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करोगे याद तो …

Posted On August - 24 - 2019

अलविदा खय्याम

कविता

मशहूर संगीतकार खय्याम के निधन के साथ ही भारतीय सिनेमा में संगीत के एक युग का अंत हो गया। 28 जुलाई को कुर्सी से गिरने के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था। खय्याम 18 फरवरी 1927 को जालंधर के रोहान गांव में जन्मे थे। खय्याम का पूरा नाम मोहम्मद जहूर खय्याम हाशमी था लेकिन फिल्म जगत में वे खय्याम के नाम से मशहूर हुए। उमराव जान, बाज़ार, कभी-कभी, नूरी, त्रिशूल जैसी फ़िल्मों के गीतों की धुन बनाने वाले संगीतकार मोहम्मद ज़हूर खय्याम संगीत प्रेमियों के कानों में शहद घोलते रहे।
खय्याम बचपन में छिप–छिपाकर फ़िल्में देखा करते थे, जिसकी वजह से उनके परिवार वालों ने उन्हें घर से निकाल दिया था। ख्ाय्याम की उम्र जब महज 10 वर्ष की थी तब वह बतौर अभिनेता बनने का सपना संजोये अपने घर से भागकर अपने चाचा के घर दिल्ली आ गये। ख्ाय्याम के चाचा ने उनका दाखिला स्कूल में करा दिया लेकिन गीत-संगीत और फिल्मों के प्रति उनके आर्कषण को देखते हुए उन्होंने ख्ाय्याम को संगीत सीखने की अनुमति दे दी। उन्होंने संगीत की अपनी प्रारंभिक शिक्षा पंडित अमरनाथ और पंडित हुस्नलाल-भगतराम से हासिल की। इस बीच उनकी मुलाकात पाकिस्तान के मशहूर संगीतकार जीएस चिश्ती से हुई। चिश्ती ने ख्य्याम को अपने सहायक के तौर पर मौका दिया।

पहली बार हीर रांझा में दिया संगीत
खय्याम अपने करियर की शुरुआत अभिनेता के तौर पर करना चाहते थे पर धीरे-धीरे उनकी दिलचस्पी फ़िल्मी संगीत में बढ़ती गई और वह संगीत के मुरीद हो गए। उन्होंने पहली बार फ़िल्म हीर रांझा में संगीत दिया लेकिन मोहम्मद रफ़ी के गीत ‘अकेले में वह घबराते तो होंगे’ से उन्हें पहचान मिली। फ़िल्म ‘शोला और शबनम’ ने उन्हें संगीतकार के रूप में स्थापित कर दिया। वे मानते थे कि अभिनेत्री रेखा की अदाओं ने उनके संगीत में जान डाल दी थी। इस कड़ी में खय्याम ‘उमराव जान’ का खास ज़िक्र भी किया करते थे।

सेना में भर्ती हुए
बचपन से फिल्मों का शौक पालने वाले खय्याम को पिता के दबाव में आकर सेना में भर्ती होना पड़ा था। लेकिन 3 महीने बाद ही सेना की नौकरी छोड़ मुंबई जाकर हुस्नलाल भगत के सहायक बन गये।

अवॉर्ड
अपने 4 दशक लंबे करियर में खय्याम ने एक से बढ़कर एक गाने बनाए। उन्हें 1977 में ‘कभी कभी’ और 1982 में ‘उमराव जान’ के लिए बेस्ट म्यूजिक डायरेक्टर का फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला। साल 2010 में उन्हें फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से नवाजा गया। इसके अलावा साल 2007 में उन्हें संगीत नाटक अकादमी, पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। 2011 में उन्हें पद्म भूषण से भी सम्मानित किया गया।

‘ये है जिंदगी’ में की थी एक्टिंग
खय्याम ने भले ही बॉलीवुड में अपनी मधुर धुनों से लगभग पांच दशकों तक लोगों को अपना दीवाना बनाया लेकिन वह संगीतकार नहीं, बल्कि अभिनेता बनना चाहते थे। वर्ष 1948 में उन्हें बतौर अभिनेता एस. डी.नारंग की फिल्म ‘ये है जिंदगी’ में काम करने का मौका मिला लेकिन इसके बाद बतौर अभिनेता उन्हें किसी फिल्म में काम करने का मौका नहीं मिला।
इस बीच खय्याम बुल्लो सी.रानी अजित खान के सहायक संगीतकार के तौर पर काम करने लगे। इसके बाद संगीत की दुनिया में उन्होंने लंबी पारी खेली।


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