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पिताजी की नसीहत

Posted On August - 11 - 2019

खुशवीर मोठसरा

मैं उस वक्त पांचवीं कक्षा का विद्यार्थी था। उस समय सरकारी स्कूल ही पढ़ाई का एकमात्र माध्यम था। स्कूल में एक ही कक्षा के कई सेक्शन होते थे। हमारी कक्षा के भी दो सेक्शन थे। सर्दियों के दिनों में सभी कक्षाएं खुले मैदान में लगती थीं। हमारे सेक्शन में हम चार-पांच मनचले बच्चे ऐसे थे कि कक्षा में यदि टीचर समय पर नहीं पहुंचे तो बंक मार लेते थे। बंक मारने के पश्चात स्कूल के साथ लगते तालाब के पेड़ों के नीचे खेलने के लिए निकल पड़ते।
उस दिन भी हम पांचों कक्षा में टीचर नहीं आये तो धीरे-धीरे खिसक गये। भागकर हम तालाब के साथ लगते पेड़ों के नीचे खेलने लगे। अचानक एक छात्र सत्यप्रकाश ने जेब से बीड़ी का बंडल निकाला और सबको एक-एक बीड़ी देकर बोला, ‘मैं आज तुम्हें बीड़ी पीना सिखाता हूं।’ उसने बीड़ी सुलगाई और आराम से कश खींचने लगा। उसने मेरी और अन्य मित्रों की बीड़ी सुलगा दी और बोला, तुम भी कश खींचो। हम सबने ज्यों ही कश खींचा तो बड़े जोर की खांसी आई। इतनी जोर की खांसी कि खांसते-खांसते आंखों में पानी भर गया। हमें एक साथ खांसते हुए देखकर हमारे एक चाचा, जो उस समय वहीं बाड़े में थे, उन्होंने हमें देख लिया। बीड़ी हमारे मुंह में थी, उन्होंने हमें धमकाया और कहा कि इस बारे में वह घरवालों से शिकायत करेगा। हम सभी वहां से भाग खड़े हुए। साथ में डर भी बहुत लग रहा था कि घर में इस बात का पता चलेगा तो हम सबकी जमकर पिटाई होगी।
उसके बाद हम सभी कक्षा में आये। शाम को छुट्टी होने पर डरते हुए घर पहुंचे। पिताजी तब खेत से घर नहीं आये थे। वे सूर्यास्त के बाद घर आये। पिताजी को दिन की सारी घटना का पता चल चुका था। उन्होंने मुझे अपने पास बुलाया। मैं समझ चुका था कि अब खैर नहीं। लेकिन पिताजी ने बड़े प्यार से सिर पर हाथ फेरकर धूम्रपान से होने वाले नुकसान के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने बताया कि उन्हें भी धूम्रपान की आदत मेरी तरह ही लगी थी लेकिन उस समय समझाने वाला कोई नहीं था। बस ज़िंदगी का वह दिन था, उसके बाद मैंने कभी भी किसी रूप में तम्बाकू का सेवन नहीं किया। मैंने अपनी अगली पीढ़ी को भी यही सीख दी है। वे भी किसी प्रकार का तम्बाकू का सेवन नहीं करते हैं। मेरा एक आठ साल का पोता है उसको भी मैं यही सीख दूंगा जो पिताजी ने मुझे दी थी। आज भी पिताजी की दी हुई सीख मेरे ज़ेहन में तरोताजा है।


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