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दादा जी की थैली

Posted On July - 7 - 2019

अर्विना गहलोत
मेरे दादाजी के कंधे पर हमेशा एक थैली लटकी रहती थी उसमें उनकी ज़रूरत का छोटा-मोटा सामान उसमें रहता था। बिल्कुल जादुई पिटारे की तरह थी दादाजी की थैली। जब भी दादा जी कहीं जाते हैं मेरे लिए कुछ न कुछ ज़रूर लाते हैं। बाहर से आने पर मैं तो इंतजार करता, दादाजी कब अपनी थैली खोले और मुझे जादुई थैली में से आम, अमरुद खाने को मिले।
एक दिन गर्मी की दोपहर में दादा जी को सिलाई मशीन चलाते देख टीनू भी पास आकर बैठ गया।
दादा जी आप इन कतरनों से क्या बना रहे हैं?
टीनू ! मैं इन कतरनों से सामान लाने के लिए थैली सिल रहा हूं।
टीनू : दादा जी आपने सिलना कहां से सीखा ?
दादा जी : जब में सेना में सिपाही था तो मुझे सिलाई में रुचि थी वहां इसकी ट्रेनिंग मिली। सेना में रहकर मैं अपने और साथी सिपाहियों की वर्दी दुरुस्त कर दिया करता था। इस काम में मुझे बहुत मज़ा आता था।
सेना में हम अपना सामान लाने के लिए थैले का ही प्रयोग करते थे, ये थैले मैं बहुत ही खूबसूरती से सिल दिया करता था ।
टीनू : दादा जी इतने सारे थैलों का हम क्या‌ करेंगे? घर में तो पहले से ही कई थैले हैं। दादा जी : टीनू ये थैले हम उन लोगों को देंगे जो यह जानते हुए कि पॉलिथीन सेहत के लिए हानिकारक है, फिर भी अपने आलस्य की वजह से ‌इसे बढ़ावा देते हैं।
टीनू : दादा जी क्या मैं भी आपके साथ चल सकता हूं।
दादा जी : टीनू तुम भी चल सकते हो हमारे साथ हमारे ‘मिशन थैली बांटो अभियान में’, आखिर तुम इस‌ देश का भविष्य हो।
टीनू शाम को रावलदास की दुकान के बाहर ‌दादा जी के दोस्तों के साथ थैले लेकर दुकान के बाहर पहुंच गया। सामने से एक आदमी ने स्कूटर रोका और दुकान से सामान खरीदने लगा।
दुकानदार : साहब थैला लाए‌ हैं?
ग्राहक : नहीं लाया, ऑफिस से सीधा आ रहा हूं पॉलिथीन में दे दो।
दुकादार : साहब पॉलिथीन तो बंद है।
दादा जी ने ग्राहक के पास जाकर अपनी बनाई थैली भेंट की और आगे से बाजार आते हुए थैली साथ रखने सलाह भी दी।
ग्राहक : बाबूजी आप इस थैली की कीमत बताएं कितनी हुई।
दादा जी : ग्राहक से बोले यह काम में पैसा कमाने के लिए नहीं कर रहा इसके जरिए समाज में जागरूकता ‌लाना चाहता हूं, ताकी हम सब पॉलिथीन के हानिकारक प्रभाव से बच सके। इस तरह सारी थैलियां आने वाले ग्राहकों को बांट दी।
इसी तरह यह सिलसिला एक महीने तक जारी रहा।
आज रविवार का दिन था इस दिन दुकान पर अधिक भीड़ थी। दादा जी और टीनू चल दिए यह देखने कि उनकी कोशिश कुछ रंग लायी या नहीं।
टीनू ने देखा कि दादा जी द्वारा भेंट किए गए थैले लेकर लोग सामान खरीदने आ रहे थे।
एक ग्राहक की नज़र दादा जी पर पड़ी तो उसने उनके पास आकर अभिवादन किया और धन्यवाद कहा।
टीनू ने देखा सब ग्राहक दादा जी के चारों ओर एकत्र हो गए। उनमें से कुछ ने दादा जी को गोद में उठा लिया और कुछ लोगों ने उसे भी कंधे पर बैठा लिया। एक पत्रकार भी वहां मौजूद था।
अगले दिन सुबह-सुबह टीनू के पापा विजय ने देखा कि अखबार में दादा जी के साथ उनके बेटे की भी फोटो छपी थी। लिखा था बुजुर्ग के साथ आने वाली पीढ़ी ने भी पॉलिथीन मिटाओ, देश बचाओ अभियान में भाग लिया। उनका थैली बांटो मिशन कामयाब रहा। दुकानदार ने घोषणा की-व्यापारी एसोसिएशन की तरफ से दादा जी और उनके सहयोगियों का अभिनंदन किया जायेगा।
खबर पढ़ कर विजय को गर्व का अनुभव हुआ।


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