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इतिहास के आईने से प्रतिबंधित साहित्य

Posted On August - 11 - 2019

राजवंती मान

मुझको कौमी दर्द का बीमार रहने दीजिये।
मुल्क की खातिर मुझे बेजार रहने दीजिये॥
(प्रतिबंधित लाहौर की फांसी’ उर्फ भगतसिंह का तराना, एन.एल.ए. ‘बमलट’, 1931, बनारस सिटी)

अंग्रेजों के भारत में काबिज़ होते ही प्राच्य ज्ञान, संस्कृति और मूल्यों पर पाश्चात्य असर दृष्टिगोचर होने लगा। सभ्यताओं के बीच की खाई से जागरूक लोग भारतीय जनता के एक हिस्से की उदीयमान राष्ट्रीय प्रतीक बन रहे थे। परंपरागत चिंतन और पाश्चात्य प्रभाव से राष्ट्रीय चेतना का ढांचा गुना-बुना जाने लगा, जिसको साहित्य, कला, राजनीतिक और सामाजिक सुधार आंदोलनों और बौद्धिक–साहित्यिक संगठनों के माध्यम से अभिव्यक्ति मिली।

18 57 का स्वातंत्र्य समर- प्रकाशन से पूर्व प्रतिबंधित पहली पुस्तक
वर्ष 1857 का सशक्त प्रतिरोध विदेशी शासन से मुक्ति पाने का पहला सुनियोजित प्रयास था, जिसे अंग्रेजों ने निर्दयतापूर्वक कुचल दिया। इसे अंग्रेजों ने सिपाही विद्रोह या कुछ भारतीयों का स्वार्थ-हित विद्रोह कहकर सीमित करने की कोशिशें कीं। वीर सावरकर ने ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’ पुस्तक भारतीय दृष्टिकोण से लिखी। इसमें तत्कालीन संपूर्ण भारत की सामाजिक-राजनीतिक स्थिति के वर्णन के साथ-साथ हाहाकार मचा देने वाले रण-तांडव का सिलसिलेवार और हृदय-द्रावक वर्णन किया गया। इससे अंग्रेजी सरकार इस कदर भयभीत हुई कि इसे प्रकाशन से पूर्व ही प्रतिबंधित कर दिया।

आंदोलनों की बयार
बीसवीं सदी में गांधीजी के सत्याग्रह, असहयोग आंदोलन, जलियांवाला बाग हत्याकाण्ड, भगतसिंह, राजगुरु व सुखदेव की फांसी जैसी घटनाओं ने पूरे देश को झकझोर दिया। अंग्रेजी स्रोतों के बरअकस भारतीय दृष्टिकोण को साहित्यकारों ने कविता, नज़्म, ग़ज़ल, लेख, नाटक आदि विधाओं में व्यक्त किया। इनमें अधिकतर बुद्धिजीवी लेखक नहीं अपितु जनभाषा में लिखने वाले रचनाकार थे, जो स्थानीय तौर पर बहुत लोकप्रिय थे। मेलों, पर्वों और जन-सभाओं में इन रचनाओं ने लोगों को उद्वेलित किया। ये पढ़ी कम गईं लेकिन गायी ज्यादा गईं। मुंह से मुंह तक सफर करती लोक-चेतना के ध्येय को पहुंचती रही।
लेखक व प्रकाशक सरकार विरोधी रचनाओं के सृजन के खतरों को समझते थे फिर भी वे अपने नाम-पते के साथ आगे आये। गिरफ्तारी, पुलिस अत्याचार, जुर्माने, जब्ती सभी को झेलते हुए साहित्य रचा गया, जो ब्रितानी हुकूमत के लिए भयभीत करने वाला और असहनीय था। अत: सीआईडी तथा 1860 में बने आईपीसी कानून की धारा 124ए के तहत जब्त कर लिया जाता। कुछ ही प्रतियां गुप्त रूप से बची रहीं, जो भारत के विभिन्न अभिलेखागारों तक पहुंचीं।

इंडिया आफिस रिकॉर्ड लाइब्रेरी
लेखिका ने इंडिया ऑफिस लंदन में हिन्दी प्रतिबंधित साहित्य का अध्ययन किया। ब्रितानी हुकूमत द्वारा भारत के विभिन्न क्षेत्रों से जो भी आपत्तिजनक पैम्फलेट और साहित्यिक पुस्तिकाएं छपीं, उन्हें जब्त कर इंडिया ऑफिस लाइब्रेरी लंदन में स्थानांतरित कर दिया गया। यहां यह संग्रह अलमारियों में तालाबंद करके रखा गया। वर्ष 1947 के बाद ही इसे अलमारियों से निकाला गया, विस्तृत कैटलॉग तैयार किए गए और ‘गोपनीय संग्रह’ के तौर पर 1967 तक अलग रखा गया। अब यह साहित्य शोधकर्ताओं के लिए खुला है। यहां भारत की विभिन्न भाषाओं के उन्नीसवीं-बीसवीं सदी में प्रकाशित तथा प्रतिबंधित 28000 से भी अधिक प्रकाशन उपलब्ध हैं।

सियासी सरगर्मियों पर रचित इतिहास
वर्ष 1905 से 1931-32 तक की राजनीतिक सरगर्मियों पर सबसे अधिक साहित्य रचा गया, जिसने आज़ादी के संघर्ष में विशिष्ट भूमिका निभाई। जलियांवाला बाग (1919) त्रासदी पर ‘जख्मी पंजाब’ प्रतिबंधित ड्रामा लाला किशनचन्द ज़ेबा द्वारा वर्ष 1922 में लिखा गया और लाहौर से प्रकाशित हुआ। उस समय भारत सत्याग्रह की राह पर अग्रसर हो रहा था। स्वतंत्रता को ‘अस्तित्व के स्वाभाविक गुण’ की तरह पाने के लिए औपनिवेशिक साम्राज्य पर दबाव बना रहा था, दूसरी तरफ औपनिवेशिक प्रशासन भारत में अपना साम्राज्य बचाये रखने के लिए हर तरह की प्रताड़नाएं, जुल्म और जोर-जबरदस्ती से राष्ट्रवाद की भावना को कुचलने पर आमादा था।
एक अंश :-
अगर चलती रही गोली, यूं ही निर्दोष जानों पर।
तो कोए और कबूतर ही, रहेंगे इन मकानों पर॥
मिटा डालेंगे गर इस तरह, हाकिम अपनी प्रजा को।
हुकूमत क्या करेगी फिर वह, मरघट और मसानों पर॥

सुभद्रा कुमारी की सुप्रसिद्ध कविता ‘जलियांवाला बाग में बसंत’ से :-
ओ, प्रिय ऋतुराज! किन्तु धीरे से आना,
यह है शोक स्थान, यहां मत शोर मचाना।
परिमल-हीन पराग दाग-सा बना पड़ा है,
हा! यह प्यारा बाग खून से सना पड़ा है।
यहां कोकिला नहीं, काग हैं, शोर मचाते,
काले काले कीट, भ्रमर का भ्रम उपजाते।
कलियां भी अधखिली, मिली हैं कंटक कुल से,
वे पौधे, व पुष्प, शुष्क हैं अथवा झुलसे।

विदेशी कपड़ों के बहिष्कार,पश्चिमी फैशन पर साहित्यकार व्यंग्य करता हुआ लिखता है :-
सब यही कहते हैं हम साहब बने,
हाय! क्या पागल खुदाई हो गई।
यह नई तहजीब की तालीम है,
दाढ़ी-मूछों की सफाई हो गई।
कुत्ते का पट्टा तो कॉलर था जरूर,
और जंजीर उसकी टाई हो गई।
बस गई नज़रों में जब से लेडियां,
घर की जोरू से लड़ाई हो गई।
(प्रतिबंधित आजादी की तोप, भोलानाथ ‘बेढब’ 1930, काशी)
1931 में भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दिये जाने के विरोध में क्रांतिकारियों के प्रति सहानुभूति और अतुलनीय बलिदान पर विपुल साहित्य रचा, जिसे प्रतिबंधित कर दिया। साहित्यकारों ने हिन्दोस्तान की एकता को दीन-धर्म से ऊपर से ऊपर स्थान दिया।
एक प्रतिबंधित ग़ज़ल :-
तुम राम कहो वह रहीम कहें,
दोनों की गरज अल्लाह से है।
तुम दीन कहो वह धर्म कहें,
मंशा तो उस की राह से है॥
तुम इश्क कहो वह प्रेम कहें,
मतलब तो उसी की चाह से है।
वह जोगी हो तुम सालिक हो,
मकसूद दिले आगाह से है॥
क्यों लड़ता है मूरख बन्दे,
यह तेरी खाम खयाली है।
है पेड़ की जड़ तो एक वही,
हर मज़हब एक-एक डाली है॥
बनवाओ शिवाला या मस्जिद,
है ईंट वही चूना है वही।
मेमार वही मज़दूर वही,
मिट्टी है वही गारा है वही॥
फिर लड़ने से क्या हासिल है,
जीफ़हम हो तुम नादान नहीं।
भाई पर दौड़े गुर्रा कर वो,
हो सकते इंसान नहीं॥

(‘लाहौर की सूली’ पंडित प्रभु नारायण मिश्रा, 1931, गया)
छापेखाने की शुरुआत और जन-चेतना
भारत में छापेखाने खोलने का श्रेय पुर्तगालियों को जाता है, जिन्होंने 1550 ईसवी में बाहर से दो छापेखाने मंगवाए, जो धार्मिक पुस्तकें छापने के काम आते थे। तदुपरांत दक्षिण में कुछ छापेखाने लगे तथा 17वीं शताब्दी में भीमजी पारिख ने मुंबई में एक छापाखाना लगाया। ईस्ट इंडिया कंपनी ने भी 1674 में मुंबई में एक छापाखाना स्थापित किया। 18वीं सदी के दौरान मद्रास, कोलकाता, हुगली, मुंबई और उत्तर भारत में दो-एक स्थानों पर छापे खाने स्थापित हुए। पुस्तकें, पुस्तिकाएं और पत्रिकाएं छपने लगीं। लोगों ने पुस्तकों की उपयोगिता समझी और निजी छापेखाने भी स्थापित किये जाने लगे।
स्वतंत्र अख़बार के रूप में 1780 में जे.ए. हिक्की ने साप्ताहिक ‘बंगाल गजट’ प्रकाशित किया, जो ‘कोलकाता जनरल एडवर्टाइजर’ भी कहलाता था। यह ‘हिक्की गजट’ के नाम से अधिक प्रसिद्ध रहा। इसने वॉरेन हेस्टिंग्स जैसे ऊंचे अफसरों पर हमले किए, जिससे ब्रितानी सरकार नाराज़ हो गई। उनके विरुद्ध पहला कदम यह उठाया गया कि उनको डाक की सुविधाओं से वंचित कर दिया। उसके बाद छापेखाने पर कब्जा कर लिया। कुछ दूसरे अखबार भी प्रकाशित हुए, जिनके सरकार से वैमनस्यपूर्ण सम्बन्ध रहे और सरकारी क्रोध का सामना करना पड़ा।
कुछ संपादकों जैसे विलियन डूआन, चार्ल्स मैक्लीन और बाद में जेम्स सिल्क बकिंघम को तो भारत से निकाल बाहर कर दिया गया। समाचारपत्रों की भूमिका पर किसी अन्य लेख में चर्चा करेंगे।

दमनकारी नियम और कानून
प्रकाशन पर कड़े सेंसर लगा दिये और मुक्त प्रकाशन के प्रतिकूल 1818 में प्रेस नियम बनाए, जिनमें किसी कार्य या कार्रवाई की भारत सरकार से संबंधित इंग्लैंड के अन्य सार्वजनिक अधिकारियों की किसी प्रकार की निंदा, स्थानीय प्रशासन के राजनीतिक कार्य पर किसी प्रकार का निन्दात्मक लेख, काउंसिल के सदस्यों, उच्चतम न्यायालय के जजों के सार्वजनिक व्यवहार आदि सहित कई मामलों में टीका-टिप्पणी निषिद्ध कर दी गई। सरकार की दमनकारी कार्रवाइयों का अगला कदम 1867 में प्रेस एंड रजिस्ट्रेशन ऑफ बुक्स एक्ट था, जिसने किताबों और अखबारों की छपाई और प्रकाशन पर नियंत्रण लगाया। इसके तहत प्रकाशन की प्रति चाहे वह प्रतिबंधित ही क्यों न कर दिया हो, इंडिया ऑफिस लाइब्रेरी रिकॉर्ड को भेजना आवश्यक कर दिया।

प्रेस एक्ट लागू करने के पीछे की मंशा
तेजी से बढ़ रहे देसी प्रकाशनों पर 1878 में वर्नाकुलर प्रेस एक्ट लागू कर दिया, जो ब्रिटिश सरकार की आलोचना का मुखपत्र हो रहे थे, उन्हें दंडित किया गया। वर्ष 1910 का प्रेस एक्ट अंग्रेजों की कठोरतम कार्रवाई था। इसने प्रेस पर कार्यकारिणी का नियंत्रण बढ़ा दिया। कार्यकारिणी को अधिकार दे दिया गया कि वह ज़मानत वक्त में बहुत बड़ी राशि की मांग करें और इच्छा अनुसार जब्त कर लें। इसे मुद्रणालयों पर कब्जा कर लेने का अधिकार भी मिल गया। एक भारतीय जज लॉरेंस जेंकिंसन ने कहा कि प्रेस एक्ट के सेक्शन-4 की धाराएं बहुत व्यापक हैं, इसमें सारी बातों का समावेश है, जो कभी भी किसी भी आदमी के दिमाग में आ सकती हैं। इसका इस्तेमाल कुछ ऐसी किताबों के खिलाफ भी हो सकता है, जो तारीफ के काबिल हैं। ब्रितानी हुकूमत विरोधी प्रकाशन जब्त होते रहे और सारी यातनाएं, प्रताड़नाएं झेलते हुए इनकी संख्या उत्तरोत्तर बढ़ती रही। जनभावनाओं को अभिव्यक्त करता और आज़ादी के लिए प्रेरित करता यह प्रतिबंधित साहित्य अमूल्य है!


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