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दलबदल से राजबल

Posted On August - 19 - 2019

हरीश लखेड़ा
विश्व की सबसे बड़ी सियासी पार्टी होने का दावा करने वाली भारतीय जनता पार्टी का कुनबा लगातार बढ़ रहा है। यह इसलिए कि भाजपा विभिन्न राज्यों में विपक्षी दलों के नेताओं को बड़ी संख्या में अपने में शामिल कराने के अभियान में जुटी है। एक ओर पार्टी अपनी सदस्यता 11 करोड़ से बढ़ाकर 20 करोड़ तक ले जाने की मुहिम में जुटी है, तो दूसरी ओर विपक्षी दलों के नेताओं के लिए भी उसने अपने द्वार खोल दिए हैं। खासतौर पर जिन राज्यों में उसका जनाधार बहुत कम है, वहां दूसरे दलों के नेताओं को थोक के भाव पार्टी में शामिल कर संगठन मजबूत करने में लगी है। केंद्र में दोबारा सत्ता में लौटने के बाद भाजपा में दूसरे दलों के नेताओं के शामिल होने का सिलसिला तेज हो गया है।
उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक इसी दलबदल के कारण भाजपा का झंडा फहरा रहा है। इस सफलता के लिए भाजपा ने जमीनी कार्यकर्ता तैयार करने की बजाय आयाराम-गयाराम की संस्कृति को आत्मसात कर लिया है। उसने खुद का कुनबा बढ़ाने के लिए दूसरे दलों में सेंध लगाने का आसान रास्ता चुन लिया है। सिक्किम, पश्चिम बंगाल, गोवा, हरियाणा, झारखंड, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, दिल्ली समेत देश के लगभग हर कोने से आए दिन कहीं न कहीं दलबदल करके नेता अब भाजपा का दामन थाम रहे हैं। भाजपा अब ग्राम पंचायतों, स्थानीय निकायों, विधानसभाओं से लेकर संसद तक में दूसरे दलों में खुलेआम सेंध लगा रही है। इसी दलबदल के रास्ते भाजपा पूर्वोत्तर के सीमांत राज्य सिक्किम में एक झटके में मुख्य विपक्षी दल बन गई है, जबकि हाल ही के विधानसभा चुनाव में वहां खाता खोल पाने में भी विफल रही थी। गोवा में जहां उसकी सरकार जाने का खतरा मंडरा रहा था, वहां भी दलबदल कराके अपनी सरकार को स्थायित्व दे चुकी है। संसद के उच्च सदन राज्यसभा में बिलों को पारित कराने के लिए भी भाजपा ने दूसरे दलों में सेंध लगा दी।
यह 21वीं सदी की भाजपा है। नरेंद्र मोदी और अमित शाह की भाजपा अब बहुत बदल गई है, जो साम, दाम, दंड और भेद से भी अपना लक्ष्य पाने में संकोच नहीं करती। अटल-आडवाणी के युग से बाहर आ चुकी भाजपा ने संभवत: इसी कारण अब अपनी वेबसाइट से ‘पार्टी विद डिफरेंस’ का स्लोगन हटा लिया है। पार्टी का अब नया स्लोगन ‘सर्वस्पर्शी भाजपा-सर्व व्यापी भाजपा’ है। इस स्लोगन से भी साफ संदेश जाता है कि भाजपा के लिए अब न तो विचारधारा के ज्यादा मायने हैं न आदर्श के। यही वजह है कि पश्चिम बंगाल में वैचारिक भिन्नता रखने वाले वामपंथी काडर से लेकर तृणमूल कांग्रेस के दागी नेताओं तक के लिए भाजपा के दरवाजे खुले हैं। वास्तव में कांग्रेस मुक्त भारत का नारा देने वाली भाजपा अब खुद कांग्रेस की संस्कृति में रमती जा रही है, जो काम कभी कांग्रेस करती थी, अब भाजपा कर रही है। कांग्रेस भी कभी विपक्षी दलों में सेंध लगाकर उन्हें कमजोर कर देती थी। हालांकि, तब कांग्रेस को तात्कालिक तौर पर फायदा तो मिला, लेकिन उसके दूरगामी परिणाम आज सभी के सामने हैं। कांग्रेस अब हाशिए पर चली गई है। भाजपा में इस आयाराम-गयाराम की संस्कृति से पार्टी का समर्पित व निष्ठावान कार्यकर्ता भी चिंतित है। उसे लगता है कि इससे पार्टी का वैचारिक धरातल एक दिन खत्म हो जाएगा और वह भी पूरी तरह से कांग्रेस जैसी हो जाएगी। दूसरे दलों के बाहुबली, दागी व विवादों से घिरे नेताओं को भी भाजपा को अपने साथ लाने से परहेज नहीं है। इससे कभी वैचारिक और सैद्धांतिक निष्ठा वाली पार्टी समझी जाने वाली भाजपा के पुराने और निष्ठावान कार्यकर्ता  निराश व चिंतित हैं। उन्हें लग रहा है वे हमेशा ही दरी बिछाते रह जाएंगे, जबकि ‘माल’ दूसरे दलों से आये नेता खाएंगे।
बहरहाल, भाजपा नेतृत्व ने अभी तो विपक्षी दलों में सेंध लगाने के लिए प्रदेश इकाइयों को हरी झंडी दिखाई है। लोकसभा चुनाव से काफी पहले शुरू हुई दलबदल की यह मुहिम अब और तेजी से आगे बढ़ रही है। दरसअल, जिन राज्यों में भाजपा लंबे समय से अपना जनाधार बना पाने में सफल नहीं हो पाई है, वहां उसे दूसरे दलों के नेताओं की जरूरत है। पूर्वोत्तर राज्य असम में असम गण परिषद और कांग्रेस से दलबदल करके लाए नेताओं के कारण भाजपा को वहां भारी सियासी लाभ भी मिला और वह सत्ता में आ गई। तब उसके पास बड़े नेताओं की कमी थी। असम के मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल भी असम गण परिषद से दलबदल करके ही भाजपा में आए थे। इस प्रयोग के सफल होने के बाद भाजपा ने इसे पश्चिम बंगाल में अाजमाया। वहां भी भाजपा को भारी फायदा हुआ। लोकसभा चुनाव में वह दूसरे नंबर पर आ गई। पंचायतों में भी वह भारी उपस्थिति दर्ज करा चुकी है। पश्चिम बंगाल में भाजपा के इस मिशन को वह मुकुल राय अंजाम देने में जुटे हैं, जो कभी ममता बनर्जी के खास हुआ करते थे। शारदा चिटफंड घोटाले में उन पर भी उंगली उठी थी, लेकिन भाजपा में शामिल होने के बाद वे ‘पाक साफ’ हो गए। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस, कांग्रेस व वाम दलों से अब तक भाजपा में शामिल विधायकों, पार्षदों समेत नेताओं की लंबी फेहरिस्त है। अब तो मुकुल राय ने हाल ही में दावा किया कि पश्चिम बंगाल में टीएमसी, कांग्रेस और सीपीएम के 107 विधायक भाजपा में शामिल होने जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि सूची तैयार हो गई है, वे सब हमारे संपर्क में हैं। यह दावा भले ही कागजी साबित हो जाए, लेकिन इससे भाजपा के इरादे साफ हो जाते हैं कि वह दलबदल की पुरजोर कोशिश में है।
भाजपा ने अब सिक्किम में ढाई दशक तक राज करने वाले पूर्व मुख्यमंत्री पवन कुमार चामलिंग के सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट (एसडीएफ) के 10 विधायकों से दलबदल करा लिया। इससे एसडीएफ में पार्टी के संस्थापक व 5 बार मुख्यमंत्री रहे चामलिंग समेत 3 विधायक ही रह गए हैं। जबकि विधानसभा चुनाव में खाता भी नहीं खोल पाने वाली भाजपा 32 सीटों वाली प्रदेश विधानसभा में मुख्य विपक्षी दल बन गई है।
इससे पहले भाजपा ने गोवा में भी कांग्रेस के 15 में से 10 विधायकों से दलबदल कराया था। वहां भाजपा की सरकार है। पहले वहां महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी, गोवा फारवर्ड पार्टी और निर्दलीय विधायक के समर्थन पर भाजपा की सरकार टिकी थी। मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर के निधन के बाद भाजपा को अपनी सरकार पर खतरा मंडराता दिख रहा था। इसका रास्ता उसने कांग्रेस में दलबदल करके निकाल दिया। कर्नाटक में जेडीएस और कांग्रेस की सरकार गिर चुकी है। वहां सत्तापक्ष के डेढ़ दर्जन विधायकों के बागी होने के बाद भाजपा की सरकार बन चुकी है। इस मामले में भी भाजपा पर उंगली उठती रही है। कांग्रेस के नेता लगातार आरोप लगाते रहे हैं कि मध्य प्रदेश और राजस्थान में भी भाजपा इसी तरह की कोशिश में है।
हरियाणा में तो भाजपा की सरकार को कोई संकट नहीं रहा है, वहां तो अब चुनाव निकट हैं, इसके बावजूद भाजपा को इनेलो के विधायकों को अपने पाले में लाने मे कोई संकोच नहीं है। इनेलो में विभाजन के बाद जननायक जनता पार्टी का गठन होने से दोनों को और कमजोर करने में भाजपा ने कमी नहीं छोड़ी है। यही वजह है कि हरियाणा विधानसभा में 19 विधायकों के साथ मुख्य विपक्षी दल रहे इनेलो के साथ अब मात्र 3 विधायक रह गए हैं। इनमें से ज्यादातर ने भाजपा का दामन थाम लिया है। दिल्ली में भी उसने आम आदमी पार्टी के बागी विधायकों के लिए अपने दरवाजे खोल रखे हैं। कुछ को वह शामिल भी कर चुकी है।
भाजपा सिर्फ चुने प्रतिनिधियों को ही नहीं, अन्य नेताओं को भी खुले मन से स्वीकार कर रही है। कांग्रेस के मीडिया विभाग के सचिव रहे केरल मूल के टॉम बडकन भी अब भाजपाई हो चुके हैं। बडकन कभी सोनिया गांधी के करीबी माने जाते थे। इस तरह के कई उदाहरण हैं। भाजपा की नजरें अब आंध्र प्रदेश पर हैं। तेलगूदेशम पार्टी के राज्यसभा के 4 सांसदों को वह पहले ही अपने पाले में ला चुकी है। वहां अब भाजपा हर हालत में तेलगूदेशम पार्टी को कमजोर करने की कोशिश में है। जबकि तेलंगाना में वह कांग्रेस में तोड़फोड़ की कोशिश में है। कांग्रेस वहां पहले ही कमजोर हो चुकी है। दलबदल से कांग्रेस को कमजोर करने की पहल भाजपा ने उत्तराखंड में भी की। 2017 में कांग्रेस के दर्जनभर विधायक बगावत करने के बाद भाजपा में शामिल हो गए थे।
भाजपा दलबदल से प्रदेशों में अपना कुनबा ही नहीं बढ़ा रही है, बल्कि उसने राज्यसभा में भी अपने को मजबूत स्थिति में पहुंचा दिया है। राज्यसभा में भाजपा सबसे बड़ा दल तो है, लेकिन एनडीए को अभी बहुमत प्राप्त नहीं है। 2020 में एनडीए का बहुमत हो पाएगा, लेकिन भाजपा ने यहां भी दल बदल का रास्ता चुना। तेलगूदेशम पार्टी के 4 सांसद चूंकि दलबदल कानून के दायरे में नहीं आ रहे थे, इसलिए उन्हें भाजपा में शामिल करा लिया गया। जबकि विपक्ष का संख्याबल कम कराने के लिए उसने इस्तीफों की राजनीति को बढ़ावा दिया। कांग्रेस के मुख्य सचेतक रहे महेश्वर कलीता व संजय सिंह से इस्तीफा दिलवा दिया गया। इसी तरह समाजवादी पार्टी के सुरेंद्र नागर, संजय सेठ व नीरज शेखर ने राज्यसभा से इस्तीफा देकर भाजपा का दामन थाम लिया।

दलबदल कानून
आयाराम-गयाराम की प्रवृत्ति यानी दलबदल को रोकने के लिए संसद ने कानून भी बनाया है। इसके तहत यदि 2 तिहाई से कम सांसद या विधायक पार्टी बदलते हैं तो उनकी सदस्यता स्वत: खत्म हो जाएगी। लेकिन यदि दो तिहाई से ज्यादा विधायक एक साथ दलबदल करते हैं तो उनकी सदस्यता कायम रहेगी। गोवा और सिक्किम में भाजपा ने ऐसा  ही किया।

हरियाणा से शुरू हुआ था आयाराम-गयाराम
आयाराम-गयाराम की कहावत हरियाणा के विधायक गयालाल से शुरू हुई थी। हरियाणा के हसनपुर (सुरक्षित) क्षेत्र से निर्दलीय विधायक गयालाल ने 1967 में 9 घंटे के अंदर 2 बार पार्टियां बदली थीं। उन्होंने 15 दिन के भीतर 3 बार दल बदले। गयालाल सबसे पहले कांग्रेस से यूनाइटेड फ्रंट में गए, फिर कांग्रेस में लौटे, लेकिन बाद में फिर यूनाइटेड फ्रंट में शामिल हो गए थे। हरियाणा के पहले मुख्यमंत्री भगवत दयाल शर्मा को पद से हटाने के बाद मुख्यमंत्री बने राव बीरेंद्र सिंह ने तब एक प्रेस कांफ्रेंस में गयालाल को लेकर कहा था कि ‘गयाराम, अब आया राम है।’ तब से दलबदलुओं के लिए ‘आयाराम, गयाराम’ का जुमला इस्तेमाल होने लगा।

हरियाणा
जनता पार्टी सरकार बन गई कांग्रेस सरकार
आयाराम-गयाराम कहावत के जन्मदाता हरियाणा में ही देश का सबसे बड़ा दलबदल हुआ था। प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री भजनलाल ने एक बार पूरी सरकार के साथ दलबदल करके रिकार्ड बना दिया था। आपातकाल के बाद देश में जनता पार्टी की लहर में 1977 में हरियाणा विधानसभा चुनाव में चौधरी देवीलाल के नेतृत्व में सरकार बनी। वे कुछ ही समय मुख्यमंत्री रह पाए। उनके बाद भजनलाल मुख्यमंत्री बने। लेकिन 1980 में जब इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी हुई तो उन्होंने जनता पार्टी की राज्य सरकारों को बर्खास्त करना शुरू कर दिया। भजनलाल को अपनी सरकार के बर्खास्त होने की भनक लग गई। वे सीधे इंदिरा गांधी की शरण में पहुंच गए और मंत्रिमंडल के साथ कांग्रेस में शामिल हो गए। यानी पूरी जनता पार्टी सरकार भजनलाल के कारण अगले दिन कांग्रेस सरकार में बदल गई।

अरुणाचल प्रदेश
कांग्रेस सरकार बन गई पीपीए सरकार

अरुणाचल प्रदेश में 2016 के दौरान भारी दलबदल हुआ था। तब प्रदेश में कांग्रेस के मुख्यमंत्री पेमा खांडू समेत 43 विधायक पीपुल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल प्रदेश (पीपीए) में शामिल हो गए थे। प्रदेश की 60 सदस्यों वाली विधानसभा में कांग्रेस के 46 विधायक थे। दरअसल, राजनीतिक उठापटक के चलते जनवरी 2016 में प्रदेश की नबाम तुकी सरकार गिर गई थी। कुछ समय तक राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा और फिर कलिखो पुल की सरकार बनी। कलिखो पुल को सुप्रीमकोर्ट के आदेश के बाद मुख्यमंत्री पद से हटना पड़ा था। इसके बाद खांडू को मुख्यमंत्री की कुर्सी मिली, लेकिन लगभग 2 माह बाद ही वे अपने समर्थक विधायकों के साथ पीपीए में शामिल हो गए। इस तरह कांग्रेस की सरकार अगले ही दिन पीपीए सरकार बन गई थी।


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