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ओ रे… कन्हैया

Posted On August - 18 - 2019

सद‍्गुरु जग्गी वासुदेव
अद‍्भुत था श्री कृष्ण का बाल्य जीवन। उनका मनमोहक चेहरा, अनुपम मुस्कान, बांसुरी और उनका नृत्य ऐसा था कि लोग आनंद में डूब जाते। यह एक ऐसा आनंद था, जिसे उन्होंने पहले कभी नहीं जाना था। वह पूरी बिरादरी को इतने बेसुध कर देते कि लोग उनके लिए पागल हो उठते। कृष्ण के बालपन के बारे में काफी कुछ कहा और लिखा गया है। उनके ऊपर असंख्य गीत भी लिखे गए हैं। यह कथा बरसों पुरानी है, जबकि ऐसा लगता है जैसे कल की ही बात हो।
बछड़े, गाय, चरवाहे और ऊपर टंगी मटकियां उनके बालपन से संबंधित हैं। ये सभी ग्रामीण संस्कृति के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। आज भी भारत के गांवों में दही और मक्खन ऊंची टंगी मटकियों में ही रखा जाता है, ताकि ये चीजें जानवरों और बच्चों से बची रहें। कृष्ण यह बात बड़ी मस्ती में कहते थे कि मैंने माखन चुराया। अगर मैं माखन नहीं चुराता तो गांववालों को आनंद ही नहीं आता। कृष्ण और उनके मित्र दूसरे लोगों की छतों की खपरैल खोलकर उनके घर में घुस जाते थे। मटकी ऊंचाई पर टंगी होने के कारण वे एक-दूसरे के कंधों पर पैर रखकर उस तक पहुंचते। अगर मटकी बहुत ऊंचाई पर होती थी तो वे पत्थर मारकर उसमें छेद कर देते। इससे उसमें रखा दही या मक्खन टपकने लगता था, और वे उसके नीचे मुंह खोलकर खड़े हो जाते थे। कभी मटकी पूरी फूट जाती थी, तो वे जमीन से उठाकर ही उसे जल्दी-जल्दी खाना शुरू कर देते थे। जब गोपियां शिकायत करने उनके घर पहुंचतीं, तो वे अपनी माता के पीछे छिप जाते और उन गोपियों की तरफ मासूम-सी नजरों से देखने लगते, जिससे सब मुस्करा देतीं।
कृष्ण को अलग-अलग लोगों ने अलग-अलग तरीकों से देखा, समझा और जाना है। लेकिन जिन लोगों ने अपनी समझ का उपयोग किया, वे कृष्ण की कृपा को नहीं पा सके। उन्हें वास्तव में जानने के लिए दिल में प्रेम होना जरूरी है। कृष्ण के आस-पास मौजूद लोगों ने कृष्ण का अलग-अलग रूपों में अनुभव किया। कृष्ण एक बहुत नटखट बच्चे हैं। वे एक बांसुरी वादक हैं और बहुत अच्छा नाचते भी हैं। वे अपने दुश्मनों के लिए भयंकर योद्धा हैं। वे एक चतुर राजनेता और महायोगी भी हैं। उनसे प्रेम करने वाले हर घर में मौजूद हैं।
हर परिस्थिति में चलायमान रहने का नाम है कृष्ण
कृष्ण ने अपने जीवन में जो कुछ भी किया, वह जोश और जुनून के साथ किया। चाहे एक बालक के रूप में देखें या एक युवा या एक योद्धा के रूप में, एक राजनीतिज्ञ के रूप में देखें या एक शिक्षक या एक दिव्य अवतार के रूप में देखें, उनके जीवन की किसी भी स्थिति में, सुस्ती का एक पल भी नहीं था। वह हर समय पूरे जोर-शोर से सक्रिय रहते थे। जो लोग चाहे किसी भी वजह से, हर समय खुद को सक्रिय रखने में सफल हो पाते हैं, निश्चित तौर पर एक बड़ी संभावना में विकसित होते हैं। चाहे हम अपना ध्यान जागरूकता पर केंद्रित करें, या भक्ति, क्रिया या अपनी ऊर्जा पर, आखिरकार हम यही देखते हैं कि वह जीवन, जो आप हैं, उसे हर समय सक्रिय और जीवंत कैसे रखें। अगर यह हर समय सक्रिय रहेगा, तो यह आपको परम प्रकृति तक ले जाएगा। अब सवाल है कि इसे सक्रिय कैसे रखें? हालांकि कृष्ण ने अपनी शिक्षा में चारों मूलभूत तरीकों (कर्म, ज्ञान, भक्ति, क्रिया) की बात की, मगर उन्होंने भक्ति के मार्ग पर ज्यादा जोर दिया। इसलिए नहीं क्योंकि वह जागरूकता या क्रिया से बेहतर है, बल्कि इसलिए क्योंकि उन्होंने देखा कि ज्यादातर लोग किसी और चीज की बजाय भावनाओं के प्रदर्शन में अधिक सक्षम हैं। अगर आप खुशहाली के अर्थ में अपने जीवन को देखें, जैसे मान लीजिए, आज आपका कारोबार अच्छा चल रहा है, आपकी नौकरी अच्छी चल रही है, सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा है, मगर जैसे ही कोई भावनात्मक मुद्दा सामने आता है, आपके अनुभव में आपका जीवन बेकार हो जाता है। दूसरी ओर, मान लीजिए, आज आपकी नौकरी या कारोबार बहुत अच्छा नहीं चल रहा है, मगर जब आप घर आते हैं और भावनात्मक स्तर पर सब कुछ अच्छा मिलता है, तो भावनात्मक पहलू बाकी सारी चीजों को दबा देता है।
ज्यादातर लोगों के लिए, भावनाएं सबसे प्रधान होती हैं। वे जीवन के किसी और पहलू के बजाय भावनाओं के जरिये ज्यादा आसानी से तीव्रता के चरम पर पहुंच सकते हैं। भावना, भक्ति या जोश के मार्ग के लिए एक तरह की बेफिक्री या उन्मुक्तता की जरूरत होती है।
योद्धा, प्रेमी, सखा : एक संपूर्ण जीवन का संदेश
कृष्ण परिस्थितियों के हिसाब से कर्म की बात करते हैं। कुछ लोगों के साथ उनका व्यवहार करुणा से भरा होता था, तो कुछ लोगों के साथ वह बड़ी कठोरता के साथ पेश आते थे। जहां उन्हें किसी को जान से मारना जरूरी लगा, वहां उन्होंने मारा भी, और जहां किसी की देखभाल करने की जरूरत थी, वहां उन्होंने देखभाल भी की। दरअसल, उनकी कोई एक नीति नहीं थी। वह तो बस जीवन थे। जब जिस तरह से जीवन के साथ पेश आने की जरूरत पड़ी, वे उसके साथ उसी तरह पेश आए। वे शांति, प्रेम और करुणा के साकार रूप थे। उन्होंने शांति स्थापित करने की पूरी कोशिश की, लेकिन जब लड़ाई के मैदान में उतरना पड़ा तो वे एक शूरवीर योद्धा की तरह उतरे। जब राजाओं के दरबार में जाते, तो वहां वे एक कुशल राजनेता होते थे। जब अपनी प्रेमिका के साथ होते, तो वे एक शानदार प्रेमी होते थे। बच्चों के साथ होते, तो पूरी तरह से बच्चा बन जाते थे। चाहे जैसी परिस्थिति हो, चाहे जैसे लोग हों, वे हमेशा उनके साथ सहज थे। क्योंकि जीवन का एक भी पहलू उनसे अछूता नहीं था। जीवन जिस रूप में भी उनके सामने आता, उसी रूप में वे उसे जीने को तैयार रहते, और उनकी यही बात उन्हें बेहद खास बनाती है। युद्ध के मैदान में जाने से पहले अंतिम पल तक उनकी यही कोशिश होती थी कि युद्ध को कैसे टाला जाए। लेकिन, जब यह तय हो जाता कि अब युद्ध को नहीं टाला जा सकता, तो वह मुस्कुराते हुए युद्ध के मैदान में जाते। एक बार जरासंध अपनी सेना लेकर मथुरा आया। वह कृष्ण और बलराम को मार डालना चाहता था, क्योंकि उन्होंने उसके दामाद कंस का वध कर दिया था। कृष्ण और बलराम जानते थे कि उन्हें मारने की खातिर जरासंध मथुरा नगरी की घेराबंदी करके सारे लोगों को यातनाएं देगा, तो लोगों की जान बचाने के लिए उन्होंने अपने परिवार और महल को छोड़ने का फैसला कर लिया और किसी निर्जन स्थान पर चले गए। इस दौरान उन्हें तरह-तरह के शारीरिक कष्ट झेलने पड़े। कृष्ण ने इसे बड़ी सहजता से लिया। सब कुछ उनके लिए सीखने की एक प्रक्रिया थी। उन्होंने वनों और पर्वतों का भरपूर आनंद लिया। उन्होंने बलराम को भी सिखाया कि जंगल में कैसे रहा जाता है। बलराम थोड़े खीज गए तो कृष्ण ने कहा, ‘ऐसी चीजें हमारे साथ बस इसलिए हो रही हैं, क्योंकि हम लोग जीवन को तीव्रता और गहराई में जी रहे हैं। वो सब कुछ, जिसमें जीवन है, हमारे साथ घटित होगा। दूसरों के साथ यह सब नहीं होगा। देखिए, उनका जीवन कितना नीरस है। हमें जंगलों में रहना पड़ रहा है, अपने भोजन के लिए संघर्ष करना पड़ता है, इसके लिए हमें यहां-वहां जाना पड़ता है, लेकिन देखिए हमारा जीवन कितना जोश से भरा हुआ है। यह सब हमारे साथ इसलिए हो रहा है, क्योंकि इस तरह का जोशपूर्ण जीवन जीने का चयन हमने किया है। इस तरह मुस्कुराते हुए उन्होंने उन कठोर परिस्थितियों का सामना किया। कृष्ण ने बहुआयामी जीवन जीने का चुनाव किया था। ऐसा भी नहीं था कि उनके पीछे हजारों की तादाद में शिष्य चल रहे हों। उन्होंने तो बस अपना जीवन जिया। उनका जीवन स्वयं में एक शिक्षा है। (साभार isha.sadhguru.org)


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