे कांग्रेस का संकट है। कांग्रेस धारा-370 पर बंटी है, उसे शीघ्र ही 4 राज्यों के चुनाव में जाना है और पार्टी में बिखराव भी चल रहा है। कई नेता पार्टी को अलविदा कह कर भाजपा में शामिल हो चुके हैं। ऐसे में कांग्रेस के पास अनुभवी सोनिया को कमान सौंपने के अलावा दूसरा रास्ता ही नहीं था।
ऐसा नहीं है कि कांग्रेस को सिर्फ नेहरू-गांधी परिवार ही चला पाया हो। आजादी के बाद पार्टी की कमान थामने कुल 18 नेताओं में से 12 नेहरू-गांधी परिवार से बाहर के रहे हैं। इंदिरा गांधी के समय से कांग्रेस इस परिवार पर ज्यादा निर्भर होने लगी थी। देश के आजाद होने के बाद कांग्रेस में गैर नेहरू-गांधी परिवार से आचार्य कृपलानी, पट्टाभि सीतारमैया, पुरुषोत्तम दास टंडन, उच्छंगराय नवलशंकर ढेबर, नीलम संजीव रेड्डी, के कामराज, एस निजलिंगप्पा, जगजीवन राम, शंकरदयाल शर्मा, देवकांत बरुआ, पीवी नरसिम्हा राव और सीताराम केसरी कांग्रेस के अध्यक्ष रहे हैं। इनमें से नरसिंह राव तो सफल प्रधानमंत्री भी साबित हुए, जबकि इस परिवार से पं. जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी तो प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष भी रहे। सोनिया गांधी ने दो दशक तक कांग्रेस की बागडोर संभाली। वे आजादी के बाद सबसे ज्यादा समय तक कांग्रेस अध्यक्ष रही हैं। कांग्रेस में लाल बहादुर शास्त्री और डा. मनमोहन सिंह ही मात्र ऐसे नेता हैं जो प्रधानमंत्री तो रहे, लेकिन पार्टी अध्यक्ष नहीं बन पाये।
आजादी के शुरुआती दौर में तो कांग्रेस के सामने कोई चुनौती नहीं थी। इसलिए अध्यक्ष कोई भी रहा हो, जवाहरलाल नेहरू के नाम पर कांग्रेस चुनाव जीतती रही। गांधी परिवार के अध्यक्षों के नेतृत्व में कांग्रेस ने 10 में से 4 चुनाव हारे हैं। यहां तक कि राजीव गांधी, सोनिया और राहुल के नेतृत्व में भी पार्टी को हार मिली है। 1975 में देश में आपातकाल लगाने के बाद 1977 में कांग्रेस चुनाव हार गई। लेकिन 1980 में कांग्रेस की सत्ता में वापसी हो गई, तब पार्टी की कमान देवकांत बरुआ के पास थी। इसके बाद, राजीव गांधी के अध्यक्ष रहते हुए कांग्रेस को हार का स्वाद चखना पड़ा था। राजीव गांधी 1985 में अध्यक्ष बने और 1989 के चुनाव हार गए। इसके बाद, नरसिंह राव और सीताराम केसरी के जमाने में भी पार्टी की दुर्गति हुई। पार्टी 1996 का चुनाव हार गई। सीताराम केसरी को बेइज्जत करके पार्टी अध्यक्ष पद से हटाया गया था। सोनिया गांधी 1998 मंे कांग्रेस की अध्यक्ष बनीं, लेकिन पार्टी 1999 का चुनाव हार गई। इसके बाद 2014 में भी कांग्रेस हार गई। 2014 में पार्टी 44 सीटों पर सिमट गई थी, 2019 के चुनाव के दौरान राहुल गांधी अध्यक्ष थे। इस बार कांग्रेस 52 सीटें ही जीत सकी। कांग्रेस को लगातार दूसरी बार इतनी कम सीटें मिली कि उसे लोकसभा में विपक्ष के नेता का पद भी नहीं मिल पाया है। यानी उसे लोकसभा की कुल सीटों का 10 फीसदी सीटें भी नहीं मिलीं।
युवा नेताओं पर भारी पड़े बुजुर्ग नेता
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता व प्रवक्ता रहे वीएन गाडगिल ने एक बार कहा था कि कांग्रेस ऐसी ट्रेन का डिब्बा है, जो पूरी तरह से भरा रहता है और जहां धक्का-मुक्की के बाद ही अंदर घुसा जा सकता है। एक बार कोई अंदर घुस गया तो दूसरे को नहीं घुसने देता है। यही वजह है कि भाजपा में जहां 10 साल पुराने पदाधिकारियों में से शायद ही कोई होगा, लेकिन कांग्रेस संगठन में 25-30 साल से नेता पदों पर जमे हैं। इनमें मोती लाल बोरा, अहमद पटेल, गुलाम नबी आजाद, मुकुल वासनिक जैसे नेताओं की फेहरिस्त लंबी है। सोनिया को फिर से पार्टी की कमान सौंपे जाने की कवायद को युवा नेताओं पर बुजुर्गों की फतह के तौर पर भी लिया जा रहा है। राहुल गांधी ने चुनावी हार की समीक्षा के समय इस्तीफा देते हुए यह भी कहा था कि वे इस बात से दुखी हैं कि उनके इस्तीफे के बावजूद पार्टी शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों, महासचिवों, प्रभारियों और वरिष्ठ नेताओं को अपनी जवाबदेही का अहसास नहीं हुआ। दरअसल, राहुल गांधी ने राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ को लेकर विशेष रूप से नाराजगी जताई थी। राहुल चाहते थे कि गैर नेहरू-गांधी परिवार के किसी युवा को पार्टी की कमान सौंपी जाए। इससे बुजुर्ग नेताओं को पदों से मुक्ति दिलाई जा सकती थी, लेकिन नतीजा सामने है। सोनिया के अध्यक्ष बनने से बुजुर्ग नेता भी पदों पर बने रहेंगे।
कांग्रेस की मौजूदा चुनौतियां
अब सोनिया की चुनौतियां भी कम नहीं हैं। धारा- 370 पर पार्टी बंटी है। संसद में पार्टी इस मुद्दे पर मोदी सरकार का मुखर विरोध कर चुकी है, जबकि डा. कर्ण सिंह, जनार्दन द्विवेदी, ज्योतिरादित्य सिंधिया, दीपेंद्र हुड्डा समेत कई नेता मोदी सरकार के फैसले का समर्थन कर चुके हैं। यहां तक कि संसद में कांग्रेस के चीफ ह्विप महेश्वर कालिता मोदी सरकार के फैसले का स्वागत करते हुए भाजपा में चले गए हैं। सोनिया को अब इस मुद्दे पर पार्टी में एक राय बनानी होगी। इसके अलावा, कांग्रेस को अगले कुछ माह के दौरान हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड व दिल्ली में विधानसभा की सियासी जंग में उतरना है। इनमें से ज्यादातर राज्यों में उसका मुकाबला उसी भाजपा से है, जिससे उसने लोकसभा चुनाव में मात खाई है। हरियाणा में तो पार्टी पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा और प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर के खेमों में बंटी है। हाईकमान के रुख से खफा हुड्डा को लेकर कहा जा रहा है कि वे अलग दल बनाने की भी सोच रहे हैं। महाराष्ट्र में कांग्रेस के पास प्रदेश अध्यक्ष ही नहीं है। प्रदेश अध्यक्ष अशोक चव्हाण भी लोकसभा चुनाव में हार की जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे चुके हैं। झारखंड में भी कांग्रेस आंतरिक कलह से जूझ रही है। इसके अलावा, मात्र 5 राज्यों में सिमट चुकी कांग्रेस की कुछ राज्य सरकारें भी संकट में हैं। मध्यप्रदेश, राजस्थान, पंजाब, छत्तीसगढ़ और पुड्डुचेरी में कांग्रेस की सरकारें हैं। कर्नाटक में कांग्रेस-जेडीएस सरकार की विदाई हो चुकी है और अब वहां भाजपा की सरकार है। माना जा रहा है कि मध्य प्रदेश और राजस्थान में भी खतरा बरकरार है। मध्य प्रदेश विधानसभा की 230 सीटों में कांग्रेस के 114 विधायक हैं। प्रदेश की कमलनाथ सरकार सपा-बसपा के एक-एक विधायक तथा 4 सीटों पर निदर्लीयों के समर्थन से चल रही है। ऐसे में यदि कर्नाटक की तरह कुछ विधायक पाला बदल लें या इस्तीफा दे दें तो यह राज्य भी कांग्रेस के हाथ से निकल जाएगा। हालांकि, मध्य प्रदेश में कमलनाथ अभी तो भाजपा के कुछ विधायकों को अपने साथ लाने में सफल होते दिख रहे हैं। राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट के मतभेद खुल कर सामने आ जाने के बाद वहां भी सब ठीक नहीं चल रहा है। इसके अलावा, राज्यों से कांग्रेस नेताओं-विधायकों का पार्टी छोड़ने का सिलसिला भी जारी है। अमेठी-सुलतानपुर क्षेत्र के नेता संजय सिंह अब भाजपा में चले गए हैं। इससे पहले तेलंगाना में कांग्रेस के कुल 18 में से 12 विधायक सत्तारूढ़ तेलंगाना राष्ट्र समिति में शामिल हो चुके हैं। इससे प्रदेश में कांग्रेस से मुख्य विपक्षी दल का ओहदा भी छिन गया है। इसके बाद, गोवा में कांग्रेस के 15 में से 10 विधायक भाजपा का दामन थाम चुके हैं। वहां भाजपा के विधायकों की संख्या बढ़कर 27 हो गई है, जबकि कांग्रेस के पास मात्र 5 विधायक रह गए हैं। आए दिन पार्टी के बड़े नेता व विधायक दूसरे दलों का रुख कर रहे हैं। ऐसी भगदड़ तो कांग्रेस के सबसे कमजोर माने जाने वाले अध्यक्ष सीताराम केसरी के समय में भी नहीं मची थी।
दरअसल, कांग्रेस का संगठन अब इस तरह का बन चुका है कि वह नेहरू-गांधी परिवार के बिना चल ही नहीं सकता है। राज्यों में कांंग्रेस पार्टी नहीं है, वह विभिन्न नेताओं के झुंड में काम करती है। ये नेता प्रदेश में एक-दूसरे के खिलाफ आपस में लड़ते रहते हैं, लेकिन केंद्र में उन सभी की आस्था नेहरू-गांधी परिवार के प्रति रहती है। इसलिए तय है कि कांग्रेस के नेता देर-सबेर इस परिवार के किसी नेता को पार्टी की कमान थामने के लिए मना ही लेंगे। इसलिए तय है कि अध्यक्ष कोई भी रहे कांग्रेस में आगे भी नेहरू-गांधी परिवार की ही चलेगी। क्योंकि यह परिवार कांग्रेस की मजबूरी भी है।
पिछले 5 दशक में कांग्रेस अध्यक्ष

1969 जगजीवन राम
वे निर्विरोध कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष बने। उनके अध्यक्ष रहते कांग्रेस 1971 के आम चुनावों में ऐतिहासिक व प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में लौटी थी।

1972 शंकर दयाल शर्मा
इंदिरा गांधी के दबदबे वाले दौर में शंकर दयाल शर्मा कांग्रेस के अध्यक्ष बने। इस दौरान उन्होंने कांग्रेस को एकजुट रखा।

1975 देवकांत बरुआ
आपातकाल के दौरान देवकांत बरुआ कांग्रेस के अध्यक्ष थे। उन्हें उनके बयान ‘इंदिरा भारत है, भारत इंदिरा है’ के लिए जाना जाता है।

1978 इंदिरा गांधी
बरुआ के बाद कांग्रेस की कमान इंदिरा गांधी के हाथ में आ गई। वे 7 साल कांंग्रेस पार्टी की अध्यक्ष रहीं।

1985 राजीव गांधी
इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उनके बेटे राजीव गांधी ने कांग्रेस की कमान संभाली। वे भी सात साल कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर रहे।

1992 पीवी नरसिम्हा राव
राजीव गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस में अध्यक्ष पद को लेकर काफी असमंजस की स्थिति रही। हालांकि, बाद में पीवी नरसिम्हा राव को अध्यक्ष बनाया गया।

1997 सीताराम केसरी
नरसिम्हा राव के बाद सीताराम केसरी को अध्यक्ष बनाया गया। उनके कार्यकाल में कांग्रेस मध्यावधि चुनाव में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाई।

1998 सोनिया गांधी
1998 के चुनाव में हार के बाद कांग्रेस ने फिर गांधी परिवार का सहारा लिया अौर सोिनया गांधी को अध्यक्ष बनाया।

2017 राहुल गांधी
सोनिया के अध्यक्ष रहते पहले राहुल गांधी को उपाध्यक्ष बनाया गया और फिर अध्यक्ष पद की कमान दी गयी।

देर-सवेेर आएंगी प्रियंका ही
कांग्रेस ने भले ही अभी सोनिया गांधी को अंतरिम अध्यक्ष बना दिया हो, लेकिन माना जा रहा है कि देर-सवेर प्रियंका ही कांग्रेस को संभालेंगी। वे इसके लिए इच्छुक भी बताई जाती हैं। सोनिया के अंतरिम अध्यक्ष बनने के बाद अब माना जा रहा है कि कुछ समय कांग्रेस की कमान सोनिया के पास रखने के दौरान प्रियंका के लिए रास्ता तैयार किया जाएगा। कांग्रेस नेताओं के लिए कहा जाता है कि वे भले ही भाजपा से हार मान लें, जनता के बीच जाने से कतराने लगें, लेकिन वे नेहरू-गांधी परिवार को मना लेने की लड़ाई लड़ने में कभी भी हार नहीं मानते। यह उन्होंने इस बार भी साबित कर दिया है। राहुल गांधी साफ कह चुके थे कि पार्टी का नया अध्यक्ष नेहरू-गांधी परिवार से बाहर का नेता होगा, लेकिन कांग्रेस ने सोनिया को मना ही लिया। इससे पहले, 90 के दशक में राजीव गांधी की हत्या के बाद सोनिया गांधी ने राजनीति में आने से साफ इनकार कर दिया था, लेकिन तब नारायण दत्त तिवारी, अर्जुन सिंह जैसे कई नेता थे, जो आए दिन 10 जनपथ जाते थे और सोनिया गांधी के सामने गिड़गिड़ाते थे कि कांग्रेस को बचा लो। आखिरकार सोनिया ‘पिघल’ गई और 1998 में राजनीति में आ गईं।


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