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जागरूकता और सरकार की गंभीरता से मिलेंगे अच्छे परिणाम

Posted On July - 15 - 2019

आफत बनती  आबादी

योगेश कुमार गोयल
भारत में वर्ष 1951 से जनसंख्या नियंत्रण के लिए परिवार नियोजन कार्यक्रम चल रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद हम जनसंख्या पर नियंत्रण पाने के मामले में अन्य देशों के मुकाबले फिसड्डी साबित हुए हैं। हर साल विश्व जनसंख्या दिवस पर भारत में भी लंबे-चौड़े आश्वासनों का पिटारा तो खोला जाता है, लेकिन उन पर अमल के प्रति कोई गंभीर नहीं रहता, नतीजा वही ढाक के तीन पात। हालांकि, यह बात सही है कि जनता की सहभागिता के अभाव में सरकार द्वारा जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण पाने के लिए किया जाने वाला प्रचार-प्रसार उतना उपयोगी साबित नहीं हो पाता। यह भी हकीकत है कि विगत दशकों में देश की जनसंख्या जिस गति से बढ़ी, उस गति से कोई भी सरकार जनता के लिए आवश्यक संसाधन जुटाने की व्यवस्था करने में सफल नहीं हो सकती। बढ़ती आबादी की विस्फोटक परिस्थितियों के कारण ही संविधान में जिस उद्देश्य से प्राथमिक शिक्षा का लक्ष्य निर्धारित किया गया था, वह भी गौण होकर रह गया है।
देश में 40 फीसदी आबादी आजादी के बाद से ही गरीबी में जी रही है। गरीबी में जीवन गुजार रहे ऐसे बहुत से लोगों की यही सोच रही है कि इनके यहां जितने ज्यादा बच्चे होंगे, उतने ही ज्यादा कमाने वाले हाथ होंगे। लेकिन यह सोच वास्तविकता के धरातल से परे है, क्योंकि आज तेजी से बढ़ती महंगाई के जमाने में परिवार बड़ा होने से कमाने वाले हाथ ज्यादा होने पर जितनी आय बढ़ती है, उससे कहीं ज्यादा जरूरतें और विभिन्न उत्पादों की कीमतें बढ़ जाती हैं, जिनकी पूर्ति कर पाना सामर्थ्य से परे हो जाता है। इसलिए जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रमों की सफलता के लिए सर्वाधिक जरूरी यह है कि घोर निर्धनता में जी रहे ऐसे लोगों को परिवार नियोजन कार्यक्रमों के महत्व के बारे में जागरूक बनाने की ओर खास ध्यान दिया जाए, क्योंकि जब तक इस कार्यक्रम में इन लोगों की भागीदारी नहीं होगी, तब तक लक्ष्य की प्राप्ति संभव नहीं है।
हालांकि, हमारे यहां जनसंख्या वृद्धि दर के वर्तमान आंकड़ों की देश की आजादी के बाद के शुरुआती 2 दशकों से तुलना करें तो 1970 के दशक से जनसंख्या वृद्धि दर में निरन्तर गिरावट दर्ज की गई है, लेकिन यह गिरावट दर काफी धीमी है। लेकिन यदि हम चीन का उदाहरण सामने रखकर भारत में जनसंख्या वृद्धि में हो रही कमी को देखें तो हम जनसंख्या नियंत्रण के मामले में लाख कोशिशों के बावजूद चीन जैसी उपलब्धियां हासिल करने में सफल नहीं हो पाए हैं। दरअसल, हमारे यहां प्रायः सभी मामलों में राजनीतिक स्तर पर दृढ़ इच्छाशक्ति का अभाव स्पष्ट झलकता रहा है।
जनसंख्या वृद्धि की वर्तमान स्थिति की भयावहता के मद्देनजर पर्यावरण विशेषज्ञों की इस चेतावनी को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि यदि जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार में अपेक्षित कमी लाने में सफलता नहीं मिली तो निकट भविष्य में एक दिन ऐसा भी आएगा, जब लोगों के रहने के लिए धरती कम पड़ जाएगी। विश्वभर में अभी भी करीब डेढ़ अरब लोग ढलानों पर, दलदल के करीब, जंगलों में तथा ज्वालामुखी के क्षेत्रों जैसी खतरनाक जगहों पर रह रहे हैं। विश्व विकास रिपोर्ट के अनुसार प्राकृतिक संसाधनों से जितनी भी आमदनी हो रही है, वह किसी भी तरह पूरी नहीं पड़ रही। दशकों से यही स्थिति बनी है और इसे लाख प्रयासों के बावजूद सुधारा नहीं जा पा रहा। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2050 तक विश्व की दो तिहाई आबादी नगरों में रहने लगेगी और तब ऊर्जा, पानी तथा आवास की मांग और बढ़ेगी, जबकि बहुत से पर्यावरणविदों का मानना है कि वर्ष 2025 तक ही विश्व की एक तिहाई आबादी समुद्रों के तटीय इलाकों में रहने को विवश हो जाएगी और इतनी जगह भी नहीं बचेगी कि लोग सुरक्षित भूमि पर घर बना सकें।
इन सब बातों पर विमर्श करते हुए आज इस बात की आवश्यकता महसूस होने लगी है कि जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रम युद्धस्तर पर चलाए जाएं। भारत जैसे विकासशील देश में तो इसकी और भी ज्यादा जरूरत है, क्योंकि हमारे यहां ऐसे कार्यक्रम प्रायः बड़े जोशो-खरोश के साथ शुरू तो होते हैं, लेकिन अकसर शुरू होने के कुछ ही समय बाद टांय-टांय फिस्स होने लगते हैं। अतः जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण पाने के लिए चीन की तरह हमें अभी से कठोर और कारगर कदम उठाते हुए ठोस जनसंख्या नियंत्रण नीति पर अमल करने के लिए कृतसंकल्प होना होगा।

चीन की तरह बढ़ना होगा आगे
जनसंख्या पर रोक लगाने के मामले में चीन का उदाहरण सामने रखकर हमें आगे के लक्ष्य तय करने होंगे। एक दशक से भी अधिक समय से चीन की जनसंख्या स्थिर बनी हुई है, जिसका प्रमुख कारण यही है कि चीन सरकार ने औसत मृत्यु दर के आधार पर ही जन्मदर को भी नियंत्रित करने की व्यवस्था बनाते हुए छोटा परिवार रखने वाले लोगों के लिए विशेष सरकारी लाभों का प्रावधान किया, जिसके सार्थक परिणाम सामने आए हैं। ऐसी ही योजनाएं और कार्यक्रम हमारे देश में लागू किए जाने और उन पर गंभीरता से काम करने की
जरूरत है।

बढ़ती बेरोजगारी परेशानी
बढ़ती आबादी से बेरोजगारी की समस्या विकराल रूप धारण कर चुकी है। 1951 में देश में करीब 33 लाख लोग बेरोजगार थे, लेकिन आज बेरोजगारों की तादाद 20 करोड़ का आंकड़ा पार कर चुकी है। विगत दशकों में विभिन्न योजनाओं के माध्यम से नये रोजगार जुटाने के कई कार्यक्रम चलाए गए, लेकिन ये सभी कार्यक्रम ‘ऊंट के मुंह में जीरा’ साबित हुए। बेरोजगारी और गरीबी वे समस्याएं हैं, जिनके कारण भ्रष्टाचार, अराजकता जैसे अपराध पनपते हैं और जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण किए बिना इनका समाधान संभव नहीं है। विगत दशकों में यातायात, चिकित्सा, आवास सुविधाओं में सुधार हुए हैं, लेकिन बढ़ती आबादी के कारण ये सुविधाएं कम पड़ रही हैं।


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