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कशमकश में  उलझता बचपन

Posted On August - 4 - 2019

देवेन्द्रराज सुथार

मेरे स्कूल का भी पहला दिन रोने-धोने के साथ बीता था। बात वर्ष 2001 की है जब मेरे घर का काम शुरू था। इस बीच मेरी शैतानियों से परेशान होकर मां मुझे स्लेट और सेलखड़ी के साथ गांव के भट्टरा स्कूल में दाखिला करने ले गई थीं। दरअसल, भट्टरा स्कूल एक छोटा-सा ट्यूशन सेंटर था, जिसे लक्ष्मण भट्ट नामक एक बारहवीं पास गुरुजी संचालित करते थे। गुरुजी की योग्यता भले कम थी लेकिन उनके ट्यूशन सेंटर की प्रसिद्धि पूरे गांव में फैली हुई थी।
मोहल्ले के सारे बच्चे वहां पढ़ने आते थे और इसे वे स्कूल ही कहते थे।
मैं जब स्कूल में पहुंचा तो दो-तीन बच्चे पहले से ही रो रहे थे। उन्होंने गुरुजी द्वारा दिया गया होमवर्क नहीं किया था। इसलिए उन्हें पनिशमेंट मिली थी। मुझे मेरी मां वहां बैठाकर चली गई। मुझे इतने स्ट्रिक्ट गुरुजी को देखकर डर लगने लगा। जब एक बच्चा पहाड़े याद करके नहीं आया तो गुरुजी ने उसकी जांघ पर चिकोटी काट दी और कल याद करके आने की वार्निंग दी। चिकोटी काट-काटकर गुरुजी ने छोटे-छोटे बच्चों को भी बीस तक पहाड़े याद करा दिए थे।
मेरा पहला दिन था इसलिए मेरे साथ सज्जनता का व्यवहार किया गया। लेकिन दूसरे दिन मेरा भी वही हाल हुआ, जो दूसरों का कई दिनों से होता आ रहा था।
अब मुझे भट्टरा स्कूल के गुरुजी भूत से ज्यादा भयानक लगने लगे थे। लेकिन मुझे पता था कि यदि मैं स्कूल नहीं गया तो घर पर पिताजी की डांट खानी पड़ेगी और गया तो गुरुजी का डंडा और चिकोटी तैयार ही है। इसी कशमकश में मेरा बचपन कई दिनों से उलझता रहा। लेकिन जल्द ही गांव का यह अस्थायी स्कूल बंद हो गया और मुझे हमेशा के लिए छुटकारा मिल गया।


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