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लॉर्ड्स पर जीते क्रिकेट के गॉड

Posted On July - 21 - 2019

मनोज चतुर्वेदी
क्रिकेट के मक्का कहे जाने वाले लॉर्ड्स मैदान पर आईसीसी विश्व कप के फाइनल में सुपर ओवर की आखिरी गेंद फेंके जाने पर न्यूज़ीलैंड के इंगलैंड के बराबर 15 रन पर पहुंचने पर इंगलैंड के खिलाड़ियों ने मैदान में दौड़कर एक-दूसरे से गले मिलकर बधाइयां देना शुरू कर दी थीं, क्योंकि उनकी विश्व कप जीतने की सालों पुरानी मुराद पूरी हो गई थी। इंगलैंड का विश्व कप जीतने का सपना पूरा होने में भले ही 44 साल लग गए। लेकिन यह सपना पूरा होने पर सिर्फ लॉर्ड्स पर ही नहीं, सारे इंगलैंड में जश्न का माहौल बन गया। इंगलैंड 1975 में अपने घर में विश्व कप की शुरुआत करने के बाद से हर विश्व कप में इस चमचमाते कप पर अपना कब्जा जमाने का सपना देखता रहा। वह तीन बार 1979, 1987 और 1992 में कप जीतने के करीब भी पहुंचा, लेकिन कभी किस्मत ने साथ नहीं दिया, उसे हर बार निराश ही होना पड़ा। अब जब सपना पूरा हुआ है तो जश्न का माहौल बनना स्वाभाविक था।
कभी नहीं दिखा ऐसा रोमांच
इंगलैंड और न्यूज़ीलैंड के बीच खेले गये फाइनल जैसा रोमांच तो पिछले विश्व कपों के फाइनल में कभी नहीं देखा गया था। दर्शकों से खचाखच भरा लॉर्ड्स मैदान ही नहीं, बल्कि टेलीविजन पर भी इस मैच का लुत्फ उठाने वाले करोड़ों क्रिकेट-प्रेमी, मैच में पल-पल बदलते माहौल की वजह से अपनी धड़कनों को काबू में रखने में मुश्किल महसूस कर रहे थे। इस मैच में दोनों टीमों के खिलाड़ियों और उनके समर्थकों के चेहरों की रंगत बार-बार बदल रही थी। वजह पहले निर्धारित 50 ओवरों के खेल में दोनों टीमों के 241 रन बनाने से इसका टाई होना और फिर सुपर ओवर में भी दोनों टीमों के 15 रन बनाने से टाई होना था। लेकिन इंगलैंड के खिलाड़ियों को पता था कि सुपर ओवर टाई होने पर मैच में जमाई बाउंड्रियों के आधार पर फैसला होगा, जिसमें वह आगे हैं। इंगलैंड के खिलाड़ियों ने मैच में 26 चौके-छक्के लगाए और न्यूज़ीलैंड ने 17 चौके-छक्के लगाए थे। दिलचस्प बात यह है कि यदि दोनों टीमें बाउंड्री लगाने के मामले में भी बराबर हो जातीं तो सुपर ओवर की हर गेंद पर बने रनों के हिसाब से फैसला होता। इसका मतलब है कि ओवर की कितनी गेंदों पर किस टीम ने ज्यादा रन बनाए, इसके आधार पर फैसला होता।
क्या कीवी के साथ अन्याय हो गया
क्रिकेट के नियम बनाने का काम एमसीसी करती है और इसके सदस्य पूर्व अंपायर साइमन टॉफेल का कहना है कि न्यूज़ीलैंड की टीम अंपायर के एक गलत फैसले का शिकार बन गई। अगर ऐसा नहीं हुआ होता तो शायद सुपर ओवर की नौबत ही नहीं आती। असल में हुआ यह कि इंगलैंड जब 242 रन के लक्ष्य को पाने में जुटा था, तब आखिरी ओवर की चौथी गेंद पर बेन स्टोक्स ने ऑफसाइड में शॉट खेला और वह दो रन लेने के लिए दौड़े, इस बीच गुप्टिल की थ्रो स्टोक्स के बल्ले से लगकर चौके के लिए निकल गई। इस पर अंपायर ने छह रन दे दिए। लेकिन गुप्टिल के थ्रो करते समय दोनों बल्लेबाजों ने दूसरे रन के लिए एक-दूसरे को क्रॉस नहीं किया था। इसलिए पांच रन मिलने चाहिए थे। अगर ऐसा होता तो इंगलैंड को जीत के लिए आखिरी दो गेंदों में तीन रन बनाने होते और स्ट्राइक पर आदिल रशीद होते। इस स्थिति में बहुत संभव था कि मैच सुपर ओवर में खिंचता ही नहीं।
इंगलैंड की जीत के हीरो रहे बेन स्टोक्स
बेन स्टोक्स इंगलैंड में हीरो की तरह उभरकर आए हैं। उन्होंने फाइनल में नाबाद 84 रन की पारी खेलकर और जोस बटलर के साथ पांचवें विकेट की साझेदारी में 113 रन जोड़कर इंगलैंड को चैंपियन बनाने में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने सुपर ओवर में भी इंगलैंड के लिए 15 रनों में से आठ रन बनाए। बेन स्टोक्स ने इंगलैंड के इस खिताबी अभियान में 11 मैचों में पांच अर्धशतकों से 465 रन बनाए और सात विकेट लिये। सही मायनों में स्टोक्स ने मध्यक्रम में बल्लेबाजी करके और नियमित तौर पर सात-आठ ओवर मैच में फेंककर टीम में संतुलन बनाने में अहम भूमिका निभाई। ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ 89 रन की पारी खेलकर उन्होंने लगभग जीत दिला ही दी थी। लेकिन बेन स्टोक्स को 2016 के टी-20 विश्व कप का कोलकाता में खेला गया फाइनल याद था। आखिरी ओवर में ब्रेथवेट ने उनके ऊपर चार छक्के लगाकर वेस्टइंडीज को चैंपियन बना दिया था। इसलिए इस बार वह सतर्क थे और टीम को चैंपियन बनाकर ही दम लिया।
बेन के पिता को नहीं भाया इंगलैंड का जीतना
बेन स्टोक्स के पिता गेरार्ड स्टोक्स न्यूज़ीलैंड में रहते हैं। इसलिए वह विश्व कप अभियान के दौरान अपनी टीम न्यूज़ीलैंड को समर्थन दे रहे थे। फाइनल में जब बेटे बेन की टीम इंगलैंड और न्यूज़ीलैंड का मुकाबला हुआ तो उनके लिए मुश्किल समय था। लेकिन वह बेटे बेन स्टोक्स के प्रदर्शन को लेकर तो बेहद खुश हैं लेकिन उन्हें इंगलैंड का विश्व कप जीतना नहीं भाया है। उन्होंने कहा कि न्यूज़ीलैंड यदि चैंपियन बनती तो मजा आ जाता।
विदेशी चौकड़ी ने बनाया चैंपियन
इंगलैंड को विश्व कप विजेता बनाने में कप्तान इयोन मॉर्गन, बेन स्टोक्स, जोफ्रा आर्चर और जेसन रॉय की चौकड़ी की अहम भूमिका रही है। दिलचस्प यह है कि इनमें से कोई भी मूलत: इंगलैंड का नहीं है। सभी बाद में इंगलैंड आकर बसे हैं। कप्तान मॉर्गन की बात करें तो वह आयरलैंड के रहने वाले हैं। वह आयरलैंड के लिए वनडे मैच खेल चुके हैं। इसके तीन साल बाद उन्होंने इंगलैंड के लिए खेलना शुरू किया। वर्ष 2015 में इंगलैंड के लीग चरण में बाहर होने पर मॉर्गन को टीम बनाने की जिम्मेदारी दी गई और वह टीम को इस मुकाम तक ले आए। बेन स्टोक्स न्यूज़ीलैंड के क्राइस्टचर्च में पैदा हुए और 12 साल की उम्र में इंगलैंड आए। उनके माता-पिता आज भी न्यूज़ीलैंड में ही रहते हैं। जेसन रॉय डरबन में पैदा हुए हैं। लेकिन जब वह 10 साल के थे, तब उनका परिवार इंगलैंड आ गया था। वहीं जोफ्रा आर्चर तो वेस्टइंडीज के लिए अंडर-19 क्रिकेट खेलने के बाद 2016 में इंगलैंड आए हैं। लेकिन इस चौकड़ी ने अपने नये देश इंगलैंड के लिए जोरदार प्रदर्शन किया और टीम को चैंपियन बनाने में अहम भूमिका निभाई।
न्यूज़ीलैंड पर भाग्य नहीं था मेहरबान
ब्लैक कैप्स के नाम से मशहूर न्यूज़ीलैंड से शायद भाग्य रूठा हुआ था। यही वजह है कि जब उन्होंने मैच पर नियंत्रण बना लिया, उस समय ट्रेंट बोल्ट बेन स्टोक्स का कैच पकड़कर बाउंड्री लाइन से पैर छुआ बैठे और महत्वपूर्ण विकेट मिलने के बजाय छक्का चला गया। इसी तरह आखिरी समय में डायरेक्ट थ्रो पर रन आउट करने के प्रयास में दो के बजाय छह रन जाने से इंगलैंड को लक्ष्य तक पहुंचने में मदद मिली। लेकिन उनके प्रदर्शन को देखकर एक बात तो साफ है कि विजेता बनने के लिए उनके हाथ में जो भी संभव था, वह उन्होंने किया। लेकिन भाग्य साथ में नहीं था, इसलिए उन्हें इंगलैंड का उपविजेता बनना पड़ा।
झटकों से संभली दोनों टीमें
टीमों को कई बार झटकों की वजह से संभलने का मौका मिलता है। इंगलैंड और न्यूज़ीलैंड दोनों ही ऐसी टीमें हैं, जिन्हें लगे झटकों की वजह से एक समय तो सेमीफाइनल में स्थान मिलने के लाले पड़ते नज़र आ रहे थे। लेकिन इन झटकों से उबरने में दोनों टीमों को मजबूत बनाया और इसी ने उन्हें फाइनल तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई। भारत जैसी टीमें बिना करारा झटका खाए सेमीफाइनल में पहुंचीं और इस वजह से ही इस दौर में लगे झटके से संभलने में कामयाब नहीं हो सकी हैं। अब आप सोचिए, यदि भारत ने लीग चरण में इंगलैंड के खिलाफ जीत की स्थिति में पहुंचने के बाद हारी नहीं होती तो इंगलैंड के बजाय पाकिस्तान सेमीफाइनल खेल रहा होता। लेकिन आखिर में वही दोनों टीमें फाइनल में पहुंचीं, जो पूर्णत: संतुलित थीं। इंगलैंड और न्यूज़ीलैंड का पेस अटैक तो जानदार था ही, साथ ही दोनों के स्पिनर आदिल रशीद और सेंटनर ने भी अपनी गेंदबाजी से प्रभावित किया।
खुद की गलतियों से हारी टीम इंडिया
टीम इंडिया ने लीग चरण में जिस तरह का प्रदर्शन किया था, उससे सभी को उसके सेमीफाइनल में जीतने की उम्मीद थी। भारतीय गेंदबाजों ने न्यूज़ीलैंड की पारी जब 239 रन पर समेंट दी, तो टीम इंडिया के प्रशंसकों को फाइनल खेलने का पक्का भरोसा हो गया। लेकिन न्यूज़ीलैंड के गेंदबाजों ने मात्र 19 गेंदों में मैच का भाग्य तय कर दिया। उन्होंने इन 19 गेंदों में रोहित शर्मा, विराट कोहली और के.एल. राहुल को वापस भेजकर मैच को अपनी तरफ मोड़ लिया। सिर्फ एक आदमी था, जिसकी योजनाओं का यह नतीजा था और वह थे न्यूज़ीलैंड के कप्तान केन विलियमसन। इसका ही नतीजा था कि भारत का लगातार दूसरे विश्व कप में सफर सेमीफाइनल में ही थम गया।

गलत साबित हुए जो फैसले
न्यूज़ीलैंड के पेस गेंदबाजों- मैट हेनरी और ट्रेंट बोल्ट ने भारत की हालत खस्ता करने में जितनी भूमिका निभाई, उससे ज्यादा भूमिका हमारे खुद के गलत फैसलों की रही। टीम का 24 रन तक स्कोर पहुंचते चार विकेट निकल जाने के बाद ऋषभ पंत और हार्दिक पांड्या ने पूरे भरोसे के साथ खेलकर टीम की वापसी की उम्मीदें बनाई। लेकिन दोनों गलत समय पर गलत शॉट खेलकर विकेट गंवा बैठे और टीम फिर से मुश्किल में फंस गई। इस वजह से ही सुनील गावस्कर, सचिन तेंदुलकर और सौरव गांगुली सहित तमाम पूर्व क्रिकेटरों ने महेंद्र सिंह धोनी को सातवें नंबर पर भेजने के फैसले को हार की वजह बताया। इन क्रिकेटरों का मानना है कि धोनी यदि चौथे या पांचवें नंबर पर बल्लेबाजी करते को आते तो पंत और हार्दिक जैसे युवाओं को अपने निर्देशों के हिसाब से खिला सकते थे। इसके बाद भी महेंद्र सिंह धोनी और रविंद्र जडेजा शानदार प्रदर्शन से टीम को जीत के मुहाने तक ले जाने में सफल रहे। दिनेश कार्तिक का चयन हमेशा ही समझ से परे रहा। उन्हें जब भी मौका दिया गया, वह उम्मीदों पर खरे नहीं उतर सके। केदार जाधव भी बहुत प्रभावित नहीं कर सके। दिनेश कार्तिक से बेहतर हर हालत में अंबाती रायडू साबित होते। लेकिन वह अपने साथ हुए अन्याय की वजह से संन्यास लेने को मजबूर हो गए। मध्यक्रम में चुने गए विजय शंकर भी कभी प्रभावित नहीं कर सके। कप्तान ने उन पर गेंदबाजी के लिए भरोसा किया नहीं और बल्लेबाजी में उनका बल्ला चल नहीं सका। ऐसा लगता है कि टीम प्रबंधन ने स्पिन जोड़ी के चयन में भी गलती की। उन्होंने शुरू से कुलदीप यादव और यजुवेंद्र चहल पर भरोसा किया। कुलदीप यादव भी उम्मीदों पर खरे नहीं उतर सके। वहीं यजुवेंद्र चहल ने 12 विकेट जरूर लिए लेकिन वह प्रभाव छोड़ने में असफल रहे। कुलदीप के असफल रहने पर आखिरी दो मैचों में रविंद्र जडेजा को मौका दिया गया और उन्होंने साबित कर दिया कि वह शुरुआत से ही टीम में खिलाए जाने के काबिल थे। महेंद्र सिंह धोनी इस विश्व कप के दौरान कई बार चर्चाओं में रहे। कभी अच्छे प्रदर्शन से तो कभी कमजोर प्रदर्शन से। लेकिन उन्होंने न्यूज़ीलैंड के खिलाफ दिमाग का अच्छा इस्तेमाल करके अच्छी पारी खेली। यदि वह टीम को जिता देते तो उनकी आखिरी विश्व कप की यादें यादगार बन जातीं। धोनी की यह सोच स्ट्राइक को अपने पास रखें, इससे उन्हें लौटना पड़ा। अन्यथा वह इसे किए बिना भी टीम को जीत तक पहुंचा सकते थे। भारतीय बल्लेबाजों ने टीम पर संकट के समय यदि स्ट्राइक बदलकर डॉट गेंदें कम खेलीं होतीं तो जडेजा और धोनी पर जोखिम भरे रन लेने का दबाव नहीं बनता और वह टीम को सहज ढंग से जीत तक पहुंचा सकते थे।
यंग-ब्रिगेड के क्या कहने
इस विश्व कप में कुछ युवाओं ने अपने प्रदर्शन से बेहद प्रभावित किया और यह युवा चार साल बाद एक बार फिर विश्व कप में अपने देशों का झंडा लहराते नज़र आ सकते हैं। इसमें पहला नाम तो जोफ्रा आर्चर का आता है। उन्होंने इंगलैंड के लिए सुपर ओवर फेंका था। जोफ्रा ने इंगलैंड के गेंदबाजों में सर्वाधिक 20 विकेट लिए। दिलचस्प बात यह है कि वह इंगलैंड की विश्व कप की संभावित टीम में शामिल नहीं थे। लेकिन आईपीएल में शानदार प्रदर्शन ने टीम में उनका मार्ग प्रशस्त किया। जसप्रीत बुमराह को भी इस श्रेणी में रखा जा सकता है। उन्होंने अपनी गेंदबाज़ी के आगे किसी को भी टिकने नहीं दिया। भारतीय गेंदबाजों में उन्होंने सबसे ज्यादा 18 विकेट लिए। पाकिस्तान के 19 वर्षीय तेज़ गेंदबाज़ शाहीन अफरीदी अपना जलवा दिखाने में कामयाब रहे। उन्होंने 16 विकेट लेकर दिखाया कि आने वाला कल उनका ही है।


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