चैनल चर्चा !    सुकून और सेहत का संगम !    गुमनाम हुए जो गायक !    फ्लैशबैक !    'एवरेज' कहकर रकुल को किया रिजेक्ट! !    बदलते मौसम में त्वचा रोग और सफेद दाग !    सिल्वर स्क्रीन !    हेलो हाॅलीवुड !    तुतलाहट से मुक्ति के घरेलू नुस्खे !    वर्तमान डगर और कर्म निरंतर !    

बजट उम्मीदों को मंदी की चुनौती

Posted On July - 1 - 2019

आलोक पुराणिक
केंद्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण 5 जुलाई को वित्त वर्ष 2019-20 के लिए पूर्ण बजट पेश करेंगी। फरवरी में तत्कालीन वित्त मंत्री पीयूष गोयल 2019-20 के लिए अंतरिम बजट पेश कर चुके हैं, अब नये सिरे से बजट के गुणा-गणित तय होंगे। इस साल एक जून से 27 जून के बीच देश में मानसून की बारिश में करीब 35 प्रतिशत की कमी दर्ज की गयी है। 27 जून तक के आंकड़े देखें तो देश के करीब 83 प्रतिशत हिस्से में मानसून कमजोर रहा है। कमजोर मानसून का एक मतलब यह भी है कि अर्थव्यवस्था भी कमजोरी का शिकार हो सकती है।
21 जून 2019 के आंकड़ों के हिसाब से देखें तो कमजोर मानसून के चलते खरीफ की फसल की बुआई पर असर पड़ा है। धान की बुआई पिछले साल के मुकाबले 32 प्रतिशत कम इलाके पर हुई है। दालों की बुआई पिछले साल के मुकाबले 50 प्रतिशत कम इलाके पर हुई है। यानी खेती की स्थिति कमजोर रहने के आसार हैं। खेती तमाम समस्याओं से पहले ही जूझ रही है। हालांकि, किसान सम्मान निधि के तहत अब हर किसान हर साल 6000 रुपये पाने का हकदार हो गया है। लेकिन 6000 रुपये साल की रकम निहायत नाकाफी है, अगर कमजोर मानसून खरीफ की फसल को ही कमजोर कर दे। ऐसे में निर्मला सीतारमण के सामने बड़ी बजट चुनौती यह है कि वह अपने बजट से खेती, किसानी को और किस तरह से मदद पहुंचा सकती हैं ।
कुल मिलाकर अर्थव्यवस्था में सुस्ती के संकेत हैं। वित्त मंत्रालय के एक नोट में इस बात को स्वीकार किया गया है कि अर्थव्यवस्था सुस्त हो रही है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, 2018-19 में सकल घरेलू उत्पाद में विकास करीब 7 प्रतिशत ही रहने की उम्मीद है। कुछ जानकार मानते हैं कि 2018-19 में विकास दर सात प्रतिशत से भी और नीचे गिरकर 6.5 प्रतिशत होने की आशंका है। 2017-18 में विकास दर का यह आंकड़ा 7.2 प्रतिशत का था। इससे पहले के साल यानी 2016-17 में यह आंकड़ा 8.2 प्रतिशत का था। अर्थव्यवस्था सुस्त होने के संकेत तमाम वाहन कंपनियां दे रही हैं। सुस्त अर्थव्यवस्था में से संसाधनों की उगाही मुश्किल होगी। संसाधन जरूरी हैं, क्योंकि तमाम किस्म के वादे किये हैं। किसान सम्मान निधि योजना अब तक दो हेक्टेयर वाले छोटे और सीमांत किसानों के लिए थी तो भी 2019-20 के लिए इसके लिए बजट 75 हजार करोड़ रुपये रखा था। यह बजट थोड़ा बहुत बढ़ सकता है। इस सरकार के सामने एक चुनौती यह है कि भाजपा ने जोर-शोर से यह नारा दिया है कि 2022 तक किसानों की आय को दोगुना कर दिया जायेगा। 2022 इसी सरकार के कार्यकाल में आयेगा तो इसे जवाब भी देना पड़ेगा। मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल के पहले बजट में सरकार ने किसानों की आमदनी को दोगुना करने की दिशा में क्या कदम उठाये हैं, यह सवाल भी बजट के बाद सरकार के सामने चुनौती की तरह उभरेगा। संसाधन उगाही जरूरी है, लेकिन इस वक्त अर्थव्यवस्था के सामने दूसरा मसला भी है। बाइक और कार बनाने वाली तमाम कंपनियां परेशान हैं। बाइक और कारों की बिक्री पर ब्रेक लगा है। एक तरफ तो बिक्री ठप हो रही है और दूसरी तरफ इनकी खरीद के लिए कर्ज देने वाली तमाम नाॅन बैंकिंग फाइनेंस कंपनियां (एनबीएफसी) भी ठप हो रही हैं। टूथपेस्ट, साबुन बनाने वाली कंपनियां भी रोना रो रही हैं कि उनकी बिक्री ठप सी पड़ी हुई है। बजट के सामने चुनौतियां ये हैं कि तमाम घोषणाएं वादे कर दिये गये हैं, उन्हें कायदे से पूरा करने के लिए संसाधन लाये जायें। संसाधन आयेंगे कहां से। मंदी से परेशान कंपनियां कह रही हैं कि सेल कम हो रही है, मुनाफा कम हो रहा है। ऐसी सूरत में कार्पोरेट सेक्टर, उद्योग जगत से ज्यादा कर वसूलना खासा चुनौतीपूर्ण काम है। इस चुनौती से कैसे निपटेंगी निर्मला सीतारमण, यह बजट के बाद देखा जायेगा।
अंतरिम बजट में जो आया
फरवरी 2019 में मोदी सरकार के तत्कालीन वित्त मंत्री पीय़ूष गोयल ने अंतरिम बजट पेश किया था। इसमें कई महत्वाकांक्षी घोषणाएं की गयी थीं। अब यह देखना है कि 5 जुलाई को नरेंद्र मोदी सरकार जो पूरा बजट पेश करेगी, उसमें आखिर क्या नया होगा, जो अंतरिम बजट से अलग हो सकता है। फरवरी के अंतरिम बजट में कहा गया था कि 10 करोड़ परिवार आयुष्मान भारत की स्कीम से लाभान्वित होंगे, 10 करोड़ असंगठित क्षेत्र के कामगार पेंशन योजना का लाभ उठायेंगे, 12 करोड़ किसानों को प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि से साल के छह हजार रुपये दिये जायेंगे, कर योग्य आय की सीमा बढ़ाने का फायदा यानी पांच लाख तक की आय को कर मुक्त रखने का लाभ्ा करीब 3 करोड़ लोगों को मिलेगा।
10 करोड़ कामगार, 12 करोड़ किसान, 3 करोड़ कर योग्य आय सीमा बढ़ाने से लाभान्वित-करीब 25 करोड़ लोग सीधे इस बजट से लाभान्वित होंगे, ऐसा दावा अंतरिम बजट में किया गया था। 25 करोड़ लाभान्वित वोटों में तबदील हो जायें, ऐसी शुभकामना अंतरिम वित्तमंत्री की रही होगी। किसान सम्मान निधि योजना का जमकर इस्तेमाल चुनावी भाषणों में हुआ यानी इस योजना के भरपूर राजनीतिक लाभांश भाजपा को मिले। खेती और किसानी का राष्ट्र के सकल घरेलू उत्पाद में भले ही योगदान बीस प्रतिशत से कम हो, लेकिन लोकसभा चुनाव और विधानसभा के चुनाव के परिणामों को तय करने में गांवों का योगदान जबरदस्त रहता है। सरकारें वोटों से बनती हैं, इसलिए चुनी हुई सरकार को उन क्षेत्रों के प्रति भी अतिसंवेदनशील होना होगा, जहां से वोट बहुतायत में आते हैं। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के तहत अंतरिम बजट में दो हेक्टेयर यानी लगभग पांच एकड़ तक जमीन रखनेवाले किसानों को साल में छह हजार रुपये दिये जाने की बात थी। चुनाव जीतने के बाद भाजपा सरकार ने यह योजना सभी 14.5 करोड़ किसान परिवारों के लिए लागू कर दी। यानी इस योजना में पहले की प्रस्तावित रकम के मुकाबले ज्यादा खर्च होनी है।
असंगठित क्षेत्र के कामगारों के लिए अंतरिम वित्त मंत्री पीयूष गोयल ने फरवरी में फिक्र दिखायी थी। उन घोषणाओं के मुताबिक 10 करोड़ असंगठित क्षेत्र के कामगारों को तीन हजार प्रति माह की पेंशन मिलेगी, अगर असंगठित कामगार 18 साल की उम्र में पेंशन स्कीम में आकर सिर्फ 55 रुपये प्रति माह का भुगतान करें या 29 साल की उम्र में पेंशन स्कीम में आकर सिर्फ 100 रुपये प्रति माह का भुगतान करें। यह घोषणा अर्थव्यवस्था के उस वर्ग की चिंता करती है, जिसका रिकार्ड आम तौर पर कहीं नहीं होता। दिहाड़ी पर काम करनेवाला यह वर्ग अर्थव्यवस्था के हाशिये पर रहता है। आगामी पूरे बजट में इस स्कीम को लेकर क्या प्रस्ताव आयेंगे, इस पर भी सबकी नजर रहेगी।
अंतरिम बजट में घोषणा की गई थी कि पांच लाख रुपये तक की आमदनी कर मुक्त होगी और कर बचत करने वाले छह लाख पचास हजार रुपये की आमदनी कर मुक्त रख पायेंगे। पांच लाख रुपये सालाना आय का मतलब करीब 42 हजार रुपये प्रति माह कमाने वाले भी कर मुक्त रह पायेंगे। मुखर मध्यवर्ग के लिए यह खासी राहत थी और सरकार के लिए भी राहत थी। मुखर मध्यवर्ग की आवाज मीडिया में जल्दी और ज्यादा जगह पा जाती है। मोटे तौर पर 42000 प्रतिमाह की वेतन स्लैब में निजी क्षेत्र के बहुत से कर्मचारी आ जाते हैं। उन्हें कर से राहत मिलने की उम्मीद थी, अंतरिम बजट के हिसाब से। मोटे तौर पर सरकार को यह राहत देने से करीब 18500 करोड़ का नुकसान होगा।
अब चुनाव हो चुके हैं क्या अब भी मोदी सरकार मध्यवर्गीय करदाताओं के प्रति उदारता दिखायेगी, यह सवाल महत्वपूर्ण है। मोदी सरकार जितने भी कड़े फैसले चाहे इस बजट में कर सकती है, क्योंकि जनता की स्मृति बहुत कमजोर होती है। जैसे-जैसे अगले चुनाव की तारीखें करीब आती जायेंगी, कड़े बजटीय फैसले करने की क्षमताएं सरकारों की कम हो जाती है। 2019-20 का बजट इस सरकार का पहला बजट है। अगले लोकसभा चुनाव 2024 में होने हैं, जैसे-जैसे 2024 करीब आता जायेगा, सरकार की राजनीतिक इच्छाशक्ति पर चुनावी चिंताओं के ताले लग जाते हैं। इसलिए यह बजट साहसी फैसलों के लिहाज से सबसे महत्वपूर्ण बजट माना जा सकता है।
रोजगार
रोजगार का मसला लगातार चर्चा में रहा है। नीति आयोग की हाल की बैठक में भारतीय अर्थव्यवस्था को 2024 तक 5 ट्रिलियन डालर यानी पांच लाख करोड़ डालर की अर्थव्यवस्था बनाने की बात की गयी है। अभी यह साइज 2.75 ट्रिलियन डालर यानी दो लाख 75000 करोड़ डालर की है। दूसरी तरफ का आंकड़ा है बेरोजगारी का, जो 45 साल के उच्चतम स्तर यानी 6.1 प्रतिशत पर पहुंच चुकी है। यह आधिकारिक आंकड़ा 2017-18 का है। हालांकि, सरकार पहले इसका खंडन करती रही। शहरों में बेरोजगारी दर और भी ज्यादा है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, अक्तूबर-दिसंबर 2018 में शहरी इलाकों में बेरोजगारी दर 9.7 प्रतिशत थी। हर साल रोजगार बाजार में करीब एक करोड़ बीस लाख लोग नये आते हैं, इनका बड़ा हिस्सा शहरों का रुख करता है। रोजगार और स्वरोजगार की बातें लगातार हुई हैं। स्वरोजगार के लिए 17 करोड़ मुद्रा लोन दिये गये। सरकार का वादा है कि अब 30 करोड़ मुद्रा कर्ज दिये जायेंगे। लेकिन जहां तक ताल्लुक रोजगार का है, वहां रोजगार की गुणवत्ता, नौकरियों की सुरक्षा से जुड़े मसले खड़े हैं। एक शोधपत्र के मुताबिक, 2000-01 में कुल रोजगार में ठेके कर्मियों की तादाद 15.5 प्रतिशत थी, 2015-16 में यह बढ़कर करीब 28 प्रतिशत हो गयी। रोजगार की गुणवत्ता को लेकर सवाल लगातार उठ रहे हैं। कुल मिलाकर रोजगार का पैदा होना और खासकर अच्छे रोजगार का पैदा होना लगातार मुश्किल हो गया है। अर्थव्यवस्था का हाल यह है कि अगर किसी को 10 हजार रुपये प्रति माह से 15 हजार रुपये प्रति माह तक का रोजगार चाहिए तो रोजगार मिल जाता है। लेकिन बेहतरीन सेलरी वाले सुरक्षित रोजगार अब ज्यादा नहीं पैदा हो रहे हैं। उद्योगपति यह सुनिश्चित करने की कोशिश करते हैं कि कैसे लागत कम हो, कैसे कम से कम लोगों को रोजगार दिया जाये। लेकिन रोजगार के अवसर बढ़ाना किसी उद्योगपति की प्राथमिकता में नहीं है। रिलायंस, एचडीएफसी बैंक जैसे बड़े कारोबारों का विश्लेषण करने पर साफ होता है कि इन कंपनियों के कारोबारी मुनाफे जिस रफ्तार से बढ़े हैं, उस रफ्तार से इन कंपनियों की कर्मचारियों की संख्या में बढ़ोतरी नहीं हुई है। बड़ी कंपनियां ज्यादा तकनीक, ज्यादा रोबोट का इस्तेमाल करके ग्राहकों की संख्या तो बढ़ा रही हैं, लेकिन कर्मचारियों की संख्या बढ़ाना उनकी प्राथमिकता में नहीं है। इस संबंध में एक महत्वपूर्ण सुझाव फेडरेशन आफ इंडिया चैंबर्स आफ कामर्स एंड इंडस्ट्री यानी फिक्की ने दिया है। फिक्की को मोटे तौर पर बड़े उद्योगों की प्रतिनिधि संस्थान माना जाता है। फिक्की के अध्यक्ष का सुझाव है कि जो कंपनियां रोजगार पैदा करती हैं, उन्हें करों में छूट मिलनी चाहिए। फिक्की अध्यक्ष का सुझाव है कि जो कंपनी अपने निवेश से 250 से 499 कर्मियों का रोजगार पैदा करे, उस कंपनी को कार्पोरेट टैक्स में, प्लांट शुरू होने के अगले 5 साल तक 2 प्रतिशत की छूट दी जानी चाहिए। जो कंपनियां 500 से 749 कर्मियों का रोजगार पैदा करें, उन्हे 3 प्रतिशत की छूट मिले। 750 से 999 रोजगार पैदा करने वाली कंपनियों को 4 फीसदी की छूट मिले और 1000 से ज्यादा रोजगार पैदा करने वाली कंपनियों को 5 प्रतिशत की कर छूट दी जाये। इस सुझाव पर किस हद तक विचार करती हैं वित्तंमंत्री, यह तो बजट आने के बाद ही पता चलेगा। लेकिन एक बात साफ है कि रोजगार पैदा करने में बड़ी कंपनियों की रुचि अब नहीं है। उन्हें रोजगार पैदा करने के लिए बजट किस तरह से प्रेरित करता है, यह देखना होगा।
छोटे उद्योग
बड़ी कंपनियां बहुत ज्यादा रोजगार नहीं दे सकतीं। छोटे उद्यमों से ही बड़ा रोजगार मिलेगा। चीन ने गांवों में छोटे-छोटे कारोबारियों को इंटरनेट के जरिये जोड़ा है। इस तरह के ग्रामीण रिटेलर कारोबारियों वाले गांवों को वहां ताओबाओ गांव कहां जाता है। 2009 में कुल तीन ताओबाओ गांव थे, 2017 में 2118 ताओबाओ गांव हो गये। कुछ इस तरह का गांवों में रिटेलर वाला काम भारत में संभव क्यों नहीं है। भारत में करीब 35 करोड़ की आबादी के पास स्मार्टफोन इंटरनेट है, तब यह भारत में संभव क्यों नहीं है। भारतीय उपभोक्ता सस्ते आइटमों के, डिस्काउंट के प्रेमी ग्राहक हैं। छोटे उद्यमों के आइटम इंटरनेट के जरिये सस्ते कैसे बेचे जा सकते हैं, यह सवाल महत्वपूर्ण है। क्या बजट के जरिये ऐसे छोटे कारोबारियों को कोई मदद की जा सकती है, जो इंटरनेट के जरिये अपना माल बेच रहे हैं। इस सवाल का कोई जवाब मिलना चाहिए बजट से।
विनिवेश
अंतरिम बजट में सरकार ने लक्ष्य रखा था कि विनिवेश यानी सरकारी उपक्रमों को बेचकर 90 हजार करोड़ रुपये उगाहे जायेंगे। सरकार चाहे तो पूर्ण बजट में इस लक्ष्य को बढ़ा सकती है। सरकार के पास मजबूत बहुमत है। लगातार घाटे में चल रहे सरकारी कारोबारों के विनिवेश से सरकार कुछ ज्यादा रकम वसूल सकती है। ऐसे कई उपक्रमों की सूची नीति आयोग के पास है, जिनका विनिवेश किया जा
सकता है। अब सरकार को राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाकर उन उपक्रमों का विनिवेश करना चाहिए, जिससे सरकार पर बोझ भी कम हो, और कुछ अतिरिक्त संसाधन भी जुटाये जा सकते हैं।
क्या बढ़ेगा कर संग्रह
इस सवाल का एक जवाब यह है कि ऐसा करने से पहले सरकार को कई बार सोचना चाहिए। जनता की जेब में अगर पैसा रहेगा, वह ज्यादा आइटमों की खरीद करेगी। अगर जनता से कर वसूली ज्यादा कर ली जायेगी तो जनता के हाथ में रकम कम ही बचेगी। जनता के हाथ में रकम बचे तो इस रकम का इस्तेमाल तमाम आइटमों की खरीद में होगा और इस खरीद से उस मांग में मजबूती होगी, जो अभी बहुत कमजोर दिखायी पड़ रही है। बार-बार यह कहा जा रहा है कि जनता के हाथ में रकम छोड़ी जाये, यानी उससे करों का संग्रह कम किया जाये। और रहा सवाल कि क्या कार, बाइक, एसी वगैरह पर कर बढ़ाकर संसाधन वसूल लिये जायें तो इस सवाल के दो जवाब हैं। पहला यह कि इन आइटमों को बनाने वाली कंपनियां पहले ही शोर कर रही हैं कि कर कम किये जायें। दूसरा जवाब यह है कि बाइक और एसी पर कर बढ़ाना या कर घटाना इस बजट के दायरे में नहीं आता, इन आइटमों पर कर बढ़ाना और कर घटाना जीएसटी गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स, माल और सेवाकर कौंसिल के अधिकार क्षेत्र में आता है।


Comments Off on बजट उम्मीदों को मंदी की चुनौती
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading...
Both comments and pings are currently closed.

Comments are closed.

Powered by : Mediology Software Pvt Ltd.