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दीपू की ख़ुशी

Posted On August - 4 - 2019

आरती लोहानी

दीपू की मां जरा देखो तो दीपू कहां गया हुआ है, ऐसे मौसम में?’ दीपू के पापा ने आवाज लगायी। दीपू की मां ने उसी अंदाज में रसोई से जवाब दिया। ‘वह अपने दोस्त सोनू के घर गया है होमवर्क पूरा करने… दो दिन से तेज बरसात के कारण वह स्कूल नहीं गया था इसलिए।’ पापा को दीपू की चिंता हो रही थी। दरअसल, बरसात का मौसम था, बादल गरज रहे थे और बिजली चमक रही थी। चारों तरफ पानी ही पानी भरा था गली-मोहल्लों में। थोड़ी देर बाद हाथ में छाता लिये दीपू घर आ गया। मम्मी ने कहा ‘अरे दीपू पापा को भी बताकर जाया कर… जब तू बाहर जाये। देखो उन्हें तुम्हारी कितनी चिंता रहती है।’ सॉरी मम्मी अब से बताकर जाऊंगा… मैंने तो आपको बता ही दिया था।’ दीपू ने पापा के सामने खड़े होकर कहा।
जब सारा परिवार खाना खा रहा था तब ही जोर से बादल गरजे… और बहुत तेज बिजली जमीन की ओर लपकी। एक पल के लिए उनकी आंखों के सामने अंधेरा छा गया और कानों से सुनना बंद हो गया।’ हे भगवान कहां गिरी होगी ये बिजली… लगता है अपने ही शहर में गिरी है ये।’ मम्मी ने घबराते हुए कहा। ‘बिजली तो ये आस-पास ही गिरी है… सुबह अख़बार में खबर आयेगी।’ पापा बोले। दीपू से अब रहा नहीं गया उसने पूछा। ‘पापा ये बिजली का गिरना क्या होता है और ये कहां गिरती है?’
‘बेटा जब आसमान में बदल आपस में टकराते हैं तो उनमें चमक पैदा होती है। इस बिजली को ‘तड़ित’ भी कहते हैं। बादलों के घिरे होने के कारण वह जमीन की ओर बढ़ती है और गिरकर वापस ऊपर उठती है।’ पापा ने समझाया। ‘लेकिन पापा बादलों के टकराने की आवाज तो चमक के बाद आई, ऐसा क्यों?’ ‘बेटा ध्वनि की रफ्तार बिजली की रफ्तार से कम होती है, इसलिए ऐसा हुआ।’ यह समझते हुए पापा ने दीपू की जिज्ञासा को शांत किया।
अगले दिन सुबह जब दीपू के पापा ने अख़बार खोला तो सचमुच बिजली गिरने की खबर मोटे-मोटे अक्षरों में छपी थी। उन्होंने कहा, ‘देखो दीपू की मम्मी… तुमने रात को सही कहा था कि आकाशीय बिजली अपने ही शहर में गिरी है। ये तो अपने दीपू के स्कूल के पास ही बने मकानों पर गिर गयी। कई मकानों को इससे बहुत नुकसान पहुंचा है। मम्मी ने पूछा, ‘फिर तो जान-माल का भी नुकसान हुआ होगा न?’ ‘हां चार लोग जख्मी हुए हैं, उनका इलाज चल रहा है।’ पापा ने अख़बार पढ़ते हुए कहा। ‘पापा मेरे स्कूल में तो कोई नुकसान नहीं हुआ न?’दीपू ने पूछा।
‘नहीं तेरा स्कूल बिलकुल सुरक्षित है बेटा।’ पापा ने जवाब दिया। मम्मी ने तुरंत पूछा, ‘जब आस-पास के सभी छोटे-बड़े मकान धराशायी हो गए तो इसका स्कूल कैसे बच गया? वह तो कई मंजिलें इमारत है।’
पापा बोले, ‘हो सकता है इनके स्कूल में तड़ित-गर्जन लगा हो।’ तड़ित-गर्जन ये क्या होता है पापा…?’ दीपू ने जिज्ञासावश पूछा। मम्मी ने भी यह शब्द पहली बार सुना था तो वह भी बोली, ‘क्या होता है ये तड़ित-गर्जन?’ पापा ने अख़बार एक किनारे करते हुए कहा कि ‘बहुमंजिला इमारतों व छत पर देखना वहां एक त्रिशूलनुमा यंत्र लगा होता है।’ ‘हां, पापा हमारे स्कूल की छत पर एक छड़ी तो है।’ दीपू ने पापा की बात का समर्थन करते हुए कहा। ‘हां… वही तड़ित-गर्जन का यंत्र और छड़ है। दरअसल, होता यह है कि एक धातु की चालक छड़ होती है, जिसे भवनों की आकाशीय बिजली से सुरक्षा के लिए लगाया जाता है। तड़ित-चालक का ऊपरी सिरा नुकीला होता है। इसे भवनों के सबसे ऊपरी हिस्से में जड़ दिया जाता है। इन्हें किसी चालक तार आदि से जोड़कर उस तार को नीचे लाकर जमीन में गाड़ दिया जाता है। जब बिजली गिरती है तो छत पर लगी यही छड़ उसकी शक्ति को ग्रहण कर तार के मध्य से जमीन तक पहुंचा देती है और बिजली की ताकत भवन का कुछ नहीं बिगाड़ पाती है।’
दीपू आज दो बातों को लेकर खुश था। पहला यह कि उसका स्कूल सुरक्षित था और दूसरा कि उसे तड़ित-गर्जन की जानकारी मिल गयी थी।


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