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जजपा-बसपा के बाद अब नजर भाजपा-अकाली गठबंधन पर

Posted On August - 13 - 2019

दिनेश भारद्वाज/ट्रिन्यू
चंडीगढ़, 12 अगस्त
हरियाणा में जननायक जनता पार्टी (जजपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का गठबंधन होने के बाद अब सत्तारूढ़ भाजपा और शिरोमणि अकाली दल (शिअद) के बीच समझौते पर नजरें टिकी हैं। हालिया लोकसभा चुनाव भाजपा ने अकाली दल के साथ समझौता करके लड़ा था। विधानसभा चुनाव के लिए अभी तक दोनों दलों में सहमति नहीं बन पाई है।
शिअद ने इस संबंध में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात का समय मांगा है। अकाली दल हरियाणा में विधानसभा की 90 में से 20 सीटों पर दावा जता रहा है। पार्टी का कहना है कि प्रदेश की सिख बहुल सीटों पर उसका अच्छा प्रभाव है। शिअद के हरियाणा मामलों के प्रभारी बलविंद्र सिंह भूंदड़ के अनुसार लोकसभा चुनाव में शाह के कहने पर पार्टी ने बिना शर्त समझौता किया था। अकाली दल ने लोकसभा चुनाव में एक भी सीट नहीं मांगी थी, लेकिन विधानसभा चुनाव में वह उतरने का मन बना चुकी है।
हरियाणा में गठबंधन की राजनीति दशकों से चली आ रही है। 2009 और 2014 के लोकसभा एवं विधानसभा चुनाव में अकाली दल ने इनेलो के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। चौटाला और बादल परिवार में राजनीतिक के साथ-साथ पारिवारिक रिश्ते भी हैं। इसके बावजूद दोनों बार विधानसभा चुनाव में अकाली दल को महज 2 ही सीटें मिलीं। 2009 में कालांवाली हलके से अकाली टिकट पर चरणजीत सिंह रोड़ी और 2014 में बलकौर सिंह ने विधानसभा चुनाव लड़ा। एसवाईएल नहर के मुद्दे पर अभय चौटाला, अकाली दल के साथ राजनीतिक समझौते को तोड़ चुके हैं। अब जजपा और बसपा के बीच गठबंधन होने के बाद प्रदेश में नए समीकरण पैदा हो गए हैं। इस समझौते के बाद भाजपा-अकाली गठबंधन में चर्चा शुरू हो गई है। इनके अलावा कांग्रेस, इनेलो, आप और लोकतंत्र सुरक्षा पार्टी (लोसुपा) के बीच फिलहाल कोई समझौता नहीं हुआ है। लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस और आप के बीच बातचीत चली थी।
माना जा रहा है कि अब विधानसभा चुनाव में हरियाणा में कांग्रेस और आप के बीच समझौता हो सकता है। 2014 में भाजपा के लिए यह पहला मौका था, जब वह बिना गठबंधन के अपने बूते पूर्ण बहुमत से सत्ता में आई। आमतौर पर कांग्रेस खुद के बूते सरकार बनाती रही है।
पूर्ववर्ती सरकारों और पार्टियों का रिकार्ड देखें तो चौधरी देवीलाल, बंसीलाल और भजनलाल सरीखे नेताओं ने गठबंधन से परहेज नहीं किया। प्रदेश का इतिहास यह भी है कि गठबंधन की सरकारों ने कभी अपना शासनकाल पूरा नहीं किया।

1977 में बना पहला महागठबंधन
प्रदेश के गठन के एक साल बाद राव बीरेंद्र सिंह ने 1967 में हरियाणा विशाल पार्टी का गठन करके सत्ता हासिल की। उनके दो विधायकों गयाराम और हीरानंद आर्य ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। सबसे पहले वर्ष 1977 में देवीलाल के नेतृत्व में महागठबंधन बना। इसमें कई राजनीतिक दलों और वरिष्ठ नेताओं ने अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई। इस गठबंधन ने सत्ता भी हासिल कर ली। कुछ समय बाद भजनलाल ने विधायकों को अपने साथ लेकर देवीलाल की सरकार गिरा दी। वर्ष 1980 में भजनलाल कांग्रेस में शामिल हो गए और सरकार बनाई। 1987 में देवीलाल ने भाजपा के साथ गठबंधन करके सरकार बनाई। इसके बाद ओमप्रकाश चौटाला मुख्यमंत्री बने, तब भाजपा ने गठबंधन तोड़ लिया और सरकार अल्पमत में चली गई। 1996 में बंसीलाल ने कांग्रेस से अलग होकर हरियाणा विकास पार्टी बनाई और भाजपा के साथ गठबंधन करके सत्ता में आ गए। वर्ष 1999 में भाजपा ने समर्थन वापस लिया तो बंसीलाल की सरकार चली गई। ऐसे में फिर से इनेलो और भाजपा का समझौता हुआ। यह गठबंधन भी आखिर तक नहीं चला।

2009 में भाजपा-इनेलो की दोस्ती नहीं टिकी ज्यादा देर
2009 के लोकसभा चुनाव के दौरान भी इनेलो और भाजपा का समझौता हुआ, लेकिन विधानसभा चुनाव तक यह भी टूट गया। 2009 में हजकां और बसपा का गठबंधन हुआ लेकिन चुनाव से पहले ही टूट गया। हजकां का भाजपा के साथ भी गठबंधन सिरे नहीं चढ़ा। 2014 का लोकसभा चुनाव तो कुलदीप बिश्नोई के नेतृत्व वाली हजकां ने भाजपा के साथ गठबंधन करके लड़ा लेकिन इसी वर्ष हुए विधानसभा चुनाव में दोनों दलों की राहें फिर से अलग हो गई।


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