सिल्वर स्क्रीन !    हेलो हाॅलीवुड !    साहित्यिक सिनेमा से मोहभंग !    एक्यूट इंसेफेलाइिटस सिंड्रोम से बच्चों को बचाएं !    चैनल चर्चा !    बेदम न कर दे दमा !    दिल को दुरुस्त रखेंगे ये योग !    कंट्रोवर्सी !    दुबला पतला रहना पसंद !    हिंदी फीचर फिल्म : फर्ज़ !    

कामकाजी संस्कृति में जगह तलाशती औरत

Posted On August - 12 - 2019

आजादी की पौन सदी बीतने के साथ-साथ भारत की सांस्कृतिक अभिरुचियों, जीवन दृष्टिकोण और लोगों की जीवटता के अन्दाज़ में परिवर्तन दिखायी देने लगा है। पिछले छह बरस से मोदी की पहली और अब दूसरी पारी की शुरुआत में अपनी जड़ों की ओर लौटने या अतीत के पुनर्लेखन के साथ सांस्कृतिक पुनरुत्थान की बातें अब तो नारों और भाषणों में तबदील होती नजर आने लगी हैं। सांस्कृतिक नींव पर खड़ा नया भारत बनाने का इसरार बढ़ गया है।
लेकिन यह अकाट‍्य सत्य है कि चलते समय की गाड़ी को पीछे नहीं मोड़ा जा सकता। देश में आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तनों ने जीवन की नयी जरूरतें पैदा कर दीं। स्वर्णिम अतीत के सांस्कृतिक दृष्टिकोण का परचम लहराने के बावजूद देश की आधी आबादी को ‘पर्दे की रानी’ कहकर घर की देहरी में अब और कैद नहीं रखा जा सकता।
कल तक उसे अन्नपूर्णा और मात्र घर की शोभा बता बहलाया जाता रहा। तालियां बजवा देने वाले संवाद कि ‘बेटी इस घर से तेरी डोली उठी है, अब तेरी अर्थी पति के घर से ही उठनी चाहिए,’ इत्यादि असम्बद्ध हो गये हैं। पारिवारिक शुचिता के नाम पर देश की आधी आबादी ने निष्िक्रय रह कर केवल घर आंगन का दीया बने रहने से इनकार कर दिया।

सुरेश सेठ

आखिर कोई आदमी एक हाथ से काम करके और एक टांग से दौड़कर अपने जीवन समर को सफल या देश के विकास को तीव्र गति से कैसे अग्रसर कर सकता है? इसी कारण पिछली पौन सदी में इस देश ने औरत के बारे में अपने पूर्वाग्रहों और पूर्व धारणाओं को टूटते देखा। यह विश्वास तो बहुत पहले टूटा कि औरत को घर का चूल्हा-चौका संभालना है, इसलिए उसे पढ़ने-लिखने की क्या जरूरत? यह धारणा अब टूटती नजर आयी है।
पंजाब में जालंधर से ही डेढ़ सदी पहले लाला देवराज से लेकर कुमारी लज्यावती ने शिक्षा का अलख कन्या महाविद्यालय जालंधर से जलाया। ऋषि दयानन्द और आर्य समाज की कर्मस्थली भी पंजाब अधिक रही। इसलिए कन्याओं को शिक्षा न देने का दुराग्रह पहले यहां खत्म होता नजर आया। डीएवी शिक्षा अभियान ने अपने महिला विद्यालयों की स्थापना के साथ यहां कन्या शिक्षा को बल दिया। कन्याओं की शक्ति केवल पंजाब ही नहीं, पूरे भारत के शिक्षा क्षेत्र में उभरने लगी। उन्होंने हर परीक्षा और प्रतियोगिता में लड़कों को पछाड़ा।
परन्तु इस दृष्टिकोण का टूटते थोड़ी देर और लगी कि औरतों का काम केवल घर गृहस्थी संभालना और परिवार का भरण पोषण है। पुराने लोगों ने ऐसे दिन अपनी आंखों से देखे हैं, जब औरतें दिन-प्रतिदिन विकट होते जा रहे ‘आर्थिक’ संघर्ष में अपनी गृहस्थी की गाड़ी चलाने के लिए दूसरा पहिया बन पुरुष के साथ मैदान में उतरी। पिछड़ापन, गरीबी और बढ़ती महंगाई ऐसे विकट सत्य बने कि औरतों को अपनी लज्जा का आरोपित आभूषण छोड़कर जीवन समर में पथबंधु बनकर उतरना पड़ा।
भौतिकवाद के पनपने से जिंदगी के बाजार में कामकाजी औरतों की मेहनत का महत्व और मोल बढ़ गया। संयुक्त परिवार प्रणाली का अन्त हुआ। शहरीकरण के प्रसार के साथ एकल परिवारों का प्रचलन बढ़ा। शहरों और कस्बों में एक नयी कामकाजी संस्कृति पनपी। इसमें औरतें भी पुरुषों की तरह उतना ही जरूरी हिस्सा थीं।
फिर भी पुरुषों ने अपना प्रभुत्ववादी दृष्टिकोण नहीं छोड़ा। वे औरतों को अब भी अपना वामपक्ष और योग्यता और बल में अपने से कमतर मानते रहे। देश बदल रहा था। सत्ता के नये मसीहा देश को ‘कुशल भारत’ बनाने और ‘स्टार्ट अप’ अभियान चलाने के नारे लगा रहे थे। भारत ने इन्टरनेट के क्षेत्र में विश्व में अपनी छाप छोड़ी, औरतों के भरोसे! ‘इसरो’ की अंतरिक्ष विजय की उपलब्धियों में महिला वैज्ञानिकों का योगदान कम नहीं। ‘चन्द्रयान-2’ अभियान की अन्तिम कामयाबी में महिला वैज्ञानिकों का योगदान पुरुषों से मुखर था।
नये उभरते भारत में महिला उद्यमियों ने बढ़-चढ़कर अपने जौहर दिखाये। कारपोरेट जगत की मानिए तो आज किसी भी बड़े से बड़े पुरुष उद्यमी से लोहा ले सकती हैं। लेकिन अंतर्राष्ट्रीय और स्वदेशी सर्वेक्षण यही बताते हैं कि भारत में महिला कामगारों को न तो पुरुष कामगारों जितना महत्व मिलता है, न उनके काम के घंटों के मुताबिक उन्हें पुरुषों के बराबर वेतन। चाहे हम इस ‘सफेद कालर वाले बाबुओं’ के समाज में साहसिक उद्यम की बातें करते हैं, ‘स्टार्ट अप इंडिया’ का आह्वान करते हैं, तो इनमें महिला उद्यमियों की संख्या मात्र 13.76 है।
फिर भी औरतों का जीवट है कि आज भारत के कारपोरेट क्षेत्र में उच्च प्रबंधन आसामियों का तीस प्रतिशत औरतों के पास है। विश्व में यह प्रतिशत मात्र चौबीस प्रतिशत है। स्मार्ट प्रबंधन शिक्षा संस्थानों में मैरिट पर दाखिल होने वाली लड़कियों की भीड़ लगी रही।
देश की कामयाब कंपनियों में 7.1 प्रतिशत महिला अधिकारी हैं और नाकामयाब कंपनियों में 3.1 प्रतिशत महिला अधिकारी। दिक्कत यह है कि चाहे लड़कियों और महिलाओं की इस ताकत को पहचान मिल रही है, लेकिन भारत जैसे तीसरी दुनिया के देश औरत को कमजोर मानने का पूर्वाग्रह छोड़ नहीं पाये।
पुरुष समाज उनकी क्षमता और योग्यता को मानकर भी नहीं मानता। सन्देह नहीं कि महानगरों और उभरते शहरों में आज औरत एक शक्ति बनकर उभर रही है। फिर भी एक भारत गांवों में बसता है। देश की आधी आबादी का बड़ा भाग इन्हीं गांवों में बसता है। आज तक यहां जीने वाली औरतों की छवि एक खांचे के बोध से ग्रस्त रही। खेत में काम करते अपने किसान के लिए रोटी, भाजी और लस्सी लेकर जाती औरत या खेती की मेहनत में हाथ बंटाती औरत।
लेकिन भारतीय गांवों का चेहरा भी बदल रहा है। गांव के गांव पुरुषों से खाली हो गये। वे सात समुद्र पार धन कमाने जा रहे हैं। खेती का धंधा अलाभप्रद होने के साथ ग्रामीण युवकों ने वैकल्पिक रोजगार की तलाश में शहरों का रुख किया। पीछे रह गयी औरतें। लेकिन वे निष्िक्रय नहीं। सरकार ने गांवों में आर्थिक सहयोग के रूप में ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना ‘मनरेगा’ शुरू कर रखी है। वर्ष में सौ दिन के रोजगार का जुगाड़ हो जाता है। आंकड़ों के अनुसार जहां केरल की नब्बे प्रतिशत औरतें आज ‘मनरेगा’ जॉब कार्डस पर हैं, वहां उत्तर प्रदेश को छोड़कर अन्य राज्यों की साठ-सत्तर प्रतिशत ग्रामीण औरतें इसी का लाभ उठा रही हैं।
अच्छा हो, अगर इस नारी शक्ति का उपयोग सरकार अब तक उपेक्षित लघु और कुटीर उद्योगों के विकास के लिए करे। ऐसा हो तो हम नया भारत बनाने के सपने के थोड़ा और करीब हो सकेंगे, इन औरतों की बदौलत।

लेखक साहित्यकार एवं पत्रकार हैं।


Comments Off on कामकाजी संस्कृति में जगह तलाशती औरत
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading...
Both comments and pings are currently closed.

Comments are closed.

Powered by : Mediology Software Pvt Ltd.