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मायने रखता है मन का सरिता हो जाना

Posted On July - 7 - 2019

कृष्णलता यादव
निरन्तर प्रवाहशीलता का नाम है– सरिता। किसी के लिए मात्र पानी का भंडार तो अन्य के लिए जीवन का आधार, ममत्व, वात्सल्य और त्याग की जीवनदायी त्रिवेणी-सी। इस भाव के वशीभूत सरिता जल में स्नान, उसके तट पर दान, पूजन-अर्चन, अर्पण-तर्पण व आचमन में मानव मन को पुण्यार्जन का अहसास होता है। अपनी बनती-बिगड़ती लहरों के साथ मार्ग के कण-कण को सींचती, जन-जन की आस का सम्बल बनती सरिता किसे नहीं रिझाएगी? ठीक ऐसा ही है –मन का सरिता हो जाना।
एक बार एक व्यक्ति से किसी ने पूछा, ‘बंधुवर! तुम्हारे मन में ऐसी क्या घटना घटी कि वह दरिया-सा हो गया?’ उत्तर मिला, ‘बहुत सीधी बात है– मैंने प्रलोभन ठुकराये, मन को मांजा, सत्य की सेवा की, दर्द की बरसात झेली। इस क्रम में बूंद-बूंद का मिलन हुआ और…’। वास्तव में, मन का सरिता हो जाना एक अनोखी घटना होती है। छोटी-सी मटकी में अथाह पानी का अहसास होता है। यूं भी कह दिया जाता है– बरकत की बरखा हुई, कर्म की फसल उगी और आनंद का सुफल पाया– अब उसे पावन प्रसाद की तरह बांटो, चाहे छको।
मन सरिता हो जाने के मायने हैं– राग-द्वेष, कलह-क्लेश की शिलाओं का विखंडित होना, मन के कोनों के कल्मष का धुलना, निंदा-स्तुति के झाड़-झंखाड़ों का उखड़ना और रोम-रोम से निर्मल आशीर्वाद का झरना फूट पड़ना, सहानुभूति-सरोवरों का भरना व कृतज्ञता-भाव का सांस बनकर जीवन देना। मन:स्थिति ऐसी कि देना रंक को भी, लेना ब्रह्मा से भी नहीं। ऐसे में मन कभी-कभी देवत्व से भी आगे बढ़ जाता है। इस विषय में एक बोध कथा याद आ रही है –
एक बार एक गरीब यात्री यात्रा पर निकला। मरुस्थल पार करते हुए उसे दूर एक झरना दिखाई दिया। वह झरने के पास पहुंचा। झरने का पानी स्वच्छ व शीतल था। उसने मश्क में पानी भरा और अपने राजा को पिलाने चल पड़ा। काफी समय बाद वह राजा के पास पहुंचा और राजा को वह अनमोल उपहार दिया। राजा ने खुश होकर यात्री को पुरस्कार देकर विदा किया। राजा के दरबारी भी वह पानी पीना चाहते थे, परन्तु राजा ने यह कहकर मना कर दिया कि कई दिन तक चमड़े की मश्क में रहने के कारण पानी का स्वाद कसैला हो गया है। यह सुनकर दरबारी बोले कि तब तो उस आदमी को सजा मिलनी चाहिए थी। राजा ने कहा, ‘ऐसा न कहो। वास्तव में हमने यात्री की भावना की कद्र की है। पानी चाहे कसैला था, किन्तु उसको लाने वाले का मन नदिया-सी तरलता से लबालब था इसलिए हमने… ।’ यह सुनकर दरबारी निरुत्तर हो गये।
मानस में सरिता-सी तरलता आने से आचार-व्यवहार में होने वाले वरदानी प्रभाव को जितना बखानें, उतना कम। ऐसे मनुष्य की विचारधारा के पृष्ठों पर सर्वे भवन्तु सुखिन: की उजली इबारत लिखी जाती है। वह जलजलों में भी ज़िंदा रहने की कला जान लेता है और काले-पीले अक्षरों में रोशनी की किरण देख लिया करता है। हर्षित मन से थिरकते उसके होंठ सत्पात्रों की गुणगाथा गाते हैं। दान के साथ स्वयं को भी दान करने की प्रवृत्ति जन्म लेती है। भाव-जल का सात्विक नाद ईश्वरीय नाद बनकर जन मन में गूंजा करता है कि– जो आ सकता है आये/ अगर-मगर से मुक्ति पाये। तब सत्य की निर्ममता को सुन्दरता के सांचे में ढालकर मंगलमय बनाया जाता है। उदाहरणस्वरूप– एक बार रोम के पोप ने इटली के शिल्पकार माइकल एंजलो को रोम बुलाया और वैटिकन के सिष्ठाइन चैपल की छत को भीतर से चित्रित करने का आदेश दिया। कलाकार ने लाख समझाया कि वह मूर्तिकार है, चित्रकार नहीं। मगर पोप ने एक नहीं सुनी। अंतत: उसने चुनौती स्वीकार की और बाइबल के अनुसार ईश्वर द्वारा निर्मित सूर्य, चन्द्र, जल, धरती तथा आदम-हौवा की सृष्टि-कथा को छत में अंकित करने का काम शुरू कर दिया। बल्लियों से बने मचान पर औंधे लेटकर चित्र बनाने के कारण उसकी गर्दन झुक गई, कमर टेढ़ी हो गई। यहां तक कि तीसवें दिन उसने अपने जूते उतारे तो उनके साथ पैर की चमड़ी भी उतर आई। दर्शकों ने जब चित्र देखे तो वे भावविभोर हो गए। उद्घाटन के समय सभी नागरिक पधारे लेकिन माइकल नहीं गए। उनके मानसतल पर निर्मल भाव की नदी बहने लगी थी। वे छैनी-हथौड़ा लेकर मूर्ति बनाने के काम में लगे थे।


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