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‘किसी कमज़ोर पर कभी मत हंसना’

Posted On August - 18 - 2019

विद्या

बात तब की है जब मैं 10वीं की छात्रा थी। पढ़ाई में मन कम लगता तो खेल-कूद के लिये गली में बच्चों को तलाश शुरू हो जाती। पड़ोस में रहने वाले एक परिवार के बच्चों के साथ खासा मेलजोल और खेलना कूदना होता रहता था। एक अन्य घर में दो बुजुर्ग थे जिन्हें हम खूब परेशान भी करते थे। उनकी डांट सुनकर बड़े हुए। हालांकि तब घर पर किसी ने भी उन बुज़ुर्गों की डांट फटकार और भला-बुरा कहने को कभी दिल से नहीं लगाया। कभी पिता जी और मां उन्हें डांट लगाते सुनते तो मुस्कुरा कर अपने काम में लग जाते। अब सेकेंडरी की पढ़ाई के लिये शहर जाना हुआ तो गांव के लोग और मस्ती यादों में ही सिमट गई। बीच-बीच में जाना होता तो दोनों बुजुर्ग बचपन के सारे किस्से खूब बयां करते। ग्रेजुएशन के दौरान के इन तीन -चार सालों में काफी कुछ बदल गया था। ऐसे ही एक बार गांव जाना हुआ तो दोनों से फिर मुलाकात हुई। वे काफी चुपचाप, खामोश और संजीदा लग रहे थे। फिर मालूम हुआ कि दोनों के पास कोई बातचीत करने और हाल चाल जानने के लिये नहीं जाता। दिन भर वे धूप में बैठकर आपस में बतियाते हैं, आने -जाने वालों से बात करने की कोशिश करते हैं, लेकिन हर कोई अपने काम में मसरूफ रहता। अब उन्हें दिखाई भी कम देने लगा था, इसी बात का फायदा उठाकर गली के बच्चे उन्हें खूब परेशान भी करते। एक दिन देखा कि कुछ बच्चे बुजुर्गों को परेशान करने के लिये उनके बैठने वाली चारपाई का एक पाया निकालकर छुपा रहे हैं, अभी हम कुछ कह पाते तब तक उनमें से एक बुज़ुर्ग चारपाई पर बैठने की कोशिश में गिर गए और चारपाई के बीच में फंस गये। यह देखकर हम सबकी हंसी निकल गई। इतनी देर में मां पास से गुज़रीं। उन्होंने यह सब देख लिया था।
मां ने मुझे जमकर लताड़ लगाई कि कैसे तमाशबीनों की तरह यह सब देख रहे हों और बच्चों को रोककर न तो तुमने बुजुर्ग को बचाया न ही उन शैतान बच्चों को भगाया। मां को इससे ज्यादा गुस्सा इस बात पर था कि मैं उन्हें देखकर हंस रही थी। मां ने डांट लगाते हुए बुजुर्गों की मदद की लेकिन उनकी कमर में काफी चोट लग गई थी, वे दर्द से कराह रहे थे। मां ने उनकी मदद की और इसके बाद शिकायत लेकर घर पहुंच गईं। अब घर पर पूरी पंचायत बैठी। पिता जी ने समझाया-किसी लाचार के साथ न तो बुरा व्यवहार करना न ही उनकी लाचारी पर कभी हंसना। ज़रूरत मंद की सहायता, परोपकार सीखो, यही सबसे बड़ी एजुकेशन है। अपने सामने कुछ भी गलत देख रहे हो तो उसका विरोध ज़रूर करना। बुढ़ापा तो एक दिन हर किसी को आना है, बड़ों का मज़ाक उड़ाना नहीं आशीष लेना सीखो। मेरे लिये पिता जी और मां की इतनी बात ही काफी थी। मैं आज भी ज़रूरतमंद या मजबूर व्यक्ति की मदद में खुशी ढूंढती हूं। शायद इससे बड़ा सुकून मेरे लिये कोई नहीं है।


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