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पीजीआई में अंगों की मांग अधिक, देने वाले कम

Posted On July - 29 - 2019

संदीप राणा
एक व्यक्ति के अंगदान से 8 लोगों की जिंदगी बचाई जा सकती है। फिर भी हजारों लोग अंगों की कमी की वजह से मौत का ग्रास बन जाते हैं। इस बहुत बड़े अंतर के केंद्र में मुख्य कारण जागरूकता की कमी होना है। चंडीगढ़ स्थित पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजूकेशन एंड रिसर्च (पीजीआईएमईआर) में अकसर ऐसा मंजर देखने में आता है, जब ब्रेन डेड मरीजों के परिवार को क्षेत्रीय अंग एवं उत्तक प्रत्यारोपण संस्थान के सलाहकार अंगदान का परामर्श दे रहे होते हैं, तब उन्हें निर्णय लेने में भावानात्मक और मानसिक अंतर्द्वंद्व से जूझते पाया जाता है। ऐसे केसों में बड़ी संख्या सड़क दुर्घटना में मरणासन्न घायलों की होती है।
अंगदान विभाग के एक समन्वयक ने अपने अनुभव सांझा करते हुए बताया, ‘हादसे के कारण संत्रास से गुजर रहे परिवारों को अंगदान के लिए में राजी करना बुहत मुश्किल काम है, तथापि हमारा प्रयास रहता है कि उन्हें प्रेरित करें कि वे जाने वाले को अन्य रूप में जीवनदान दे सकते हैं। हम उन्हें समझाते हैं कि उनका प्रियजन अब वापस सामान्य जिंदगी में नहीं लौट सकता, किंतु यदि अंगदान करते हैं तो वह दूसरों के शरीर में जिंदा रहेगा’। उन्होंने कहा, ‘इस प्रयास में सफलता की दर फिलहाल 50 फीसदी ही है, क्योंकि जो इनकार कर देते हैं वे कई मिथकों और अन्य सामाजिक दबावों से बंधे होने की बात कहते हैं। बहुतों के लिए ब्रेन डेड व्यक्ति की चलती नब्ज देखने के बाद यह स्वीकार करना मुश्किल होता है कि उनका प्रियजन अब उनके बीच नहीं रहा’।
गुर्दा प्रत्यारोपण के अध्यक्ष डॉ. आशीष शर्मा कहते हैं कि अंगों के लिए मांग बहुत ज्यादा है, लेकिन अंगदान करने वालों की संख्या काफी कम है। विशेषज्ञ कहते हैं कि सही मिलान का अंग मिलना अलग से एक कठिन काम है। कई बार दान किए गए अंग को उपलब्ध सीमित समय में हवाई जहाज से लाना-ले जाना पड़ता है। पीजीआई में पिछले 5 साल में 443 मरीजों को अंग दान में प्राप्त हुए हैं। अस्पताल प्रबंधन विभाग के मुखिया और चिकित्सा अधीक्षक डॉ. एके गुप्ता का कहना , ‘हमारे संस्थान में अंगदान और प्रत्यारोपण कार्यक्रम सफलता की गाथा है, क्योंकि पिछले 5 साल में अंगदान की दर सतत रही है’। हालांकि जब उनसे बृहद परिदृश्य के संदर्भ में पूछा गया तो उन्होंने स्वीकार किया कि संभावित अंग दानकर्ताओं से वास्तव में अंगदान करवाने में सफलता की दर काफी कम है। इसके पीछे मुख्य कारण जागरूकता में कमी और प्रचलित मिथक और अवधारणाएं हैं। इसीलिए हमारी नीति में ध्यान 2 चीजों पर ज्यादा । पहला, जागरूकता अभियान और परामर्श के जरिए अंगदान की स्वीकार्यता को बढ़ाना और दूसरा, चिकित्सीय मोर्चे पर विभागीय सदस्यों के प्रशिक्षण और तंत्र को मजबूत करना। हम परिवारों को दोष नहीं दे सकते, क्योंकि ऐसे मौकों पर वे पहले ही बहुत बड़े संत्रास से गुजर रहे होते हैं। इसलिए अंग प्रत्यारोपण समन्यवयक का मुख्य काम उनके गम में शरीक होकर परामर्श देने का होता है। अंगदान की बात हम तभी लाते हैं, जब यह महसूस होने लगता है कि परिवार इसके लिए सकारात्मक स्वीकार्यता दिखा रहा है। इसमें लगने वाला प्रयास और समय परिवार-परिवार में भिन्न होता है, जो वक्त पर उनकी भावनात्मक स्थिति पर निर्भर होता है और आखिरी निर्णय लेने में बहुत से कारक प्रभाव रखते हैं। हम जानते हैं कि यह एक मुश्किल फैसला होता है, इसलिए परिवार का जो निर्णय होता है उसकी कद्र करते हैं।’
दान देने और पाने में खुशी : मार्च-2013 में अपने बेटे पार्थ को एक सड़क दुर्घटना में खोने वाले संजय गांधी कहते , ‘जब बेटे को ब्रेन डेड घोषित कर दिया गया तो डॉक्टरों ने परिवार को अंगदान के बारे में समझाया और प्रेरित किया कि इसके कई लोगों की जिंदगी बच जाएगी, तब हमने सहमति दी और उसके दिल और जिगर को तो प्रत्यारोपण के लिए दिल्ली ले जाया गया, जबकि दोनों गुर्दे और आंखें पीजीआई में ही जरूरतमंदों को लगाए गए थे। उनका कहना है कि पार्थ के अंग दान करके उन्हें संतोष मिला है और परिवार इस बात पर खुश है कि हमारे बेटे ने अपनी मौत के बाद भी कई लोगों को जिंदगी दी। वे महसूस करते हैं कि लोगों को इस बारे में शिक्षित करने से भारत में
अंगदान करने वालों की संख्या में इजाफा होगा, क्योंकि पहले-पहल हमारे देश में रक्तदान भी इतना प्रचलित नहीं था, लेकिन अब यह काफी आम है।’ पंजाब में जगराव निवासी मनसीरत सिंह को दान में दिल मिला है वे कहते है, ‘मुझे अपनी सेहत में प्रत्यारोपण से पहले और बाद में कोई अंतर महसूस नहीं होता है। मेरी सोच है कि ज्यादा से ज्यादा लोगों को अंगदान के लिए आगे आना चाहिए, क्योंकि इससे दूसरों को जीवनदान मिलता है।’
अंतर की मात्रा : उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, हमारे देश में लगभग 5 लाख लोग समय पर अंग न मिलने की वजह से मर जाते हैं। इस वक्त गुर्दा प्रत्यारोपण चाहने वालों की संख्या लगभग 1.50 लाख है, लेकिन दानकर्ता केवल 5000 लोग ही हैं। इस पर देश के अंदर एक हजार से भी कम प्रत्यारोपण होते हैं। इसी तरह जिगर(लीवर) की मांग 50 हजार है और उपलब्धतता मात्र एक हजार है। दिल का दान देने वाले 15 लोग हैं तो मांग बहुत ज्यादा है यानी 50 हजार प्रति वर्ष। आंखों के कॉर्निया की दरकार लगभग एक लाख नेत्रहीनों को है, जबकि दानकर्ता केवल 45 हजार हैं।
पीजीआई में वर्ष 2015 से 30 जून 2019 की अवधि में 188 शरीर दानकर्ताओं से 443 मरीजों को अंग मिले थे। इसके अलावा, इस अवधि में जीवित-से-जीवित व्यक्तियों के बीच 91 गुर्दा प्रत्यारोपण हुए और 24 गुर्दे शवदान से प्राप्त हुए थे। हालांकि अंगों की भारी कमी है और चाहने वालों की कतार बहुत लंबी है। गुर्दे के लिए 1,600 और कॉर्निया के लिए 2,545 लोग इंतजार कर रहे हैं। यह स्थिति उस वक्त है जब भारत एक बहुत बड़ी संख्या में लोग सड़क दुर्घटनाओं में जिंदगी गंवाते हैं, हर साल 1.50 लाख से ज्यादा लोग सड़क दुर्घटना में मारे जाते हैं और रोजाना का यह आंकड़ा लगभग 400 मौतों का है।

इस साल अब तक 13 अंगदाता


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