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यूरोपीय गगन के तले

Posted On July - 6 - 2019

अलका कौशिक
यूरोप के आसमान में आज़ाद पंछी की मानिंद घूमती फिरी थी मैं अपने पहले यूरोपीय सफर में। स्‍पेन में साल के ठीक उस मोड़ पर पहुंचना जब सर्दियां लौटने की तैयारी कर रही होती हैं और सुरंग में कहीं दूर झलकती रोशनी की हल्की लकीर की तरह गर्मियों के आने की उम्मीद बंध चुकी होती है, कई मायनों में खास है। अप्रैल के दूसरे हफ्ते में जिस रात मादरीद के अदोल्फो सुआरेज मादरीद बाराख़स हवाईअड्डे पर मैं और मां उतरी थीं, हल्की बारिश से पूरी सड़क हमें भीगी मिली थी। उस रात ठंड ज्यादा उतर आयी थी। तापमान अचानक गिर गया था और किटकिटाते हुए कार की डिक्की में अपने सूटकेस ठूंसते हाथों में जमा हुई सिहरन इशारा थी कि मेरे बदन पर पड़ी जैकेट शायद यूरोप के इस हिस्से तक पहुंचने वाली उस बर्फीली हवा का मुकाबला न कर पाए जो आर्कटिक का बदन छूकर चली आयी है। यूरोप की वो पहली ही रात रोमांटिक लगी थी। आसमान ढका था और हमारी कार शहर की सड़कों पर उड़ने लगी थी।
रात के करीब बारह बजे थे मगर सड़कों पर बत्तियों के जैसे जाल फैले थे, रोशनियों से नहायी उस रात का आसमान अपने तन पर पड़े कपड़े उघाड़ चुका था और झमाझम बरसने लगा था। विंडस्क्रीन के उस पार आसमान बरस रहा था और इस पार हम थे कि यूरोप के बदन पर फर्राटा दौड़ने के अहसास से भीगे जा रहे थे। वो रात आगे भी भिगोने की तैयारियों के साथ आयी थी, उस रोज़ सिर्फ पानी में और आगे जाने कैसी-कैसी बारिशों में… स्पेन का सफर
स्‍पेन की राजधानी मादरीद में अड्डा जमाया था। यहां से कभी दक्षिण तो कभी पूरब और कभी उत्‍तर की तरफ जाने वाली तेज रफ्तार ट्रेन या बसों में सवार हो लेते और तोलेदो, कॉर्दोबा, सेविया, सेगोविया जैसे ऐतिहासिक शहरों को नाप आते। कला की दीवानगी मुझे मादरीद के संग्रहालयों में पहुंचा देती जहां कभी पिकासो की विश्‍वप्रसिद्ध पेंटिंग ग्‍वेर्निका से रूबरू होती तो कभी गोया, वेलासखेज़, मीरो, डाली, रैम्‍ब्रां के कैनवासों को तकती। एक रोज़ डाली से मिलने उनकी कर्मभूमि फिगारेस जाने के लिए मादरीद से कैब में सवार हुए और छह सौ किलोमीटर का फासला बमुश्किल छह घंटे में नाप गए। फर्राटा भरते हाईवे हैं तो उन सड़कों पर दौड़ने के सैकड़ों नियम-कायदे भी हैं। हां, जगह-जगह सड़कों के किनारे शानदार रेस्‍तरां, कैफे और अन्‍य सुविधाएं भी हैं। भूमध्‍यसागरीय देश होने के नाते एक से एक खूबसूरत समुद्रतट भी स्‍पेन के हिस्‍से आए हैं, इनमें जिंदगी सौंदर्य गान करती दिखती है। दुनिया-जहां के पर्यटक हर साल स्‍पेन को अपनी मंजिल चुनते हैं और नतीजा यह है कि आज फ्रांस के बाद स्‍पेन यूरोप में दूसरा सबसे लोकप्रिय ठिकाना बन चुका है। और हां, विश्‍वप्रसिद्ध इबिज़ा आइलैंड भी स्‍पेन में आता है जहां चौबीसों घंटे पार्टियां चलती हैं। उत्तर में बास्‍क कंट्री का खूबसूरत स्‍वायत्‍त प्रदेश हैं जिसमें बिलबाओ, जुमाया, सान सेबेस्शियन जैसे सांस्‍कृतिक रूप से समृद्ध शहर हैं तोगात्‍सेलुगाचे जैसे ठिकाने भी हैं जहां गेम्‍स ऑफ थ्रोन की शूटिंग हुई थी। अतीत, कला, डिजाइन, खान-पान का लुत्‍फ लेते हुए और संस्‍कृति के पन्‍ने पलटते हुए स्‍पेन में दिन बीत रहे थे।
वास्‍को-डी-गामा के देश में इससे पहले कि स्‍पेन में लंबा टिकने के आसार बनते, यूरोप के नक्‍शे पर दर्ज कितनी ही इबारतों ने हमें ललचाना शुरू कर दिया था। हवाई यात्राएं इतनी आसान हैं और सस्‍ती भी कि अगर आपके पास छुटि्टयां बिताने के दिन ज्‍यादा हैं तो दूसरी मंजिल की टिकट कटा लेने में कोई नुकसान नहीं। हम यूरोप में गर्मियां शुरू होने से पहले पहुंचे थे, यानी अभी वहां सैलानियों की भीड़ लगने में वक्‍त था, लिहाज़ा स्‍टे और टिकट जेब की पहुंच में थे। हमने मादरीद से छह सौ किलोमीटर के फासले पर खड़े यूरोप के एक और दिलफरेब शहर लिस्‍बोआ (लिस्‍बन) की टिकट कटायी और उड़ चले। आसमान के रास्‍ते यह फासला महज़ एक घंटे का था और अब हम उस देश में, जिसने इतिहास में कितने ही समुद्री बेड़ों और साहसिक नाविकों के दम पर अपनी पहचान बनायी थी। एक समय में जबर्दस्‍त समुद्री ताकत था पुर्तुगाल और फिर यूरोप से हिंदुस्‍तान तक का समुद्री मार्ग ढूंढ़ निकालने वाले वास्‍को-डी-गामा भी तो इसी सरज़मीं से आया था।
लिस्‍बोआ के आकर्षणों से छूटे तो पोर्तो जा अटके। वहीं पोर्तो, जिसकी पोर्ट वाइन ज़माने भर में मशहूर है। फुटबॉल और वाइन की दीवानगी देखनी हो तो पोर्तो चले आना बनता है। यहां से पुर्तुगाल के पश्चिमी तट पर बसे अवेयरो के खूबसूरत शहर जाने के लिए ट्रेन पकड़ी और दिन भर उसकी रंग-बिरंगी टाइलों, दीवारों, ग्राफिटी से सजी बस्तियों में घूमते-फिरे। समुद्र की एक चौड़ी धार इस शहर में घुस आयी है। इस लैगून को रियो डि अवेयरो के नाम से जाना जाता है, इसी पर दिनभर सैलानियों को घुमाने के लिए कितनी ही नौकाएं यहां से वहां हो लेती हैं, तट पर खड़ी खूबसूरत इमारतों को देखकर लगता है जैसे कला की मुक्तांगन प्रदर्शनी लगी हो। हमारा आखिरी पड़ाव यूनिवर्सिटी टाउन कोइंब्रा बना जो विश्‍व विरासत घोषित हो चुका है। इस शांत शहर में दो रोज़ गुजारना तो बनता है, विश्‍वविद्यालय के कितने ही विभाग पब्लिक के लिए खुले हैं, यानी भौतिकी की प्रयोगशाला और संग्रहालय से लेकर संगीत विभाग और यहां तक कि उस इमारत को भी देखने का मौका मिलता है जहां दीक्षांत समारोह आयोजित किया जाता है। पर्यटन के रटे-रटाए मुहावरों से कुछ अलग हैं ये मंजिलें, मगर वाकई दिलचस्‍प हैं।
प्राग के आगोश में दो दिन
अब हम अपनी तीसरी मंजिल यानी प्राग के लिए तैयार थे। लिस्‍बन से करीब 2200 किलोमीटर का फासला फक्‍त 3 घंटे 20 मिनट में नापकर हम पहुंच गए थे वाल्‍तावा नदी के किनारे बसे प्राग शहर में। शहर क्‍या था, किसी परीकथा से कम नहीं था। पुराने शहर मालास्‍त्राना की गलियों में भटकते कदमों को सहारा देने के लिए कोई इतालवी रेस्‍तरां दिख जाता तो वहीं भूख-प्‍यास बुझायी जाती। फिर काफ्का ट्रेल टटोली और आखिर में पहुंच गए काफ्का के संग्रहालय। यूरोप के सबसे पुराने महलों में से एक है प्राग कासल तो भला उसे कैसे छोड़ जाते।
मेरा ठौर प्राग की सबसे प्रसिद्ध इमारत डांसिंग हाउस की पिछली गली में था, सो देर रात हम वलतावा के छोर पर खड़ी इस दिलचस्‍प इमारत के इर्द-गिर्द मंडराते रहे थे। वलतावा के झिलमिलाते बदन पर शहर की इमारतों की परछाइयां देखते हुए अगली सुबह चार्ल्स पुल पर चढ़ाई करने का वादा भी उस रात से ले आए थे। और मन ही मन अपनी अक्‍ल को दाद दी कि शहर में ऐन मौके की जगह पर ठिकाना चुनने का एक बड़ा फायदा यह हुआ था कि सारे आकर्षण आसपास ही थे, ज्‍यादातर तो पैदल दूरी पर। कुल जमा 48 घंटे की मोहलत किस्‍मत ने जिस शहर के नाम की हो, उसकी सैर पर निकलने से पहले ऐसी समझदारी बड़े काम की चीज़ होती है।
अब तक घर से निकले महीना भर हो चला था। पासपोर्ट पर चस्‍पां शेंगेन वीज़ा ने हमें तीन देशों से मिलवा दिया था। एक देश से दूसरी तक पहुंचना उतना ही आसान था जितना अपने देश में एक राज्‍य से दूसरे तक आना-जाना। हवाई अड्डों पर बस सुरक्षा जांच होती, पासपोर्ट पर लगा शेंगेन का ठप्‍पा देखा जाता और हमारे टिकट के रूप में बंद ख्‍वाबों को उड़ जाने की इजाज़त आसानी से मिल जाती।
कब जाना चाहिए यूरोप की सैर पर?
इस सवाल का कोई एक जवाब नहीं हो सकता। यह निर्भर करता है आपकी प्राथमिकताओं और इस बात पर कि आप कैसा अनुभव लेना चाहते हैं। यूरोप की कम-से-कम एक दर्जन मंजिलों को बीते दो साल में खंगाल चुकने के बाद मैं आपको कहूंगी ‘शोल्डर सीज़न’ चुनें। मोटे तौर पर यूरोप में तीन सीज़न होते हैं—
पीक सीज़न — जून से अगस्त, जब सारी दुनिया घूमने निकलती है
शोल्डर सीज़न — अप्रैल-मई और फिर सितंबर-अक्तूबर, जब पर्यटन की आहट कम होती है
ऑफ सीज़न — नवंबर-मार्च, सर्दियों के इन महीनों में यूरोप भीषण ठंड से गुजरता है, पर्यटन मंदा होता है (क्रिसमस और नए साल वाला पखवाड़ा छोड़कर)
आप किसी लोकल फेस्टिवल, आयोजन, स्‍पोर्ट्स टूर्नामेंट या ऐसे ही किसी और कार्यक्रम को ध्‍यान में रखकर भी ट्रिप की प्‍लानिंग कर सकते हैं।
वीज़ा प्लानिंग कब और कैसे
ट्रिप पर जाने से कम से कम दो-तीन महीने पहले तैयारियां शुरू करें। आपके पास पासपोर्ट होना चाहिए और उस पर वीज़ा लेने के लिए कवायद शुरू कर दें। यूरोप के लिए शेंगेन वीज़ा लगाना होता है और यह यूरोपीय यूनियन के अंतर्गत आने वाले सभी देशों में आने-जाने की सुविधा दिलाता है। अब सवाल यह उठता है कि किस देश की एम्बेसी में शेंगेन वीज़ा के लिए आवेदन किया जाए। इसका सीधा-सा जवाब है कि आप सबसे पहले जिस देश जाना चाहते हैं, या जिस देश में सबसे ज्‍यादा दिन गुज़ारने का इरादा है उसी की एम्बेसी को आवेदन करना चाहिए। मान लीजिए, आप 15 दिनों के लिए इटली, फ्रांस और चेकोस्‍लोवाकिया क्रमश: 3, 5 और 7 दिनों के लिए जाना चाहते हैं। अगर आप सबसे पहले इटली पहुंच रहे हैं तो इटली दूतावास से अन्‍यथा सबसे ज्‍यादा स्‍टे वाले देश यानी चेकोस्‍लोवाकिया से वीज़ा लें। हर देश के अपने नियम-कायदे हैं वीज़ा देने के, लिहाज़ा उन्‍हें जानें। वीज़ा संबंधी हर जानकारी ऑनलाइन उपलब्‍ध है।
कुछ देशों में भारतीयों के लिए वीज़ा ऑन एराइवल की सुविधा है जबकि सर्बिया जैसे देश भी हैं, जिनके दरवाज़े बिना वीज़ा के भारतीयों के लिए खुले हैं।
बजट कितना चाहिए?
इसका भी कोई निश्चित जवाब नहीं हो सकता। आपके घूमने की मंजिलें कितनी हैं, स्‍टाइल कैसा है–आप खुद को बजट ट्रैवलर मानकर घूमते हैं या मीडियम बजट अथवा लग्‍ज़री श्रेणी के हैं, इस पर आपका खर्चा निर्भर करता है। दूसरे, किस तरह के अनुभव लेना चाहते हैं, मसलन, म्‍यूजि़यम, शहरों के विशेष आकर्षणों, आर्ट गैलरी, फेस्टिवल, मैचों की टिकटों के लिए अलग से प्रावधान करें। इसी तरह, पब्लिक ट्रांसपोर्ट से सैर-सपाटा होगा या अपनी निजी कैब लेंगे, यूरोपीय शहरों/देशों में आने-जाने के लिए बस, रेल या हवाई सेवा में से किसे चुनेंगे, इन तमाम पहलुओं को ध्‍यान में रखकर ही बजट बन सकता है। इसके अलावा, आप किस देश की सैर पर जाना चाहते हैं, यह भी मायने रखता है। मसलन, फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन, स्विट्ज़रलैंड जैसे देशों की सैर जेब पर भारी पड़ेगी जबकि स्‍पेन, पुर्तगाल, चेकोस्‍लोवाकिया, रोमानिया, हंगरी जैसे देशों में सैर-सपाटा अपेक्षाकृत सस्‍ता पड़ता है।
यूरोप की ज्यादातर मंजिलों पर यानी होटलों, रेस्तराओं, कैफे, बार, टूरिस्ट आकर्षणों पर मुफ्त वाई-फाई की सुविधा तो है ही, देसी मोबाइल कंपनियां भी आसान इंटरनेशनल पैकेज उपलब्ध कराने लगी हैं। देश छोड़ने से पहले ही अपना इंटरनेशनल प्लान एक्टिवेट करा लें और विदेश यात्रा के दौरान भी अपने फोन पर डेटा सर्विस के साथ-साथ इनकमिंग-आउटगोइंग सुविधा का लाभ उठाएं।
स्‍टे कैसा चुनते हैं, खाना-पीना कहां करते हैं, शॉपिंग, टिप जैसी बातें भी आपके बजट को प्रभावित करती हैं। सामान्‍य तौर पर खर्च करेंगे तो औसतन 8 से 10 हज़ार रुपये प्रतिदिन/प्रति व्‍यक्ति के हिसाब से बजट रखें।


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