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नर को नारायण से जोड़ते नारद

Posted On July - 21 - 2019

प्रो. मोहन मैत्रेय
ब्रह्मा जी के मानस-पुत्र महर्षि नारद का व्यक्ितत्व अत्यंत विराट और विलक्षण है। महर्षि नारद भक्ित मार्ग के द्वादश आचार्यों में प्रमुख हैं। उनका सात बड़े ऋषियों तथा प्रजापतियों में प्रमुख स्थान है। देवर्षि की यह विशेषता रही है कि वे देव-दनुज दोनों के विश्वासपात्र रहे। लोक-कल्याण इनका ध्येय रहा। सृष्िट रचना-विनाश प्रक्रिया के तीन महानायक ब्रह्मा, विष्णु और शिव क्रमश: सृजक, पालक, संहारक का धर्म निभाते हैं। देवर्षि नारद सभी लोकों का भ्रमण कर त्रिदेवों के सम्मुख लोगों की समस्याएं रखते और यथासंभव उनका समाधान भी करवाते हैं। वे त्रिदेवों के संदेश भी यथोचित लक्ष्य पर पहुंचाते हैं। वह वास्तविक रू‍प में संचार क्रांति के जनक कहे जा सकते हैं।

पहले गन्धर्व, फिर दासीपुत्र
देवर्षि के इस चर्चित रू‍प से पूर्व इनके दो जन्मों का वृत्त मिलता है। नारद पहले उपबर्हण नाम के गन्धर्व थे। एक प्रसंग के अनुसार एक बार जगतस्रष्टा की आराधना गन्धर्व और अप्सराएं नृत्य संगीत के माध्यम से कर रहे थे। गन्धर्वश्रेष्ठ उपबर्हण महिलाओं के साथ वहां पहुंचे। स्वर-सौन्दर्य और कला की विशिष्टता ने उन्हें प्रमत्त कर दिया। इस पर पितामह ने उन्हें शापित किया- तुम शूद्र हो जाओ। एेन्िद्रयक तृप्ित ही तो शूद्रत्व का  कारण है।
दूसरे जन्म में एक आश्रम का प्रसंग है। तपस्वी विप्र के आश्रम में एक शूद्रा दासी अपने छोटे बालक के साथ सेवारत रहती। आश्रम में प्राय: परिव्राजक सन्तों का आना-जाना लगा रहता। बालक भी यथासंभव उनकी सेवा करता। जन्म से ही बालक खेल-कूद आदि से विरक्त था। सन्तों का आशीर्वाद मिल जाता, अमृत वाणी का आनंद भी उपलब्ध होता। कुछ सन्तों ने एक बार आश्रम में चातुर्मास्य किया। बालक इनकी सेवा में मग्न रहता। बालक की श्रद्धा से प्रेरित होकर सन्तों ने उसे भगवान के ध्यान और मनन का उपदेश दिया। बालक को भगवान की तलाश थी, माता का स्नेह बाधक था। एक दिन गो-दोहन के समय शूद्रा को एक सर्प ने काट लिया। बालक प्रभु के ध्यान में रम गया। वह समय भी आया जब अलौकिक ज्योति से साक्षात्कार हुआ। आकाशवाणी भी हुई, तुम इस जन्म में मेरा साक्षात‍् नहीं पा सकते। मैंने अनुग्रह करके दर्शन दिया। अब लोक-विचरण करते हुए ही भगवद‍्गान को ही लक्ष्य बनाओ।

दक्ष ने दिया शाप
देवर्षि अपने वर्तमान स्वरूप में भगवान ब्रह्मा के मन से उत्पन्न हुए। उन्होंने निवृत्ति मार्ग ही स्वीकार किया। ब्रह्मा जी से वीणा प्राप्त कर उसकी धुन पर प्रभु स्मरण ही स्वभाव बना। पहले आश्रम में निवास करते थे। जब प्रजापति दक्ष के ग्यारह सहस्र पुत्रों को देवर्षि ने निवृत्ति मार्ग की ओर अग्रसर कर दिया, तो क्रुद्ध दक्ष ने इन्हें शाप दे दिया- आप कहीं भी दो घड़ी से अधिक न ठहर सकोगे। देवर्षि परिव्राजक यानी सदा भ्रमण करते रहने वाला संन्यासी बन गये।
देवर्षि का एक ही लक्ष्य रहा- जीवमात्र का कल्याण। वह बालक ध्रुव के उपदेशक थे, तो कंस के प्रेरक भी। सती को शंकर जैसा पति प्राप्त करने की प्रेरणा दी। प्रह्लाद को भक्त बनाने में भी उनकी भूमिका थी। उसकी गर्भस्थ माता को अपने आश्रम में स्थान दिया और नित्य प्रति उसे प्रभु स्मरण का अमृतपान करवाते रहे। आपने ब्रह्मा जी का विवाह संबंधी आदेश नहीं माना, तो एकाकी जीवन के लिए शापित हुए। इतिहास, पुराण, युद्ध-गान्धर्व विद्या के ज्ञाता नीतिकार महर्षि नारद की पहचान उनकी वीणा और ‘नारायण-नारायण’ का मधुर स्वर है।
अठारह मुख्य पुराणों में बहुचर्चित ‘नारद पुराण’ किसी न किसी रूप में देवर्षि नारद से संबंधित है। इस संबंध में दो मान्यताएं हैं। प्रथम यह कि नारद जी द्वारा कथित होने के कारण यह नारद-पुराण है। ‘मत्स्य पुराण’ में उल्लेख है : ‘यत्राह नारदो धर्मान‍्’। दूसरी मान्यता यह है कि सनक, सनंदन, सनातन और सनत्कुमार इन चारों ऋषियों ने नारद को इस पुराण की कथा सुनायी और नामकरण हुआ- नारदीय पुराण। ‘नारद पुराण’ मूल रूप में वैष्णव पुराण है, फिर भी इसमें शिव और शैव सिद्धांतों का वर्णन है। यह तथ्य इस पुराण की धार्मिक सहिष्णुता, साम्प्रदायिक सद‍्भावना का परिचायक है। पुराण के 207 अध्यायों में 22 हज़ार श्लोक हैं। इस पुराण में धर्म-साधना, भक्ति-भावना, दार्शनिक चिंतन, वेदांग, ज्योतिष, मन्त्र-विद्या का जिस प्रकार विवेचन है, उसके दृष्िटगत इसे ‘विश्वकोश’ कहा जा सकता है। इसका भारतवर्ष के सांस्कृतिक इतिहास के अध्ययन की दृष्टि से विशेष महत्व है।


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