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किताबों से दोस्ती

Posted On August - 18 - 2019

ललित शौर्य
मंगलवन के राजा शेर सिंह के तीन बच्चे थे। मोंटी, चिंटू और मिंटू। तीनों ही बड़े शरारती थे। मोंटी और चिंटू पढ़ने-लिखने में बहुत होशियार थे। दोनों नियमित स्कूल भी जाते थे लेकिन मिंटू अपनी ही दुनिया में खोया रहता था। उसे स्कूल से कोई मतलब नहीं था। पढ़ाई-लिखाई की बात करते ही उसे उबासी आ जाती। वह झूमने लगता। नींद उसकी आंखों में नाचने लगती। वह सो जाता। राजा शेर सिंह मिंटू से बड़े परेशान थे। वह सोचते अगर मिंटू पढ़ेगा-लिखेगा नहीं तो जंगल का राज-काज कैसे संभालेगा। जीवन में पढ़ाई का बड़ा महत्व है। कई बार शेर सिंह मिंटू को डांट भी लगा देते। लेकिन इस सबके बावजूद उसके कान में जूं तक नहीं रेंगती।
एक दिन शेरसिंह की पत्नी, मिंटू की मां चंद्रा ने मिंटू से कहा, ‘बेटा, तुम्हारे दोनों भाई स्कूल जाते हैं। वे पढ़ना-लिखना सीख चुके हैं। वे अपना नाम आसानी से लिख लेते हैं। लेकिन तुम स्कूल जाने से इतना क्यों डरते हो‍?’ ‘अरे मां। मुझे ये पढ़ना-लिखना बिल्कुल भी पसंद नहीं है।’ मिंटू ने कहा। ‘बेटा, अगर पढ़ोगे-लिखोगे नहीं तो आने वाले समय में जंगल राज-काज कैसे देखोगे।’ मां ने समझाते हुए कहा। ‘मां, जंगल का राज-काज मेरी शक्ति से चल जाएगा। आप उसकी चिंता मत करें।’ मिंटू ने अपनी बाजुओं की ताकत दिखाते हुए कहा।
‘बेटा। राज-काज चलाने के लिए बाहुबल ही नहीं, बुद्धिबल की ज़रूरत भी होती है। बुद्धिबल पढ़ने-लिखने से बढ़ता है। जितनी ज्यादा किताबें पढ़ोगे, उतने अधिक विद्वान बनोगे। उतना ही अच्छा शासन कर पाओगे।’ मां ने समझाते हुए कहा। लेकिन मिंटू की समझ में कुछ नहीं आया। वह उल्टा मां से नाराज होकर वहां से चला गया। एक शाम मोंटी, चिंटू और मिंटू खेल रहे थे। खेलते-खेलते वे जंगल से बहुत दूर पहुंच चुके थे। वे तीनों बहुत थक भी चुके थे। इसके बावजूद मिंटू ने कहा, ‘चलो रेस लगाते हैं। देखो कौन फर्स्ट आता है।’ मोंटी और मिंटू ने पहले न-नुकुर की फिर दोनों तैयार हो गए। तीनों दौड़ने लगे।
कभी मिंटू आगे हो जाता तो कभी मोंटी और कभी चिंटू। तीनों दौड़ते रहे। एक स्थान पर मोंटी और चिंटू एक साथ पहुंचे। वहां पर दो रास्ते थे। अब वे समझ नहीं पा रहे थे कि कौन-सा रास्ता जंगल की ओर जाएगा। अचानक उनकी नजर एक बोर्ड पर पड़ी, जिस पर मंगलवन की तरफ जाने का निशान बना था। दूसरी तरफ के लिए लिखा था, आगे खतरनाक खाई और झाड़ियां हैं। कृपया इस रास्ते से न जायें। मोंटी और चिंटू दोनों पढ़े-लिखे थे। दोनों ने वैसा ही किया। और वे कुछ ही समय बाद घर पहुंच गए।
लेकिन जैसे ही कुछ समय बाद मिंटू उस दोराहे पर पहुंचा तो परेशान हो उठा। वह कभी रास्ते को देखता तो कभी बोर्ड को। उसे पढ़ना नहीं आता था। वहां कोई था भी नहीं, जो उसकी मदद करता। वह उस रास्ते पर चला गया, जिस पर आगे भयानक खाई थी। शाम होने वाली थी इसलिए उसने अपनी गति बहुत तेज की हुई थी। अचनाक वह कंटीली झाड़ियों में फंस गया। सामने भयंकर खाई थी। वह झाड़ियों से निकलने की कोशिश कर रहा था। लेकिन सफल नहीं हो पाया।
उधर, रात तक मिंटू के घर न पहुंचने पर शेरसिंह बड़ा परेशान हो गया। उसने मोंटी और चिंटू से मिंटू के बारे में पूछा। उन्होंने शेरसिंह को पूरी बात बता दी। शेरसिंह समझ गया था कि जरूर मिंटू झाड़ियों वाले रास्ते में फंस गया है। शेरसिंह अपने साथियों को लेकर तुरंत वहां पहुंचा। मिंटू झाड़ियों में फंसा रो रहा था। शेरसिंह ने मिंटू को वहां से निकाला और घर ले आये। शेरसिंह ने कहा, ‘क्यों मिंटू, अब पता चला पढ़ना कितना जरूरी है।’ ‘हां पिताजी। उस दिन से मैं बहुत पछता रहा हूं। अगर मुझे पढ़ना आता तो मैं आसानी से सही रास्ते का चुनाव कर लेता।’ ‘मैं कल से ही स्कूल जाऊंगा। मन लगाकर पढ़ंूगा। अब मैं अनपढ़ नहीं रहना चाहता।’ मिंटू ने कहा। वहां खड़े मोंटी और चिंटू ने एक स्वर में कहा, ‘कल से नहीं आज से। आज फ्रेंडशिप-डे है। तुम आज ही किताबों से दोस्ती कर लो। किताबें हमारी सबसे अच्छी दोस्त हैं।’ ‘हां, तुम दोनों ठीक कहते हो। आज से किताबों की और मेरी दोस्ती पक्की।’ मिंटू ने उत्साहभरे शब्दों में कहा। ये सुनकर सभी मुस्कुरा उठे।


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