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एक्यूट इंसेफेलाइिटस सिंड्रोम से बच्चों को बचाएं

Posted On August - 17 - 2019

प्रमीला गुप्ता

हर साल बिहार के मुजफ्फरपुर, वैशाली, शिओहर और चंपारण जिलों में एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम यानी दिमागी बुखार सैकड़ों मासूम बच्चों की जान ले लेता है। बिहार में इसको चमकी बुखार कहा जाता है।

हर साल बिहार के मुजफ्फरपुर, वैशाली, शिओहर और चंपारण जिलों में एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम यानी दिमागी बुखार सैकड़ों मासूम बच्चों की जान ले लेता है। बिहार में इसको चमकी बुखार कहा जाता है। आखिरकार यह एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम है क्या?

एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम
वास्तव में एईएस में दिमाग की स्नायु प्रणाली में संक्रमण फैलने से सूजन आ जाती है। शीघ्र ही उपचार न होने पर यह मृत्यु का कारण बन सकता है। वर्ष 1955 में तमिलनाडु के वेल्लोर ज़िले में सबसे पहले इस रोग की पहचान हुई थी। उस समय इसको वायरस से उत्पन्न ‘जापानी इंसेफेलाइटिस’ नाम दिया गया था। समय के साथ-साथ इस बीमारी का दायरा बढ़ता गया। बीमारी के प्रेरक कारक भी 100 से अधिक वायरस हो गए। इनमें अधिकांश वायरस अज्ञात हैं।
बीमारी भी कई तरह की हो गयी है यथा- मेनेंजाइटिस, जापानी इंसेफेलाइटिस, इंसेफेलोपैथी, दिमागी मलेरिया और टाइफस। वर्ष 2006 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दिमाग से सम्बद्ध इन सभी बीमारियों को सामूहिक रूप से ‘एईएस’ की संज्ञा दी थी।

लीची के साथ हाइपोग्लाइसीमिया का संबंध
मुजफ्फरपुर में डॉ. अरुण शाह और डॉ. जैकब ने 2012-2013 में किए गए गहन शोध के बाद यह निष्कर्ष निकाला है कि इसका कारण लीची अथवा पर्यावरण में मौजूद कोई विषाक्त रसायन हो सकता है। पशुओं पर किए गए परीक्षण में हाइपोग्लाइसीमिया (ब्लड शुगर में कमी) लीची में मौजूद मेथिलीन साइक्लोप्रोपिल ग्लिसिन (एमसीपीजी) को पाया गया था। यह प्राकृतिक रूप से एमिनो एसिड होता है। वर्ष 2017 में भारत-अमेरिका की संयुक्त टीम ने भी लीची में विषाक्त रसायन (एमसीपीजी) के मौजूद होने की पुष्टि कर दी थी।

लीची से दिमागी बुखार कैसे होता है?
एकत्र प्रमाणों के अनुसार अप्रैल-मई में लीची तोड़ने के समय प्रवासी मजदूरों के बच्चे सारा दिन लीची इकट्ठी करके खाते रहते हैं, उसी से पेट भर लेते हैं और रात को खाना खाए बगैर सो जाते हैं। सामान्यतः सुबह के समय खाली पेट ब्लड शुगर कम रहती है। ऐसे बच्चों की ब्लड शुगर ज्यादा कम हो जाती है। सक्रिय रहने के लिए दिमाग को निश्चित मात्रा में ऊर्जा की ज़रूरत होती है।
कुपोषित बच्चों का लीवर कमज़ोर होता है इसलिए ऊर्जा और ग्लूकोज़ उत्पन्न करने के लिए वैकल्पिक मार्ग फैट्टी एसिड ऑक्साइडेशन काम करने लगता है लेकिन लीची में विद्यमान विषाक्त रसायन (एमसीपीजी) मार्ग में रुकावट बन जाता है। रक्त में ग्लूकोज़ का प्रवाह रुक जाता है, जिस कारण से शरीर के लिए आवश्यक ब्लड शुगर की आपूर्ति नहीं हो पाती है न ही दिमाग में ऊर्जा की सप्लाई होती है। लीची में विद्यमान विषाक्त रसायन (टॉक्सिन) दिमाग पर प्रभाव डालता है और मृत्यु का कारण बनता है। विषाक्त रसायन के कारण ब्लड शुगर की कमी को पूरा करने वाला प्राकृतिक मार्ग बंद हो जाता है और दिमाग में ऊर्जा की सप्लाई कम हो जाती है। इस कारण से भ्रम, बेहोशी तथा चक्कर की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
जब विषाक्त रसायन फैट्टी एसिड को ग्लूकोज़ में परिवर्तित होने से रोक देता है तब एमिनो एसिड मार्ग बना लेता है, जो दिमाग की कोशिकाओं के लिए विषाक्त होता है। एमिनो एसिड के कारण दिमाग में सूजन आ जाती है। भ्रम, भटकाव चक्कर आने लगते हैं। जल्दी उपचार न होने पर मृत्यु की आशंका रहती है।
उपचार : डॉ. जैकब के विचार में हाइपोग्लाइसीमिया एन्सेलोपैथी (दिमागी बुखार) से पीड़ित बच्चे का इलाज संभव है। उनके अनुसार रोग के लक्षण प्रकट होते ही तत्काल चिकित्सा केंद्र ले जाना अत्यावश्यक है। बीमारी के लक्षण प्रकट होने के बाद चार घंटे के भीतर यदि हाइपोग्लाइसीमिक एंसेफेलोपैथी से पीड़ित बच्चे के शरीर में 10 प्रतिशत डेक्सट्रोज चढ़ा दिया जाए तो बच्चे के बचने की संभावना रहती है।

दिमागी बुखार क्या है?

  • यह ‘एईएस’ समूह का ‘इंसेफेलोपैथी’अर्थात दिमागी बुखार है। शरीर की रासायनिक प्रक्रिया में असंतुलन, किडनी अथवा लीवर का काम न करना, ब्लड शुगर में कमी व विषाक्त खाने से दिमाग की स्नायु प्रणाली का काम न करना इसके प्रमुख संकेत हैं।
  • अधिकांश रोगी 2 वर्ष से 10 वर्ष की आयु के कुपोषित बच्चे होते हैं। समय पर उपचार न हो पाने के कारण अधिकांश की मृत्यु हो जाती है।
  • मुजफ्फरपुर में चमकी बुखार का पहला मामला 1995 में सामने आया था। इस बीमारी के फैलने के निश्चित मापदंड तो नहीं हैं लेकिन ज्यादा गर्मी और बारिश की कमी के कारण ऐसे मामलों में वृद्धि देखी जाती है।
  • कुपोषण एईएस बीमारी का एक अन्य प्रमुख कारण है। बिहार और उत्तर प्रदेश दोनों ही राज्यों में अत्यधिक कुपोषण है और कुपोषित बच्चे बहुत जल्दी संक्रमित हो जाते हैं।
  • सेंटर फॉर डिजीज़ कंट्रोल, अटलांटा और वेल्लोर के क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज की संयुक्त टीम का यह निष्कर्ष था कि खराब वातावरण, गर्मी, उमस अौर कुपोषण इन इलाकों में एईएस के फैलने के कारण हैं। मुजफ्फरपुर, वियतनाम और बांग्ला देश में दिमागी बुखार के साथ हाइपोग्लाइसीमिया का अनोखा संबंध है। साल 2014 में एक रिसर्च पेपर ‘एपिडेमियोलॉजी ऑफ एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम इन इंडिया : चेंजिंग पैराडाइम एंड इंप्लीकेशन फॉर कंट्रोल’ में बिहार के मुजफ्फरपुर और वियतनाम के बाक गियांग प्रांत के मामलों में समानता दिखाई गयी है। दोनों ही जगहों पर पड़ोस में ही लीची के बाग थे।

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