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जलमग्न ज़िंदगी

Posted On August - 12 - 2019

स्थायी समाधान मांगती बाढ़ की विभीषिका
केरल, महाराष्ट्र, कर्नाटक व गुजरात का भयावह बाढ़ संकट सवा सौ से अधिक ज़िंदगियां लील चुका है। लाखों लोग बेघर हुए हैं। अकेले महाराष्ट्र में चार लाखों लोगों को राहत शिविरों तक पहुंचाया गया है। अरबों रुपये की फसलें, वन-संपदा, पशुधन व वन्य जीव हर साल बाढ़ की भेंट चढ़ जाते हैं। कह सकते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग के चलते बारिश के पेटर्न में बदलाव आया है। यह बदलाव दोनों तरह का है। स्थान परिवर्तन के हिसाब से भी और बारिश की मात्रा के हिसाब से भी। बारिश ऐसे इलाकों में अब जमकर बरस रही है, जो अब तक उसके लिए वर्जित थे। ऐसे में बाढ़ की समस्या को विस्तार मिलता है। दूसरे बारिश पहले जितनी पूरे साल में बरसती थी, अब उतनी कुछ ही दिनों में बरस जाती है। विडंबना यह है कि बाढ़ से निपटने के लिए हम अब तक कोई स्थायी तंत्र विकसित नहीं कर पाये हैं। सत्ताधीशों व शासन-प्रशासन को बाढ़ से पूर्व सुरक्षा के प्रयासों के बजाय, राहत-बचाव का अभियान ज्यादा रास आता है। राहत का यह मंत्र राजनेताओं को लुभाता है। बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों का हवाई सर्वेक्षण उनके लिए खबर बनना भी है। आखिर सवाल उठता है कि असम में हर साल आने वाली बाढ़ से बचने के युद्धस्तरीय प्रयास क्यों नहीं होते? बिहार का शोक कहे जाने वाली कोसी से बचाने की स्थायी नीति क्यों नहीं बनती? नेपाल से आने वाले बारिश के पानी को रोकने को प्रभावी बांध क्यों नहीं बनाये जाते? महाराष्ट्र में टूटे तिवरे बांध से हुई तबाही को रोका क्यों नहीं जा सका? बारिश में बंध-तटबंध क्यों भरभरा कर गिर जाते हैं? बाढ़ के बाद चिकित्सा उपचार का प्रभावी तंत्र क्यों नहीं विकसित हो गया?
नदी हमेशा अपने कुदरती रास्ते को वापस मांगती है, जो मनुष्य के अतिक्रमण का शिकार हो जाते हैं। अनियोजित विकास और बिल्डरों व ठेकेदारों की मिलीभगत से पहाड़ों की अंधाधुंध खुदाई व नदियों के तटों पर जो अतिक्रमण हुआ है, उसने बारिश के पानी के स्वाभाविक मार्ग को अवरुद्ध किया है। बेहद गरीबी से त्रस्त लोगों ने नदियों के उन निचले स्थलों को अपना ठिकाना बनाया है, जहां वर्षा ऋतु में नदियां बारिश के पानी को विस्तार देती हैं। जाहिर है यह पानी फिर मानव बस्तियों में घुसकर अपनी जगह मांगता है। साल भर ठेकेदार-बिल्डर नदी के विस्तार क्षेत्र कब्जाते रहते हैं। जब नदियां पानी से लबालब भरती हैं तो वे अपनी जमीन मांगती हैं, जिसका कहर आम लोगों की जिंदगी पर बाढ़-भूस्खलन के रूप में पड़ता है। शासन-प्रशासन की कोशिश बाढ़ के कारणों को रोकने के बजाय उसके बाद के राहत व बचाव पर होती है। बाढ़ आने पर शासन-प्रशासन नाकाम साबित होता है। फिर सेना-नौसेना से राहत-बचाव में मदद ली जाती है, जो समस्या का अस्थायी समाधान है। एनडीआरएफ की टीमें राहत-बचाव में जुटती हैं, लेकिन बाढ़ की विभीषिका को देखते हुए ये प्रयास नाकाफी हैं। जरूरत बाढ़ के कारणों को समझने और उन वजहों पर रोक लगाने की है, जो बाढ़ की विभीषिका को विकराल बनाती हैं। प्रकृति के इस रौद्र रूप के दौरान इनसान की दया व उदारता मनुष्यता की जरूरत होती है। ऐसा करके हम पीड़ितों का दुख कम कर सकते हैं। हर व्यक्ति को सोचना चाहिए कि वह राहत व बचाव के लिए क्या कर सकता है।


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