बच्चों की जगह रोबोट भी जा सकेगा स्कूल !    क्रिसमस की टेस्टी डिशेज़ !    खुद से पहले दूसरों की सोचें !    आ गई समझ !    अवसाद के दौर को समझिये !    बच्चों को ये खेल भी सिखाएं !    नानाजी का इनाम !    निर्माण के दौरान नहीं उड़ा सकते धूल !    घर में सुख-समृद्धि की हरियाली !    सीता को मुंहदिखाई में मिला था कनक मंडप !    

डंडे का कमाल

Posted On August - 11 - 2019

राजपाल सिंह गुलिया

अतीत में झांकता हूं तो स्मृतिपटल पर न जाने कितनी ही तस्वीरें उभरने लगती हैं। स्कूल का वह दिन याद आ जाता है। एक दिन मास्टरजी ने सुबह की प्रार्थना सभा के बाद कड़क आवाज़ में कहा, ‘कच्ची पहली वाले सभी बच्चे खड़े हो जाएं, जिनका नाम नहीं लिखा है?’ इस घोषणा ने मुझे अन्दर तक हिला दिया। मुझे लगा कि मास्टरजी का मोस्ट वांटेड अपराधी मैं ही हूं। मैं अपना नया पायजामा संभालते हुआ खड़ा हो गया। ‘पायजामा तो नया पहना दिया, नाम कौन लिखाएगा?’ मास्टर जी के वाक्य में व्यंग्य था।
मेरी देखा-देखी कुछ अन्य बच्चे भी खड़े हो गए। मास्टरजी बच्चे का हाथ पकड़कर कमर में एक डंडा टिकाते और कहते कि जा अपने बापू को बुला कर ला, फिर दूसरे बच्चे को डंडा टिकाते और बुड़बुड़ाते, ‘स्कूल को खालाजी का घर समझ रखा है।’ जब मेरा नम्बर आया तो मास्टरजी ने थोड़ी नरमी दिखाते कहा, ‘तू अपने बापू या चाचा को कल बुलाकर लाना, चल उधर बैठ।’ मैंने राहत की सांस ली। दूसरे दिन सवेरे मैंने थैले में अपना कायदा, पत्थर की स्लेट, चॉक, कलम, स्याही की दवात और छोटी-सी पेंसिल सलीके से डाली तथा लकड़ी की नई तख्ती ली। मैं सुबह से ही तैयार था मगर चाचाजी थे कि तैयार होने का नाम ही नहीं ले रहे थे। मुझे लग रहा था कि आज स्कूल का मेरा पहला दिन है। बिना नाम के तो यूं ही घूमना था, स्कूल जाना थोड़े ही था। खैर, काफी देर बाद चाचाजी मेरे साथ चले। मास्टरजी ने जब चाचाजी से मेरी जन्मतिथि के बारे में पूछा तो चाचाजी ने गोलमोल-सा प्रश्न मास्टरजी पर ही यूं दागा, ‘मास्टरजी, पांच साल के बच्चे का नाम लिखते हो न? ‘हां।’ मास्टर जी ने सहमति में सिर हिलाया। ‘फिर तो इसका नाम रहने ही दो, मास्टरजी। पांच साल का तो यह सावन में होगा। अगले साल लिख लेना, कुछ ओर कमजोरी निकल जाएगी।’ चाचाजी ने पीछा छुड़ाने के अंदाज़ में कहा। मैंने जब चाचाजी की बात सुनी तो मेरा सारा उत्साह ठंडा हो गया।
मैं विरोध-स्वरूप थैला-तख्ती फेंककर ज़मीन में लोटपोट हो गया। मास्टरजी ने चाचाजी से नज़र बचाकर एक डंडा टिका दिया, जो मेरे रोने की आवाज़ में काफी वृद्धि तो कर गया। लेकिन दिल में अज्ञात-सा भय भी पैदा कर गया। मास्टरजी के डंडे के प्रहार से बेखबर चाचाजी ने मेरी मनोदशा देखकर अपना निर्णय पलटते हुए कहा, ‘लिख लो मास्टर जी, आज तो ये नाम लिखाकर ही मानेगा।’
मास्टरजी अंदर से रजिस्टर लाये और मुझे दिखाते हुए कहा, ‘ये देख, लिख लिया है तेरा नाम और स्कूल नहीं आया तो ये कट भी जाएगा।’ उस दिन मन ही मन कसम खा ली थी कि चाहे कुछ भी हो जाए, नाम नहीं कटने देंगे।  आज मैं सेना शिक्षा कोर में बतौर शिक्षा अनुदेशक की स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के बाद वर्तमान में स्वयं एक अध्यापक हूं।


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