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मर्म की बात

Posted On July - 21 - 2019

कृष्णलता यादव
बात तब की है जब मैं आठ-दस साल की थी। हुआ यूं कि गांव के एक व्यक्ति ने हमारे यहां से पानस (ऊंट का पसंदीदा चारा) खरीदा और पिताजी को रुपये देकर यह कहकर चल दिया, ‘मैं चलता हूं, खेत पर जल्दी पहुंचना है, हिसाब बाद में होता रहेगा।’ पिताजी ने गुणा-तकसीम करने के बाद मुझ से कहा, ‘हमारी ओर रामदयाल काका का एक रुपया निकलता है, यह उनके घर दे आओ।’ इतना सुनना था कि मां ने रोषपूर्ण लहजे में कहा, ‘आप भी चाले (कमाल) करते हो। झुलसाने वाली धूप और गर्मी में बच्ची गांव के परले पार जाएगी? रकम इतनी बड़ी नहीं, जो उसके बोझ तले दबे जा रहे हो। जब कभी उधर जाना होगा, रुपया दे दिया जाएगा।’
पिताजी ने तर्क दिया, ‘पराई अमानत को जितनी जल्दी हो सके, उसके मालिक तक पहुंचा देना चाहिए। ‘जब कभी’ के चक्कर में भूल जाने का डर रहता है। रही धूप-गर्मी की बात तो फौजी की बेटी इतनी कमजोर भी नहीं कि मौसम के बुरे मिजाज से हार मान लेगी। और फिर क्यों भूल रही हो कि सोना भी तपकर ही कुन्दन बनता है।’ मैं दोनों की कथनी तोलने लगी थी और मां कोई और दलील देती, इससे पहले मैंने घर के निकास द्वार की ओर अपने कदम बढ़ा दिए क्योंकि पिताजी की कही हुई बात मेरे मन-मस्तिष्क में घर कर चुकी थी। मेरे मन में न कोई द्वंद्व था न मौसम की परवाह बल्कि ‘पराई अमानत को… पहुंचा देना चाहिए’, वाक्य को मन ही मन दोहराती हुई मैं दोनों घरों के बीच की दूरी मापने लगी थी।
चारे का हिसाब लिखा पुर्जा तथा एक रुपया दादीजी (रामदयाल जी की पत्नी) के हवाले किया तो वे चुप न रह सकीं, ‘अरी लाली! हम कहीं भागे जा रहे थे, जो शिखर दोपहरी में चली आई, ज़रूर तेरे पिताजी की भेजी आई होगी, आखिर वह ठहरा ‘उसूल’ का आदमी। तेरी मां को पता लगेगा तो…?’ मैं कैसे कहती कि जी-जान से उसूल की रक्षा करने के लिए मुझसे ममता की अनदेखी हुई है। लौटने पर, (शायद मेरे हाव-भाव पढ़कर) मां-पिताजी एक साथ बोले, ‘शाबाश! सदा आगे बढ़ो। आज तुमने एक मुश्किल इम्तिहान पास कर लिया। हम भी खुश, तुम भी खुश। हमने जान लिया कि तुम बात की गहराई समझने और मुश्किल घड़ियों से टक्कर लेने की काबिलियत रखती हो।’ मन के किसी कोने में मां की कही को मान न मिलने की किरच–सी चुभन अन्तत: मेरी ज़ुबां पर विराज गई तो मां ने मुझे गले से लगाकर कहा, ‘जी को छोटा न कर; आज की घटना ने मुझे सिखा दिया कि उसूल और ममता ज़िंदगी के सिक्के के दो पहलू हैं और अपनी-अपनी जगह दोनों ज़रूरी हैं। मां अपनी संतान में फूल-सी कोमलता देखती है तो पिता बज्र-सी कठोरता। ईश्वर करे, तुम्हारी यह कोमलता-कठोरता यूं ही बनी रहे।’


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