सनी देओल, करिश्मा ने रेलवे कोर्ट के फैसले को दी चुनौती !    मेट्रो की तारीफ पर अमिताभ के खिलाफ प्रदर्शन !    तेजस में रक्षा मंत्री की पहली उड़ान, 2 मिनट खुद उड़ाया !    अयोध्या पर चुप रहें बयान बहादुर !    पीएम के प्रति ‘अपमानजनक' शब्द राजद्रोह नहीं !    अस्त्र मिसाइल के 5 सफल परीक्षण !    एनडीआरएफ में अब महिलाएं भी !    जेल में न कुर्सी मिली, न तकिया ; कम हुआ वजन !    दिल्ली में नहीं चलीं टैक्सी, ऑटो रिक्शा !    सीएम पद के लिए चेहरा पेश नहीं करेगी कांग्रेस: कैप्टन यादव !    

धीरे-धीरे रे मना…

Posted On July - 7 - 2019

साई वैद्यनाथन
भले देर से हों, प्रभु के प्यारों के काम होते जरूर हैं। इसलिए भगवान के काम करते समय, धैर्य होना अत्यंत महत्वपूर्ण है। संत कबीर ने भी कहा है- धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय, माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय।
साल 1893 में शिकागो में धर्म संसद के आयोजन की घोषणा हुई। स्वामी विवेकानंद इसमें शामिल होने के लिए मन नहीं बना पा रहे थे। उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस ने एक दिन उन्हें दर्शन दिए और जाने का आदेश दिया। सौभाग्य से खेतड़ी के महाराजा ने यात्रा के लिए धन का योगदान दिया। जहाज से लंबी यात्रा करते हुए सिंगापुर और जापान के बाद स्वामी विवेकानंद जुलाई में शिकागो पहुंचे। वहां उन्हें पता चला कि संसद को सितंबर तक स्थगित कर दिया गया है और एक प्रतिनिधि के रूप में बोलने के लिए प्रायोजक होना अनिवार्य है। लेकिन, उनके पास न तो लंबे वक्त तक रुकने का इंतजाम था और न ही कोई प्रायोजक। सौभाग्य से, बोस्टन की एक रेल यात्रा के दौरान उनकी मुलाकात केट सनबोर्न नाम की महिला से हुई। वह उन्हें न केवल अपने घर ले गईं, बल्कि उन्हें प्रोफेसर राइट से भी मिलवाया। प्रोफेसर राइट ने संसद की चयन समिति को विवेकानंद के बारे में लिखा और समिति ने विवेकानंद को एक प्रतिनिधि के रूप में स्वीकार कर लिया। फिर वह शिकागो के लिए रवाना हुए, लेकिन वहां उनके कागजात खो गये। जब वे वहां असहाय घूम रहे थे, तभी एक दयालु महिला श्रीमती हेल, उनके पास आईं और उनकी परेशानी के बारे में पूछा। वह उन्हें घर ले गईं, खाना खिलाया और आराम करने के लिए जगह दी। फिर, वह उन्हें संसद के कार्यालय में ले गईं। आखिरकार 11 सितंबर 1893 को स्वामी विवेकानंद ने अपने भाषण से दुनिया को स्तब्ध कर दिया। ‘अमेरिका में मेरे बहनों और भाइयो’ शब्दों के साथ शुरू हुआ उनका यह भाषण आज भी मिसाल बना हुआ है।

बुद्ध का आगमन : एक दिन वैशाली की नर्तकी आम्रपाली को खबर मिली कि गौतम बुद्ध निकट के कोटिग्राम में आए हुए हैं। वह उनका धर्मोपदेश सुनने वहां चली गयीं। कुछ दिनों बाद बुद्ध वहां से चले गए। लेकिन आम्रपाली उन्हें फिर से देखने की उम्मीद में हर शाम उस जगह जाती रहीं। कई महीने बीत गये। फिर एक दिन, बुद्ध कोटिग्राम लौट आये। उन्होंने आम्रपाली को न केवल आशीर्वाद दिया, बल्कि अगले दिन उसके घर पर भोजन करने का प्रस्ताव भी स्वीकार कर लिया।

सही समय : कुंदग्राम के राजकुमार महावीर संसार का सच जानना चाहते थे, इसलिए उन्होंने राजसी जीवन त्यागने का फैसला किया। लेकिन उनके माता-पिता नहीं माने। इस पर महावीर ने उन्हें आश्वासन दिया कि जब तक वे जीवित हैं, तब तक वह राजमहल से नहीं जायेंगे। राजकुमार के 28 साल का होने तक उनके माता-पिता की मृत्यु हो चुकी थी। लेकिन, अपने बड़े भाई के कहने पर राजकुमार महावीर दो और वर्षों तक सामान्य जीवन जीते रहे। फिर उन्होंने अपना तपस्वी जीवन शुरू किया और राजकुमार महावीर, भगवान महावीर बन गये।


Comments Off on धीरे-धीरे रे मना…
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading...
Both comments and pings are currently closed.

Comments are closed.

Powered by : Mediology Software Pvt Ltd.