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आजादी का अहसास

Posted On August - 5 - 2019

अनूप भटनागर

हिन्दू समाज में व्याप्त सती प्रथा, देवदासी प्रथा और बाल विवाह जैसी कुरीतियों पर अंकुश लगाने के लिये कानून बनाने के बाद देश की संसद ने मुस्लिम समाज के सुन्नी समुदाय के एक वर्ग में प्रचलित एक बार में तीन तलाक देने की कुप्रथा को अब दंडनीय अपराध बनाकर मुस्लिम महिलाओं की अस्मिता को तार-तार होने से बचाने का प्रयास किया है। ‘मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण कानून’ बनाकर भारत भी दुनिया के उन करीब 20 से ज्यादा देशों में शामिल हो गया है, जहां तीन तलाक पर प्रतिबंध है।
संसद से ‘मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण विधेयक’ को मंजूरी मिलने और फिर राष्ट्रपति की संस्तुति मिलने के साथ ही अब यह कानून बन गया है। साथ ही इसकी संवैधानिकता को केरल के एक मुस्लिम संगठन ने सुप्रीमकोर्ट और एक वकील ने दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती भी दे दी है। इन याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इस कानून से मुस्लिम पतियों के मौलिक अधिकारों का हनन होता है।
आल इंडिया मुस्लिम पसर्नल ला बोर्ड सहित कुछ संस्थाएं भी इस कानून का मुखर विरोध कर रही हैं। मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड का तो यही तर्क है कि यह कानून मुस्लिम समाज पर थोपा जा रहा है और इस तरह से निजी मामलों में सरकार की दखलंदाजी बर्दाश्त नहीं करेंगे। ‘मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण कानून’ अस्तित्व में आने के साथ ही अब मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक की दहशत के साथ जीने से आजादी ही नहीं मिली, बल्कि शौहर द्वारा आवेश में आकर दिये गये तलाक के बाद अगर वह बीवी को दुबारा अपनाना चाहे तो इसके लिये तलाक की शिकार महिला को निकाह हलाला से गुजरने की मानसिक यातना से भी पूरी तरह निजात मिल गयी है। शीर्ष अदालत में अभी भी लंबित कुछ याचिकाओं में मुस्लिम महिलाओं ने निकाह हलाला को बलात्कार का अपराध घोषित करने का अनुरोध किया है। मुस्लिम समाज, विशेषकर सुन्नी समुदाय में एक ही बार में तीन तलाक देने की प्रथा थी। इस कुप्रथा की शिकार शायरा बानो ने इसके खिलाफ आवाज बुलंद कर 2016 में सुप्रीमकोर्ट में याचिका दायर की थी। इसके बाद, इस कुरीति के दंश की शिकार कुछ अन्य महिलायें भी शीर्ष अदालत पहुंचीं।
देश की सर्वोच्च अदालत ने 23 अगस्त, 2017 को बहुमत के फैसले में मुस्लिम समाज में प्रचलित ‘तलाक-बिद्दत’ अर्थात एक बार में तीन तलाक देने की परंपरा को गैरकानूनी और असंवैधानिक करार दिया था। इस फैसले के बाद अचानक ही छोटी-छोटी बात पर तीन तलाक देने की घटनायें तेजी से सामने आने लगीं और देखते ही देखते इनकी संख्या 500 का आंकड़ा पार कर गयी। इन घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में मुस्लिम महिला संगठन शरिया के साथ किसी प्रकार की छेड़छाड़ के बिना मुस्लिम महिलाओं को उत्पीड़न से बचाने के लिये उचित कानून बनाने की मांग करने लगे। सरकार ने इस मुद्दे को गंभीरता से लिया और 2017 में ही मुस्लिम महिलाओं के हितों की रक्षा के कानून का मसौदा तैयार किया और उसे लोकसभा से पारित भी करा लिया था, लेकिन राज्यसभा में अल्पमत में होने के कारण उसे इसमें सफलता नहीं मिली थी। लेकिन, 17वीं लोकसभा के चुनाव के बाद राजनीतिक समीकरण बदले और सरकार इसे संसद से पारित कराने में सफल रही। बहरहाल, अब ‘मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण कानून’ बन चुका है और इसका मकसद तीन तलाक की शिकार मुस्लिम महिलाओं और उनके नाबालिग बच्चों के हितों की रक्षा करना है। इस कानून में प्रावधान है कि यदि कोई मुस्लिम पति लिखित, मौखिक या किसी इलेक्ट्रॉनिक तरीके सहित किसी भी रूप में अपनी पत्नी को एक बार में तलाक शब्द का तीन बार उच्चारण करता है, जिसके परिणाम स्वरूप यह अपरिवर्तनीय तलाक होता है, तो ऐसी घोषणा गैरकानूनी और शून्य होगी। कानून में इस तरह से तलाक देने को संज्ञेय और गैर जमानती अपराध बनाया गया है। कानून में इस तरह से तलाक देने वाले पति के लिये तीन साल की कैद और जुर्माने की सजा का प्रावधान है। हां, इस कानून में तलाक देने के आरोपी व्यक्ति के लिये जमानत का प्रावधान है, लेकिन मजिस्ट्रेट की अदालत पीड़ित महिला का पक्ष सुने बिना जमानत नहीं दे सकती। इसमें यह भी प्रावधान है कि इस तरह के तलाक की शिकार महिला अपने पति से अपने और अपने आश्रित बच्चों के लिये पर्याप्त गुजारा भत्ते की हकदार है और वह इसके लिये प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट की अदालत का दरवाजा खटखटा सकती है। जहां तक इस प्रकार से तलाक दी गयी महिला के अवयस्क बच्चों की हिफाजत और देखरेख का सवाल है तो उसे अपने बच्चों की सुपुर्दारी के लिये भी मजिस्ट्रेट की अदालत से अनुरोध करना होगा। तीन तलाक की कुरीति पर अंकुश लगाने की दिशा में मुस्लिम महिलाओं ने ही दृढ़ता से पहल की थी, जिसकी परिणति सुप्रीमकोर्ट द्वारा ‘तलाक-बिद्दत’ नाम से प्रचलित इस कुप्रथा को गैरकानूनी और असंवैधानिक घोषित करने के साथ हुई थी। तीन तलाक को असंवैधानिक करार देने की न्यायिक व्यवस्था के बाद मुस्लिम समाज के एक वर्ग ने इसका विरोध किया और उसने इसे मुस्लिम समुदाय की रीतियों में हस्तक्षेप बताने का भी प्रयास किया।
इस तरह के विरोध ने सहसा ही 1985 के बहुचर्चित शाह बानो प्रकरण में सुप्रीमकोर्ट की व्यवस्था के बाद उत्पन्न माहौल की याद ताजा कर दी थी। सरकार ने अगर शाह बानो प्रकरण में सुप्रीमकोर्ट की 1985 की व्यवस्था में बदलाव नहीं किया होता तो शायद मुस्लिम महिलाओं को अपने हितों की रक्षा के लिये इतना लंबा संघर्ष नहीं करना पड़ता। सरकार जहां मुस्लिम महिलाओं को तीन बार के तलाक के दंश से बचाने के लिये उन्हें कानूनी संरक्षण प्रदान करने का प्रयास कर रही थी, वहीं कांग्रेस सहित कुछ दल राज्यसभा में इस प्रक्रिया को लंबा खींचने के लिये कृतसंकल्प नजर आ रहे थे। एक बार तो ऐसा महसूस होने लगा था कि कहीं मुस्लिम महिलाओं के हितों की रक्षा की यह कवायद भी शाह बानो प्रकरण की तरह ही तुष्टीकरण और वोटों की राजनीति की भेंट न चढ़ जाये, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मुस्लिम महिलाओं ने हालांकि तीन तलाक के खिलाफ एक जंग जीत ली है, लेकिन उन्हें अभी कई अन्य कुप्रथाओं से निजात पाने के लिये संघर्ष करना है।

अभी खत्म नहीं हुआ संघर्ष
मुस्लिम महिलाओं ने तीन तलाक को असंवैधानिक घोषित कराने में मिली सफलता के बाद अब उनके मानसिक और दैहिक उत्पीड़न की वजह बनी ‘निकाह हलाला’ और 4 बीवियां रखने की प्रथा के साथ ही ‘निकाह मुताह’ तथा ‘निकाह मिस्यार’ को शीर्ष अदालत में चुनौती दी है। ‘निकाह मुताह’ तथा ‘निकाह मिस्यार’ अस्थाई निकाह हैं और इनके लिये पहले से ही इस रिश्ते की मियाद निर्धारित होती है। शीर्ष अदालत की संविधानिक पीठ के समक्ष लंबित इन याचिकाओं में कहा गया है कि भारतीय दंड संहिता की धारा 494 के तहत बहुविवाह अपराध है, लेकिन मुस्लिम पर्सनल लाॅ की वजह से यह प्रावधान इस समुदाय पर लागू नहीं हो रहा है। इससे विवाहित मुस्लिम महिला के पास ऐसा करने वाले अपने पति के खिलाफ शिकायत करने का रास्ता नहीं है। इन प्रथाओं के खिलाफ आवाज उठाने वाली मुस्लिम महिलाओं का तर्क है कि मुस्लिम पर्सनल लाॅ में प्रदत्त इन तमाम किस्म की शादियों से उनके मौलिक अधिकारों का हनन होता है। याचिका में मुस्लिम विवाह विच्छेद कानून, 1939 को असंवैधानिक और संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 21 और 25 में प्रदत्त अधिकारों का हनन करने वाला घोषित करने का अनुरोध किया गया है। उम्मीद की जानी चाहिए कि तीन तलाक के खौफ से आजादी मिलने के बाद शादी से संबंधित मुद्दों को लेकर अपने हकों की रक्षा के लिये मुस्लिम महिलाओं को शीर्ष अदालत में आगे भी सफलता मिलेगी, लेकिन अभी तो यह देखना है कि नये कानून को चुनौती देने की तैयारी कर रहे मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड और कुछ अन्य संगठनों की कवायद की परिणति किस रूप में होती है।

निकाह हलाला
आवेश में आकर बीवी को एक ही झटके में तीन बार तलाक देने और गलती का अहसास होने पर उसे फिर से अपनाने की प्रक्रिया के बीच आने वाली प्रथा ‘निकाह हलाला’ है। इसका सार यही है कि ‘करे कोई, भरे कोई’। गलती शौहर करे और मानसिक तथा शारीरिक यातना बीवी सहे। निकाह हलाला और इसका शिकार मुस्लिम महिलाओं के साथ ही अपनी बीवी को आवेश में आकर तलाक देने वाले पति की मानसिक स्थिति को समझने के लिये फिल्म अभिनेता नवाजुद्दीन सिद्दीकी द्वारा बनायी गयी लघु फिल्म ‘मियां कल आना’ देखना ही पर्याप्त होगा। कई अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित यह फिल्म बेहद संवेदनशील है और इसमेें आवेश में उठाये गये अविवेकपूर्ण कदम के दुष्परिणामों को बेहद मार्मिक तरीके से दिखाया गया है। लघु फिल्म ‘मियां कल आना’ में नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने दिखाया है कि एक युवक गुस्से में अपनी बीवी को तलाक दे देता है। बाद में अपने निर्णय से परेशान और इसे लेकर घर में हंगामे की वजह से वह उसे फिर से अपनी बीवी बनाना चाहता है, लेकिन निकाह हलाला की प्रथा आड़े आ जाती है। खैर, गांव में कुछ परिचितों की सलाह और प्रयासों से एक मौलवी साहब को इस प्रक्रिया के लिये तैयार किया जाता है। यह मौलाना हजारों रुपये लेकर इसके लिये तैयार होते हैं। मौलाना के साथ महिला का निकाह हो जाता है। युवक जब अगले दिन अपनी पूर्व बीवी को लेने मौलाना के यहां पहुंचता है तो वह बहाना बनाते हुये कहते हैं कि मियां कल आना। यह सिलसिला करीब एक महीने चला और मौलवी साहब लगातार बेबस युवक को टालते रहे। अंततः युवक को मौलवी साहब की नीयत पर संदेह हुआ और वह उनकी बुरी तरह पिटाई कर देता है। मामला पंचायत में पहुंचता है, जहां मौलवी साहब के रवैये की निंदा की जाती है और पंचायत निकाह हलाला की प्रथा को भी गलत और महिला के लिये अपमानजनक बताती है। मस्जिद के अंदर पंचायत में हो रही बहस लाउडस्पीकर से बाहर सुनाई पड़ रही है। इसी में कहा जाता है कि तलाक किसने दिया, शौहर ने। गुस्सा किसे आया, शौहर को। गलती किसकी शौहर की और सजा किसे मिल रही है? तू (शौहर) अपना हलाला करवा। ये हलाला क्या है? बेगैरती का कड़वा घूंट है, बदमाशी का खुफिया रास्ता है, मक्कारी का अड्डा है। ये औरत है, भेेड़ बकरी नहीं हैं, ये औरत है, गाय भैंस नहीं है कि आज इस किल्ले से बांध दो और कल दूसरे किल्ले से।

आसान नहीं समान नागरिक संहिता बनाना

सुप्रीमकोर्ट ने शाह बानो मामले में संभवतः पहली बार देश में समान नागरिक संहिता बनाने के बारे में सुझाव दिया था। संविधान पीठ ने तलाक और गुजारा भत्ता जैसे महिलाओं से जुड़े मुद्दों के परिप्रेक्ष्य में देश में समान नागरिक संहिता बनाने पर विचार का सुझाव दिया था। संविधान पीठ की राय थी कि समान नागरिक संहिता देश में राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने में मददगार होगी, लेकिन उसे इस बात का भी अहसास था कि कोई भी समुदाय इस विषय पर रियायत देते हुये बिल्ली के गले में घंटी बांधने का प्रयास नहीं करेगा। न्यायालय ने फैसले में यह टिप्पणी भी की थी कि सभी नागरिकों के लिये समान नागरिक संहिता की परिकल्पना करने वाला संविधान का अनुच्छेद 44 मृत प्राय: है। संविधान का अनुच्छेद 44 कहता है, ‘शासन भारत के समस्त राज्यक्षेत्र में नागरिकों के लिये एक समान सिविल संहिता प्राप्त कराने का प्रयास करेगा।‘ हालांकि यह प्रावधान शुरू से ही संविधान में है, लेकिन इसकी संवेदनशीलता और देश की सांस्कृतिक तथा पारंपरिक विविधता को देखते हुये इसे मूर्तरूप देने की दिशाा में कभी भी कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा सका है।

शाह बानो से शायरा बानो तक
पति द्वारा तलाक देने के कारण गुजारा भत्ते के लिये अदालत का दरवाजा खटखटाने वाली 5 बच्चों की मां शाह बानो के संघर्ष को कभी भुलाया नहीं जा सकता। शाहबानो को देश की सर्वोच्च अदालत से सफलता मिली, लेकिन तुष्टीकरण और वोट की राजनीति के तहत 1985-86 में तत्कालीन सरकार ने इस फैसले को निष्प्रभावी बनाकर ऐसी मिसाल पेश की, जिसने देश की राजनीति की दिशा को ही बदल दिया। सुप्रीमकोर्ट में इस मामले की सुनवाई के दौरान शाह बानो के पति का तर्क था कि मुस्लिम पर्सनल लाॅ के तहत तलाकशुदा महिलाओं को भरण पोषण भत्ता देने का कोई प्रावधान नहीं है। दूसरी ओर, शाह बानो की ओर से दलील दी गयी थी कि दंड प्रक्रिया संहिता देश के प्रत्येक नागरिक पर समान रूप से लागू होती है, इसलिए वह अपने पति से गुजारा भत्ता पाने की हकदार है। शीर्ष अदालत के तत्कालीन चीफ जस्टिस वाईवी चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली 5 सदस्यीय संविधानिक पीठ ने अप्रैल 1985 में शाह बानो के पक्ष में फैसला सुनाते हुये उसके पति को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत भरण पोषण के लिये गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया था। न्यायालय के इस ऐतिहासिक निर्णय का अनेक मुस्लिम संगठनों ने जोरदार विरोध किया तो तत्कालीन सत्तारूढ़ सरकार ने इसके पक्ष में आरिफ मोहम्मद खां सरीखे प्रगतिशील और पढ़े-लिखे नेताओं को आगे बढ़ाया। लेकिन बाद में मुस्लिम समाज के कुछ वर्गों और संगठनों के दबाव में इस फैसले को बदलते हुये एक नया कानून ही बना दिया। इस घटना ने बाद में आरिफ मोहम्मद खां को हाशिये पर डाल दिया।


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