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बदहवास बदलाव से बेदम रिश्ते

Posted On July - 11 - 2019

सरस्वती रमेश
दिल्ली के एक घर से दो बुजुर्गों की सड़ी हुई लाशें मिली हैं। दोनों बहन-भाई थे और काफी समय से दुनिया से कटे घर में बंद रहते थे। उनकी उम्र क्रमशः अस्सी और नब्बे साल थी। ज्यादा समय नहीं गुजरा जब इसके पहले मुंबई के लोखंडवाला में आशा साहनी नाम की बुजुर्ग महिला का कंकाल मिला था। करोड़ों की प्रॉपर्टी की मालकिन और अमेरिका में रह रहे कामयाब बेटे की मां की मौत ऐसे एकांत में हुई थी कि उनकी देह के कंकाल बनने तक किसी ने उनकी ओर पलट कर भी न देखा। इस तरह की घटनाएं हमारी बढ़ती महत्वाकांक्षाओं की एक भयावह कीमत है।
आज महानगरों और अब कस्बों -गांवों में भी बुजुर्ग अकेले रहने को विवश हैं। जो अमीर हैं, उनके बच्चों ने इतनी ऊंची शिक्षा प्राप्त कर ली है कि देश में उनके स्टैंडर्ड की नौकरी ही नहीं। वे डिग्री लेते ही अमेरिका, आस्ट्रेलिया या किसी और विकसित देश का रुख कर रहे हैं और जो गरीब थे, उनके बच्चे इतना भी काबिल नहीं बन पाये कि अपने घर में रहकर पेट भरने भर को कमा सकें। कुछ गांवों में न तो खेती बची, न ही कोई रोजगार सृजन हुआ। अपना परिवार चलाने के लिए वे भी अपने घरों से दूर शहरों में दिहाड़ी या नौकरी की तलाश में चले गए।
कृषि आधारित आर्थिक व्यवस्था के खत्म होने और वैश्वीकरण के शुरू होने के बाद हमारे समाज में तेजी से परिवर्तन हुए। संयुक्त परिवारों का विखंडन, विस्थापन और उपभोक्तावादी संस्कृति के विकास के साथ समाज व्यवस्था में एक बदहवास-सा बदलाव आया। बदहवास इसलिए कि अच्छी चीजों के साथ हमने बुरी चीजों को भी बिना सोचे -समझे अपने जीवन में स्वीकार कर लिया। सब कुछ फास्ट होने लगा। यूं भी कह सकते हैं कि बदलते दौर में बहती धाराओं का साथ पकड़ सब आगे बढ़ने की होड़ में इस कदर तल्लीन हुए कि अपने रिश्ते, नाते, परंपरा संस्कृति समाज, यहां तक कि मानवीयता को भी पीछे छोड़ दिया। जिन मांओं ने अपने जीवन के सबसे कीमती समय को अपने बच्चों की परवरिश करते बिताया, उन्हीं मां-बाप को बुढ़ापे में नितांत अकेली कोठियां या घर नसीब हुए और ऐसी मौत, जिसकी चश्मदीद इन्हीं कोठियों की दीवारें बनीं।
कहा जाता है कि मोबाइल अपनों को करीब लेकर आया। हवाई जहाज ने सात संमुदर दूर रह रहे अपनों से मिलवाया। लेकिन विडम्बना देखिए कि मोबाइल में बढ़ते कॉन्टैक्ट लिस्ट के साथ हमारे मन से जुड़े लोगों की लिस्ट छोटी होती गई। संपर्क तो रहा मगर संयोग, जुड़ाव खत्म होता गया। बातचीत महज औपचारिकता बनी और फिर फिजूल की चीज बनकर वह भी खत्म हो गई। हवाई जहाज अपनों से मिलवाने का काम कम और उन्हें दूर ले जाने का काम ज्यादा करने लगे। बड़े शहरों और विदेशों में रह रहे जवान बेटे-बहू से मिलने के लिए मां-बाप मेहमान की तरह जाते हैं और फिर कुछ ही दिनों बाद लौट आते हैं।
आज की पीढ़ी आज़ादी चाहती है। दो पीढ़ियों का एक साथ सामंजस्य मुश्किल हो गया है। नतीजा मां-बाप से बच्चे दूर हो रहे हैं। लेकिन महानगरों में जो एकल परिवार रह रहे हैं, अपनी इच्छा या मजबूरी में, असल में वो अपने बच्चों में भी एक असामाजिक जीवन का बीज बो रहे हैं। आज उन्हें अपने मां-बाप सास-ससुर से मतलब नहीं।
कहने को तो इनसान एक सामाजिक प्राणी है लेकिन उसकी सामाजिकता को मोबाइल और महत्वाकांक्षाओं ने छीन लिया है। हर आदमी शिखर पर चढ़ने की रेस में है। जो नहीं है, वो बेकार या अक्षम है। ऐसे लोगों की समाज में कोई प्रतिष्ठा नहीं। गुजर भर के कमाने और सबके साथ खुशी से रहने का तो जैसे चलन ही खत्म हो गया। सबकी भूख बढ़ती जा रही है और सब भागमभाग भरी जिंदगी का हिस्सा हैं। पीछे खड़े बूढ़े मां -बाप भी अपने बच्चों को पहले तो पीछे से धकेलते हैं, फिर जब वही उनको छोड़ आगे बढ़ जाते हैं तो तड़पने के सिवा कुछ नहीं बचता। अहम सवाल है कि ऐसी व्यवस्था को कौन बना रहा है और इन हादसों से कोई सबक क्यूं नहीं ले रहा?
ये घटनाएं महज हादसे नहीं, एक संवेदनहीन समाज में मनुष्यता के गिरते जाने की सतत दास्तां है। अपनों द्वारा छोड़ दिये गये बुजुर्गों की लाश से उठती दुर्गंध हमारी नई सामाजिक संरचना पर सवाल है। तरक्की और कामयाबी के नीचे की बजबजाती जमीन पर सड़ते रिश्तों की कहानी है। इससे पहले कि इसकी दुर्गंध हम-आप तक पहुंचे, आइए ठहरकर सोचना शुरू करें कि हमें किस ओर जाना है और हम किस ओर बढ़ रहे हैं।


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