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नयी खोजों का दौर जारी

Posted On August - 18 - 2019

कुमार गौरव अजीतेन्दु

दुनिया का सबसे छोटा लैपटॉप
पॉकेट वीडियोगेम का भी एक ज़माना हुआ करता था। बाद में उसकी जगह मोबाइल फोन गेम्स ने ले ली और लैपटॉप ने भी। अब ऐसा लैपटॉप आ चुका है, जो कि पुराने जमाने के पॉकेट वीडियोगेम से भी छोटा (लगभग अंगूठी रखने वाली डिबिया के बराबर) है। इसे अमेरिका के आईटी इंजीनियर पॉल क्लिंगर ने दुनिया के सबसे छोटे लैपटॉप के रूप में बनाया है। इस लैपटॉप की स्क्रीन सिर्फ एक इंच की है। इसका डिस्प्ले 0.96 सेमी का है। इसे बनाने में सात दिन लगे और इसमें 85 डॉलर (करीब 6 हजार रुपए) खर्च हुए हैं। पॉल के मुताबिक, उन्होंने इस लैपटॉप का नाम ‘थिंक टिनी’ रखा है। यह लैपटॉप आईबीएम के थिंकपैड का छोटा रूप है। इस छोटे से लैपटॉप में थिंकपैड की तरह कीपैड के बीच में लाल रंग का ट्रैक प्वाइंट स्टाइल कर्सर कंट्रोलर भी दिया गया है। इसमें 300 एमएएच की बैटरी लगी है, जिसे चार्ज भी किया जा सकता है। खास बात यह है कि इस मिनी लैपटॉप में गेम भी खेल सकते हैं। थिंकटिनी में एक 14-पिन एटी टिनी 1614 माइक्रोकंट्रोलर (20 मेगाहर्ट्ज) है, जो एक छोटे 128 ×64 पिक्सेल ओएलईडी डिस्प्ले से जुड़ा है। इसमें 7-लाइनों वाला बोर्ड है।
आया रोबोटिक कॉन्टैक्ट लेंस भी
इस रोबोट युग में सैन डिएगो स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के वैज्ञानिकों ने ऐसा रोबोटिक सॉफ्ट कॉन्टेक्ट लेंस डेवलप कर लिया है, जो इंसानों की आंखों को एडवांस्ड जूम प्रदान करेगा। इतना ही नहीं, इसे कंट्रोल करने के लिए यूज़र को बस अपनी पलक झपकानी होगी या अलग-अलग दिशाओं में आंखों का मूवमेंट करना होगा। इस कार्यक्रम के शोधकर्ता शेंगकियांग काई का कहना है कि आंखों के मूवमेंट, जैसे पलक झपकाना, इनमें सिग्नल देने की ताकत होती है। जब लोग नींद में होते हैं तब भी उनकी आंखों में इलेक्ट्रोऑक्यूलोग्राफिक क्षमता होती है। जब लोग कुछ भी नहीं देख रहे होते हैं तब भी वे अपने आंखों की पुतलियों का मूवमेंट कर इलेक्ट्रोऑक्यूलोग्राफिक सिग्नल जेनरेट कर रहे होते हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए वैज्ञानिकों ने इलेक्ट्रिक इम्पल्स को मापते हुए लेंस की फोकल लेंथ को बदलने का तरीका खोज निकाला। स्टडी में दावा किया गया कि लेंस में काफी सॉफ्ट मैटीरियल का इस्तेमाल किया गया है इसलिए लेंस की फोकल लेंथ को 32 प्रतिशत तक बढ़ाया जा सका। लेंस को डिफॉर्मिंग करके फोकल लेंथ में बदलाव किया गया। एक्सपेरिमेंट में तय डिफॉर्मेशन को प्राप्त करने के लिए डाई-इलेक्ट्रिक इलास्टोमर को इस्तेमाल किया गया। वैज्ञानिकों को आशा है कि भविष्य में इस तकनीक को आंखों के लिए इस्तेमाल होने वाले कृत्रिम अंग, एडजस्टेबल ग्लासेस और रिमोट से ऑपरेट होने वाले रोबोट में इस्तेमाल किया जा सकेगा।
कॉकरोच के आकार का रोबोट
ज्यादातर बच्चे कॉकरोच को देखकर डर जाते हैं लेकिन अब अमेरिकी शोधकर्ताओं ने कॉकरोच के आकार का रोबोट तैयार किया है। यह ज़मीन पर तेज़ रफ्तार से दौड़ेगा। इतना ही नहीं, यदि इस पर कोई इनसान पैर रख दे तो भी यह टूटेगा नहीं। यह रोबोट 60 किलो तक का भार सह सकता है। शोधकर्ताओं का कहना है कि इस रोबोट की मदद से सर्चिंग ऑपरेशन और रेस्क्यू मिशन जैसे काम किए जा सकेंगे। इसे खासतौर पर उन जगहों पर इस्तेमाल किया जाएगा, जहां इनसान, कुत्तों और बड़ी मशीनों का पहुंचना संभव नहीं हो पाता। यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के प्रोफेसर लिवे लिन का कहना है कि इस साइज के ज्यादातर रोबोट काफी नाजुक होते हैं। अगर इन पर पैर रख दिया जाए तो इन्हें काफी नुकसान भी हो जाता है। इसकी मजबूती जांचने के लिए शोधकर्ताओं ने रोबोट पर एक इनसान जितना भार रखा, जिसके बाद भी इसे न कोई नुकसान हुआ, न इसने काम करना बंद किया। इसमें आगे की ओर खास तरह के पैर लगाए गए हैं, जिसकी मदद से किसी इलेक्ट्रिक फील्ड में जाने पर मटेरियल बेंड होकर दोबारा सीधा भी हो जाता है। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह रोबोट दिखने में तो साधारण है लेकिन यह अपने अंदर कई असाधारण क्षमताओं को समेटे हुए हैं। यह ज़मीन पर 20 बॉडी लेंथ प्रति सेकेंड की रफ्तार से दौड़ता है। ठीक वैसे ही जैसे कोई कॉकरोच दौड़ता है। रिपोर्ट के मुताबिक यह कीड़े के आकार का सबसे तेज़ चलने वाला रोबोट है। यह ट्यूब पर फिसल सकता है, छोटी चढ़ाइयों पर चढ़ सकता है और मूंगफली जितना भार लेकर चल सकता है।


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