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गुस्से से मिली सीख

Posted On August - 18 - 2019

वर्षा रानी

हमारे समय में बच्चों का पांच वर्ष की उम्र में स्कूल में दाखिला होता था। मेरी बहन उस समय दूसरी कक्षा में पढ़ती थी। मां उसे रोज़ सुबह नहला-धुलाकर, साफ-सुथरे कपड़े पहनाकर स्कूल भेजती थी। मैं सोचती थी कि मेरे रोने-धोने की तो बात ही नहीं, क्योंकि मेरी बहन तो उसी स्कूल में पढ़ती है। खैर, पांच वर्ष की आयु में मेरा भी स्कूल में दाखिला हुआ। मां मुझे स्कूल छोड़ आई। मेरी बहन उसी स्कूल में पढ़ती थी तो चिंता नहीं बल्कि खुशी थी। मैं बहन के साथ स्कूल जाती वह मुझे मेरी क्लास तक छोड़कर अपनी कक्षा में चली जाती। मैं सोचती थी कि जहां मेरी बहन ने कक्षा में बिठाया, वही मेरी असली जगह बैठने की है और वहीं रोज बैठना है। जिस दिन मुझे वह जगह न मिलती तो मैं बैग उठाकर बहन की कक्षा में पहुंच जाती। मेरी बहन को बहुत गुस्सा आता लेकिन फिर वह मेरी कक्षा में मुझे छोड़कर आती। अगर कोई बच्चा मुझे तंग करता, मारता या लड़ता तो फिर वही प्रक्रिया होती। मैं अपनी बहन की कक्षा में चली जाती। मेरी बहन परेशान होकर मां से शिकायत करती। स्कूल में मेरा पहला दिन इस तरह बीता। बाद में मुझे समझाया गया तो मैं समझ पाई।


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