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शिवतुल्य जो बोलता है, वही जप है

Posted On July - 21 - 2019

ओशो

शिवसूत्र है- कथा जपः। दानमात्मज्ञानम‍्।
स्वशक्ति प्रचयोऽस्य विश्वम‍्, स्थितिलयौ।

यानी वे जो भी बोलते हैं, वही जप है। आत्मज्ञान ही उनका दान है। जो अंतस शक्तियों का स्वामी और ज्ञान का कारण है, स्वशक्ति का सतत‍् विलास ही इसका विश्व है और वह स्वेच्छा से स्थिति और लय करता है।
ये सूत्र चिंगारियों की तरह हैं। इन्हें अपने ज्ञान को हटाकर समझने की कोशिश करना; क्योंकि ज्ञान से समझा तो समझ ही न पाओगे। पहला सूत्र है: ‘कथा जपः।’ जो शिवतुल्य हो गए हैं, वे जो भी बोलते हैं, वही जप है। क्योंकि उनके हृदय में संसार न रहा, वासना न रही, अंधेरा न रहा, उनका हृदय एक प्रकाश है। उस हृदय से अब जो भी आता है, वह जप है। उससे जप के अन्यथा कुछ आ ही नहीं सकता। प्रकाश से अंधकार कैसे आएगा! प्रेम से घृणा कैसे आएगी! करुणा से क्रोध कैसे आएगा! अब उनके भीतर से जो भी आता है, वही जप है। शिवतुल्य जो हो गया, उसका सारा आचरण साधना हो जाता है।
तुम्हारे भीतर शिवत्व तो बैठा ही हुआ है। वह तुम्हारा सदा का खजाना है। उसे पाने के लिए सिर्फ आंख मोड़ कर देखने की जरूरत है। अगर वह कहीं भविष्य में होता, तो फिर कठिनाई थी, फिर समय लगता, जन्म-जन्म लगते। वह तुम्हारे भीतर है। इसलिए शिवत्व को पाना नहीं है, केवल आविष्कृत करना है; सिर्फ उघाड़ना है। जैसे कोई प्याज के छिलकों को उघाड़ता चला जाए। फिर क्या घटता है? एक-एक छिलका निकलता है, दूसरा छिलका सामने आ जाता है। उघाड़ते ही चले जाओ, उघाड़ते ही चले जाओ। एक घड़ी आएगी, जब सब छिलके निकल जाएंगे, सिर्फ शून्य हाथ लगेगा। ऐसे ही आदमी के ऊपर छिलके हैं। और शिवत्व तो शून्य जैसा है। इन छिलकों को हम थोड़ा समझ लें, तो उघाड़ने की आसानी हो जाए; तो तुम्हारा जीवन भी शिव जैसा हो जाए; तो तुम्हारा बोलना भी जप हो जाए।

पहली पर्त शरीर
पहली पर्त शरीर की है। और ज्यादातर लोग इस पहली पर्त से ही अपने को एक मान कर जी लेते हैं। वे ऐसे ही हैं, जैसे किसी महल की सीढ़ियों पर बैठ कर जी रहे हों, उन सीढ़ियों को ही घर बना लेते हैं। उन्हें पता ही नहीं कि सीढ़ियां घर नहीं हैं, सिर्फ घर तक पहुंचने का उपाय हैं। वे वहीं खाते हैं, पीते हैं, भोजन बनाते हैं, शादी-विवाह करते हैं, बच्चे पैदा करते हैं। और उनके बच्चों को तो महल का पता ही नहीं चलेगा, क्योंकि वे सीढ़ियों पर ही पैदा होंगे; वही उनका घर होगा, वे वहीं रहेंगे। वे कभी लौट कर पीछे की तरफ देखते भी नहीं कि ये सीढ़ियां हैं और हम बाहर ही जीवन बिता रहे हैं, महल पीछे है। वे कभी द्वार पर दस्तक भी नहीं देते। और जन्मों-जन्मों से दस्तक नहीं दी है। द्वार करीब-करीब जाम हो गया है। शायद द्वार दीवार जैसा ही लगने लगा है। अब कुछ पता नहीं चलता, कहां द्वार है।
पहली पर्त है शरीर की। और शरीर में ही तुम जी लेते हो। एक तादात्म्य है, जिससे लगता है कि मैं शरीर हूं। शरीर तुम्हारा है, तुम नहीं। शरीर में तुम हो, लेकिन शरीर ही तुम नहीं हो। उसके साथ तुम बहुत दिन तक रहे हो, जोड़ हो गया है; जुड़वा हो, साथ-साथ पैदा हुए हो। सारी दुनिया कहती है कि तुम शरीर हो। उनका समझना ठीक है। लेकिन तुम भी इसे मान लेते हो, वहां भ्रांति हो जाती है। पहली पर्त को तोड़ना शुरू करो। धीरे-धीरे इस स्मरण को प्रगाढ़ करो कि मैं शरीर नहीं हूं। इसे अनुभव में उतारो। सिर्फ दोहराने से न होगा। शरीर के प्रति तुम होश से भरना। एक दिन तुम प्रगाढ़ रूप से देख पाओगे कि शरीर सिर्फ खोल है। तुम किसी के जोड़ नहीं; तुम चैतन्य हो अखंड; सदा थे, सदा रहोगे।

दूसरी पर्त मन

जैसे ही शरीर का पहला प्याज का छिलका अलग किया कि दूसरा छिलका ऊपर आ जाएगा। वह दूसरा छिलका है तुम्हारा मन। वह बीमारी और गहरी है; क्योंकि शरीर काफी दूर है, मन काफी निकट है। शरीर अगर अणुओं का जोड़ है, तो मन विचारों का। शरीर अगर पदार्थ है, तो मन सूक्ष्म पदार्थ है। विचार भी सूक्ष्म ध्वनियां हैं। ध्वनि पदार्थ है। लेकिन विचार और भी करीब हैं। उनसे छुटकारा और भी मुश्किल है; क्योंकि तुम्हें सदा यह भ्रांति रही है कि ये विचार तुम्हारे हैं। और तुम अपने विचार को, सही हो चाहे गलत, सही करने की कोशिश करते हो, सिद्ध करने की कोशिश करते हो। क्योंकि तुम्हें डर लगता है कि अगर तुम्हारा विचार गलत हुआ तो तुम गलत हो गए।
शरीर के साथ तुम्हारा तादात्म्य इतना नहीं है, जितना विचार के साथ। अगर किसी आदमी से कहो कि तुम्हारा शरीर रुग्ण है, चिकित्सक के पास चले जाओ, तो वह बुरा नहीं मानेगा। लेकिन किसी से कहो कि तुम्हारा मन बीमार है, किसी मनोचिकित्सक के पास चले जाओ, तो वह फौरन नाराज हो जाएगा।
तो दूसरा कठिन प्रयोग, कठिन तपश्चर्या है: विचार के प्रति जागना कि कोई भी विचार, वह सुखद हो, दुखद हो; सच हो, झूठ हो; शास्त्र में हो, न हो; परंपरागत हो, गैर-परंपरागत हो; मैं नहीं हूं। विचार भी उधार हैं। सभी विचार उधार हैं। जैसे कूड़ा-कर्कट नदी के ऊपर तैर रहा हो, ऐसे विचार हैं। तुम तो नदी हो। तुम तो चैतन्य की धारा हो। तुम सिर्फ परमात्मा हो; न तुम हिंदू हो, न तुम जैन हो, न तुम बौद्ध हो, न मुसलमान हो। तुम्हारा शुद्ध होना शिवत्व है। धर्म तो सिर्फ एक है और वह है तुम्हारा शिवत्व। जिस दिन तुम भीतर उतरते जाओगे, वैसे-वैसे तुम पाओगे वह शून्य की आकृति तुम्हारे भीतर भी आनी शुरू हो गई; तुम शिव के करीब होते जा रहे हो। जिस दिन तुम सिर्फ प्रकाश के शून्य मात्र रह जाओगे- एक ज्योति, निराकार, जिसका कोई नाम नहीं, रूप नहीं, उस दिन तुम जो भी बोलोगे वही जप होगा।

आंख खुलनी चाहिए
आचरण को बदलने में जो लगा है, वह अंधेरे में टटोल रहा है। तुम इसलिए नहीं भटक रहे हो कि तुम्हारी दिशा गलत है; तुम इसलिए भटक रहे हो कि तुम्हारी आंख बंद है। आंख खुलनी चाहिए। और जब आंख कहता हूं तो मेरा मतलब है होश। बेहोशी टूटनी चाहिए। होश बढ़ना चाहिए। सोए-सोए मत चलो, जागो। जैसे ही तुम जागोगे, शिवतुल्य हो जाओगे। और वे जो भी बोलते हैं, वही जप है। और आत्मज्ञान ही उनका दान है। वे धन नहीं देते, क्योंकि धन कचरा है, देने का कोई अर्थ भी नहीं है। जिसको खुद ही छोड़ा, उसे देने का क्या प्रयोजन है! जिसे खुद व्यर्थ पाया, उसे दूसरे को बांटने में क्या सार है! वे तुम्हारे शरीर की सेवा नहीं करते। वे तुम्हें सिर्फ एक ही चीज दे सकते हैं जो देने योग्य है, वह आत्मज्ञान है। वही उनका दान है। शिवतुल्य जो हो गया है, उसका एक ही दान है, वह आत्मज्ञान है। जो उसने पाया है, वह बांटता है। आत्मज्ञान ही उसका दान है, जो अंतस शक्तियों का स्वामी है और ज्ञान का कारण है। क्योंकि आत्मज्ञान ही अंतस शक्तियों का तुम्हें स्वामी बना देगा। और आत्मज्ञान ही तुम्हारे जीवन को प्रकाश, ज्ञान, आलोक से भर देगा।

‘और वह स्वेच्छा से स्थिति और लय करता है।’
यह समझना कठिन है; क्योंकि अनुभव से ही समझ में आ सकता है। लेकिन फिर भी थोड़ा सा प्रत्यय बन जाए तो कभी सहयोगी होगा। शिवत्व को उपलब्ध व्यक्ति अपनी स्वेच्छा से स्थिति और लय करता है। या तो वह ठहर सकता है अस्तित्व में सेवा के लिए या खो सकता है शून्य में, यह उसकी स्वेच्छा है। और ध्यान रहे, उसी के पास स्वेच्छा है, तुम्हारे पास कोई स्वेच्छा नहीं। तुम्हारे पास स्वयं का होना नहीं, तो स्वेच्छा कैसे होगी! इसे ध्यान में रखना उचित है, क्योंकि इसको सुनते भी तुम्हारे भीतर ख्याल जगने लगेगा कि तुम्हें अगर निर्णय का मौका मिले तो तुम क्या करोगे। तत्क्षण जगने लगेगा। और वह जगना उपयोगी है; क्योंकि आखिरी क्षण वही बीज बड़ा हो जाएगा, वृक्ष बन जाएगा।
(सौजन्य : आेशोधारा नानक धाम, मुरथल, सोनीपत)


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