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चांद पर 50 साल

Posted On July - 22 - 2019

अभिषेक कुमार सिंह

यह लुनर रोविंग व्हीकल वर्ष 1971-72 में चंद्रमा पर अमेरिकी अपोलो मिशन के तहत इस्तेमाल किया गया था।

एक इंसान की जिंदगी में 50 साल का मतलब क्या होता है? 100 साल की उम्र के वैदिक आख्यानों को सही मानें तो यह आधी जिंदगी पार होने का मामला बनता है। लेकिन बात अगर किसी अंतरिक्षीय पिंड की खोज की हो तो यह एक दिलचस्प किस्से में तब्दील हो जाता है। बात हमारे सबसे नजदीकी अंतरिक्षीय पड़ोसी यानी पृथ्वी के प्राकृतिक उपग्रह चंद्रमा की है, जिस पर इंसान के पांवों की पहली छाप अब से ठीक 50 बरस पहले 20 जुलाई, 1969 को पड़ी थी। अमेरिकी एयरफोर्स के 2 पायलट नील आर्मस्ट्रांग और बज एल्डि्रन को यह सौभाग्य मिला था कि वे पृथ्वी के प्रतिनिधि के रूप में चांदी सी चमकती एक ऐसी धरती पर उतरें, जो हमसे 3 लाख 84 हजार किलोमीटर दूर अंतरिक्ष में स्थित है। यूं बात जब उम्र की चली है तो बता दें कि पृथ्वी से छिटककर एक अलग पिंड के रूप में विकसित हुए चंद्रमा की आयु करीब 4.51 अरब साल ठहरती है। ब्रह्मांड की उम्र 6 अरब साल के मुकाबले यह काफी कम है और इस लिहाज से भी चंद्रमा को काफी जवान कहा जा सकता है। इधर चांद की जवानी का किस्सा जरा अलग है। असल में, एक दौर था जब दुनिया के दो मुल्कों- अमेरिका और रूस (तत्कालीन सोवियत संघ) में शीतयुद्ध काल के दौर में अंतरिक्ष को छूने और चंद्रमा को हासिल करने की होड़ थी। यह होड़ अमेरिकी वैज्ञानिकों के चंद्रमा पर पहुंचने और इस कामयाबी के बल पर स्पेस के कई अलहदा मामलों में रूस से मीलों आगे निकलने के बाद थम-सी गई और चांद पूरी दुनिया के ही एजेंडे से बाहर चला गया। अमेरिकियों का झंडा चंद्रमा पर लहराने के साथ रूस ने उसे पाने की इच्छा पूरी तरह त्याग दी तो खुद वियतनाम युद्ध में उलझे और अंतरिक्ष कार्यक्रमों पर बढ़ते खर्च के चलते चांद पर जाने के कार्यक्रम को अमेरिका ने भी 1972 के बाद छोड़ दिया। उधर, रूस ने भी जून 1974 में अपने मून मिशन को बंद करने का ऐलान कर दिया और 18 अगस्त 1976 में अपने रोबोटिक प्रोब लूना-24 चांद पर भेजने और 22 अगस्त 1976 को उसकी वापसी के बाद उसे स्थगित कर दिया था। लेकिन बीते एक दशक में चांद दुनिया की निगाह में एक बार फिर चढ़ा है। भारत, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और इस्राइल कोई न कोई मिशन चंद्रमा पर भेजना चाहते हैं तो उधर अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा ने भी ऐलान कर दिया है कि 2024 में एक बार फिर उसका इरादा चंद्रमा पर इंसानों को उतारने का है।

अब क्या नया खोजेंगे
वैसे जहां तक चांद को जानने-समझने और उसकी वैज्ञानिक खोज की बात है तो यह काम हमारा मुल्क एक दशक पहले वर्ष 2008 में चंद्रयान-1 को चंद्रमा के बिल्कुल करीब भेजकर कर चुका है। अब एक बार फिर इसरो 22 जुलाई को चंद्रयान-2 को चांद की धरती पर उतारने के लिए रवाना करने जा रहा है। भारत के अलावा, चीन की दिलचस्पी भी चंद्रमा में काफी बढ़ी है। चीन ने 2012 में अपना चांग-ई-3 यान चंद्रमा पर भेजा था, जो 1976 के सोवियत संघ के लूना-24 के बाद चंद्रमा पर उतरने वाला पहला स्पेसक्राफ्ट था। साल के अंत तक चीन एक और मिशन चंद्रमा पर भेजने वाला है। इस्राइल ने भी 22 फरवरी 2019 को अपना चंद्रयान बेरेशीट रवाना किया था, जो 11 अप्रैल 2019 को चंद्रमा पर उतरते वक्त नष्ट (क्रैश) हो गया था। इसी तरह, जापान ने भी 14 सितंबर 2007 को अपना पहला लूनर ऑर्बिटर सेलेने-1 छोड़ा था और अब 2020 में पहला मून लैंडर और मून रोवर चंद्रमा पर भेजने की तैयारी कर रहा है। जापान का फोकस चंद्रमा पर यह संभावना तलाश करना है कि कैसे चांद लंबे स्पेस मिशनों के लिए एक पड़ाव बन सकता है और कैसे वहां इंसानी रिहाइश की कोई गुंजाइश बन सकती है, जिससे वहां लंबी अवधि वाले वैज्ञानिक प्रयोग-परीक्षण किए जा सकें और चांद के खनिजों के इस्तेमाल की राह निकाली जा सके। सिर्फ जापान ही नहीं, पूरी दुनिया मान रही है कि अंतरिक्ष के सबसे करीबी पिंड- चंद्रमा को अच्छी तरह जाने बिना अंतरिक्ष के दूरस्थ ठौर-ठिकानों तक पहुंचना नामुमकिन है। ऐसे में मून मिशन ही इंसान के भावी अंतरिक्ष कार्यक्रमों की ठोस नींव रखने और तैयारी कराने में मददगार साबित हो सकते हैं। इन मून मिशनों से चंद्रमा पर पानी व खनिजों की मौजूदगी का पता लगाने की कोशिश की जाएगी और उसके वायुमंडल की बारीक पड़ताल की जाएगी, जिससे वहां इंसानी बस्तियां बसाने के सपने को साकार करने की संभावना तलाश की जा सके। इसकी एक शुरुआत नासा ने भी की है। वर्ष 2013 में नासा द्वारा छोड़े लूनर एटमॉस्फियर एंड डस्ट एनवायरनमेंटल एक्सप्लोरर (एलएडीईई) से मिली जानकारियों के आधार पर नासा के साइंटिस्टों ने दावा किया था कि इससे यह पता चला था कि धूल चंद्रमा के आसमान में कैसे पहुंची। चंद्रमा के वायुमंडल की संरचना पृथ्वी से अलग क्यों है, एलएडीईई से इसके भी कुछ जवाब मिले थे। अब जिस तरह से चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर दुनिया में पहली बार चंद्रयान-2 को उतारने की योजना है, उससे कई महत्वपूर्ण जानकारियां मिलने की उम्मीद इसरो साइंटिस्ट कर रहे हैं।

हीं भूलेगी अपोलो-11 की उड़ान
भारत के आज के स्पेस प्रोग्रामों को देखकर दुनिया का कोई भी मुल्क यह बता सकता है कि इन कार्यक्रमों से असल में हमारा देश तीसरी दुनिया के ऐसे मुल्क की छवि मिटाना चाहता है, जो विज्ञान और तकनीक के मामले में रूस-अमेरिका जैसे देशों से किसी मामले पिछड़ा हुआ और विकसित देशों का पिछलग्गू या मोहताज है। भारत ने चांद के अलावा मंगल तक अपने मिशन भेजकर यह संदेश दुनिया को दिया है कि भले ही वह महाशक्ति नहीं है, पर उसकी ताकत को किसी से कम करके न आंका जाए। आश्चर्य नहीं कि अपनी ताकत जताने का यही भाव बीती सदी के छठे दशक में सोवियत संघ और अमेरिका में मौजूद था। यह दूसरे विश्वयुद्ध के बाद शीत युद्धकाल का दौर था, जिसमें परमाणु अस्त्र-शस्त्र बनाते हुए एक-दूजे से आगे निकलने की होड़ चल रही थी। तत्कालीन सोवियत संघ यानी आज के रूस ने एक अलग रास्ता अपनाया। उसने महाशक्ति बनने के लिए अंतरिक्ष का सहारा लिया। सोवियत संघ ने इसकी शुरुआत 4 अक्तूबर, 1957 को की, जब उसने दुनिया का पहला कृत्रिम उपग्रह स्पुतनिक-1 पृथ्वी की कक्षा में भेजकर दुनिया को चकित कर दिया। यही नहीं, उसने अपने अंतरिक्ष यात्री यूरी गगारिन को 12 अप्रैल, 1961 को बाहरी अंतरिक्ष में सफलतापूर्वक भेजकर सनसनी मचा दी। हालांकि, अमेरिका को इस कीर्तिमान की बराबरी करने में ज्यादा वक्त नहीं लगा, एक महीने के अंदर 5 मई 1961 को उसने भी अपने एलन शेपर्ड को स्पेस में पहुंचा दिया। लेकिन असली जंग चांद को छूने की थी। इस संबंध में तत्कालीन रूस काफी गंभीर था, और उसने 1959 में अपने यान लूना-1 को चंद्रमा की सतह पर उतार कर काफी बढ़त ले ली थी। इसके बाद लूना-2 (1962), लूना-9 और लूना-13 को वर्ष 1966 में चद्रमा पर उतारकर और उसकी सतह के फोटो धरती तक भेजकर अमेरिका के सामने यह चुनौती पेश कर दी थी कि वह भी ऐसा करके दिखाए। अमेरिका ने इस चुनौती का माकूल जवाब दिया। पहले तो 1962 में अमेरिकी यान रेंजर-4 को चंद्रमा पर सफलता के साथ उतारा और फिर सर्वेयर यान के लगातार 5 अभियान भेजकर अपोलो शृंखला के स्पेस क्राफ्टों की राह आसान कर दी।

मानवता की ऊंची छलांग
इसके बाद अपोलो के उन मिशनों का दौर आया, जिन्होंने मानव इतिहास के पन्नों में एक नया अध्याय ही शुरू कर दिया। अमेरिका ने सैटर्न-5 रॉकेट के विकास और उनकी 13 असफलताओं के बाद यह महारत हासिल कर ली थी कि वह चंद्रमा तक भेजने लायक वजनी यान में इंसानों को बैठाकर पृथ्वी से सफलता के साथ रवाना कर सकता था। हालांकि, अभी भी यह पक्का नहीं था कि जब अपोलो में कोई इंसान चांद तक जाएगा तो वह उसकी सतह पर कैसे उतरेगा, वहां के वायुमंडल की चुनौतियों के कैसे पार पाएगा और आखिर वापस पृथ्वी पर कैसे आएगा। इन सारे सवालों के जवाब 16 जुलाई 1969 को कैनेडी स्पेस सेंटर से 8 दिन के मून मिशन पर रवाना किए गए अपोलो-11 यान से मिलने थे, जिसमें सवार होकर अमेरिकी एयरफोर्स के दो पायलट नील आर्मस्ट्रांग और एडविन बज एल्डि्रन के अलावा यान के कमांड मॉड्यूल में माइकल कोलिंस गए थे। अपोलो-11 20 जुलाई, 1969 को चंद्रमा की कक्षा में पहुंच गया और यान से अलग हुए ईगल नामक मून लैंडर से आर्मस्ट्रांग और एल्डि्रन सी-ऑफ ट्रैंक्विलिटी नामक स्थान पर उतर गए। सबसे पहले नील आर्मस्ट्रांग ने कोआर्डिनेट यूनिवर्सल टाइम के मुताबिक 8 बजकर 26 मिनट पर अपना बायां पैर चंद्रमा की धरती पर रखते हुए कहा कि हालांकि मानव का यह छोटा-सा कदम है, लेकिन मानवता के लिए यह सबसे ऊंची छलांग है। रातों को चांदनी बिखेरने वाले चंद्रमा से इंसान की यह सीधी मुलाकात थी। इसके करीब, 19 मिनट बाद एल्डि्रन भी यान से बाहर आकर आर्मस्ट्रांग के साथ चहलकदमी करने लगे। इस दौरान चंद्र सतह से 96 किलोमीटर ऊपर कमांड मॉड्यूल (परिक्रमा यान) कोलंबिया परिक्रमा करता रहा, जिसमें माइकल कोलिंस मौजूद रहकर मिशन की बागडोर संभाले हुए थे। प्रथम चंद्रयात्री नील आर्मस्ट्रांग ने सतह पर अपना पहला कदम रखने के बाद कवियों की कल्पनाओं के उस चांद की सतह को निहारा और कहा, ‘यहां आसपास बड़े-बड़े पत्थर हैं। चंद्रमा की सतह बहुत सख्त है और मिट्टी रेतीली है।’ जबकि एल्डि्रन ने बताया कि जहां वे उतरे हैं, वहां से कुछ दूरी पर उन्हें बैंगनी रंग की एक चट्टान दिख रही है।’ चांद पर 21 घंटे 31 मिनट तक रुकने के बाद 21 जुलाई, 1969 को उन्होंने वापसी की राह पकड़ ली।
1969 से 1972 तक अमेरिका ने अपोलो के 6 मानव मिशन चंद्रमा पर भेजे। इनमें 18 अंतरिक्ष यात्री चंद्रमा तक गए। इनमें 12 ने चंद्रमा की सतह पर पांवों के निशान छोड़े। अब तक चांद पर उतरने वाले आखिरी वैज्ञानिक (अंतरिक्ष यात्री) ई सेरनैन और हैरिसन जैक स्मिट थे, जो अपोलो-17 से 11 दिसंबर, 1972 को वहां पहुंचे थे। यह यान 14 दिसंबर, 1972 को पृथ्वी की तरफ वापस चला था और उसके बाद कोई इंसान चांद पर नहीं गया है। यहां तक कि पृथ्वी के निचले ऑर्बिट (निचली कक्षा) को पार कर बाह्य अंतरिक्ष में कदम भी नहीं रखा है, हालांकि स्पेस पर्यटन के तहत अंतरिक्ष की सरहद को जरूर छुआ गया है।

2030
तक प्राइवेट स्पेस एजेंसियां चंद्रमा को एक टूरिस्ट डेस्टिनेशन में तब्दील करना चाहती हैं। वे चाहती हैं  कि चंद पैसे वाले लोगों को चांद  की सैर पर ले जाएं और  कमाई करें।

चंद्रयान-1 से क्या पाया
हमारे देश में वर्ष 2008 में जब अपना पहला मून मिशन चंद्रयान-1 भेजा था तो पूरी दुनिया ने दो अहम सवाल उठाए थे। पहला यह कि अब चांद पर क्या खोजा जाना बाकी है, जिसके लिए मून मिशन भेजा जा रहा है। दूसरे इतने महंगे अभियान पर एक गरीब देश के आगे बढ़ने का औचित्य क्या है। चंद्रयान ने करीब एक साल तक चंद्रमा की परिक्रमा काटकर जो आंकड़े जमा किए थे, उनके आधार पर चंद्रमा के जन्म और बनावट से जुड़ी एक परिकल्पना को एक नया आधार मिला था। असल में यह माना जाता रहा है कि हमारे सौरमंडल का निर्माण शुरू होने के लगभग सात करोड़ वर्ष बाद ऊर्जा की बड़ी भारी मात्रा एक पिंड के रूप में जमा होनी शुरू हुई, जो उस वक्त पिघले हुए लावे के समुद्र जैसी थी। यानी कुल चंद्रमा द्रवीभूत (मॉलेटन) रूप में था। पर जैसे-जैसे चंद्रमा गर्म से ठंडा हुआ, उसकी ऊपरी परत में यह लावा चट्टानों के रूप में (एनॉर्थाइट) जमा हो गया। ये चट्टानें चंद्रमा के ऊंचाई वाले इलाकों की जमीन की ऊपरी परत में मिलती हैं। चंद्रयान-1 के एक अहम उपकरण- मून मिनरोलॉजी मैपर ने जो डाटा भेजा, उससे इस मैग्मा ओसन परिकल्पना की पुष्टि हुई। उसके चित्रों से एनॉर्थाइट की मौजूदगी साबित हुई। इस पर नासा से जुड़ी एक साइंटिस्ट कार्ल पीटर्स ने कहा भी भारत के चंद्रयान-1 ने एक बार फिर चांद के मॉलेटन होने की तसदीक कर दी। इस जानकारी को यह बेहद महत्वपूर्ण माना गया, क्योंकि इस जानकारी का फायदा भविष्य में चंद्रमा पर खनिजों की व्यापक खोजबीन में मिल सकेगा और चंद्रमा को लंबी अंतरिक्ष यात्राओं के पड़ाव के रूप विकसित करने में मदद मिल सकेगी। इन जानकारियों के आधार पर इसरो के साइंटिस्टों ने दावा किया कि चंद्रयान-1 अपने मिशन में 95 फीसदी तक कामयाब रहा। इसी तरह, इस सवाल का जवाब भी मिला था कि क्या चंद्रमा लंबे स्पेस मिशनों के पड़ाव की उपयुक्त जगह बन सकता है और क्या वहां इंसानी बस्तियों की बसाहट की कोई गुंजाइश बनती है। असल में हब्बल टेलीस्कोप से मिले चित्रों के आधार पर नासा ने चंद्रमा की तीन जगहों को मानव बस्तियों के लिए उपयुक्त स्थानों के रूप में चिन्हित किया था। इनमें से दो जगहें वे हैं, जहां 1971 में अपोलो-15 और 1972 में अपोलो-17 के अंतरिक्ष यात्री पहुंचे थे। अपोलो-15 के अंतरिक्ष यात्री डेविड आर स्कॉट, जेम्स बी इरविन और अल्फ्रेड एम वॉर्डन चंद्रमा पर मौजूद हैडली रिले नामक एक नहरनुमा संरचना के पास उतरे थे और लूनर रोवर की सहायता से उस इलाके की खाक छानी थी। गरीबों की फिक्र छोड़कर देश ऐसे महंगे मून मिशन पर पैसा फूंकने का उपक्रम कर रहा है, जिससे कुछ नया नहीं मिल सकता, इस आलोचना के जवाब में चंद्रयान-1 से जो जानकारियां मिलीं, उन्हें पूरी दुनिया ने सराहा था। चंद्रयान से मिले डाटा, चित्रों और अन्य जानकारियों के विश्लेषण से इस मिशन की उपयोगिता साबित हुई थी।

चंद्रयान-2
इस बार चांद पर उतरेगा हमारा मून लैंडर
भारत अपना चंद्रयान-2 मिशन सोमवार 22 जुलाई को भेजेगा। इस दिन आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से 640 टन के रॉकेट जीएसएलवी एमके-3 से 3890 किलोग्राम वजनी चंद्रयान-2 को रवाना किया जाएगा। यह भारत को एक नयी ऊंचाई पर ले जाएगा। इस मिशन की खास बात यह है कि चंद्रयान-2 उस जगह पर उतरेगा, जहां अब तक दुनिया के किसी मुल्क का कोई मिशन नहीं गया है। यह जगह है चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुव। यह जगह जोखिमों से भरी है, क्योंकि यहां ज्वालामुखी हैं और जमीन ऊबड़-खाबड़ है। यहां 2 ज्वालामुखी मैनज़ीनस सी और सिमपेलियस एन हैं, जिनके बीच में चंद्रयान का रोवर उतरेगा। इसकी बजाय चंद्रमा के भूमध्यरेखीय इलाके की जमीन शांत और सपाट है, जहां अब तक के मून मिशन उतरे हैं। एक खास बात और है। वह यह कि पहली बार भारत चंद्रमा पर अपने यान की सॉफ्ट लैंडिंग कराने जा रहा है। चंद्रयान-1 चांद पर उतरा नहीं था, सिर्फ परिक्रमा की थी। जबकि चंद्रयान-2 का मून लैंडर ‘विक्रम’ चांद की सतह पर उतारा जाएगा।

6 सितंबर
को हमारा सेटेलाइट चंद्रमा के दक्षिणी पोल पर लैंड करेगा, जहां अब तक कोई नहीं पहुंच सका है।

प्रज्ञान रोवर
चंद्रयान-2 के रोवर काे प्रज्ञान नाम दिया गया है। यह छह पहियों वाला रोबोट वाहन है। इसका वजन 27 किलो है। यह 500 मीटर तक की यात्रा कर सकता है और केवल लैंडर के साथ संचार कर सकता है।

ये 2 उद्देश्य इसके दो उद्देश्य हैं। पहला, रोबो मून रोवर- प्रज्ञान को सही सलामत वहां पहुंचाना, जिससे वह एक मून-डे यानी पृथ्वी के 14 दिनों तक चांद की सतह का नक्शा तैयार करने वाले आंकड़े जमा कर सके, चंद्रमा के बाहरी वातावरण को स्कैन कर सके और पानी की उपस्थिति का पता लगा सके। ऐसा होने पर भारत रूस, अमेरिका और चीन के बाद चौथा देश होगा। चंद्रयान-2 पहले भारतीय मिशन यानी चंद्रयान-1 की पानी की खोज को आगे बढ़ाएगा।

3.84 लाख किलोमीटर का सफर तय करेगा सेटेलाइट

1000 करोड़ रुपये की लागत आएगी मिशन पर

 


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