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कालका जी इतिहास और आस्था का संगम

Posted On July - 7 - 2019

तीर्थाटन

अमिताभ स.
मंदिर के नाम पर समूचे इलाके के नामकरण होने की मिसालें दिल्ली में एक-दो ही हैं। पहली है झंडेवालान, जिसका नाम झंडेवाला मंदिर से पड़ा है। दूसरी है कालका जी। मां दुर्गा के एक रूप काली माता का मंदिर ‘कालका जी’ पांडवों के समय का माना जाता है। बताते हैं कि इस मंदिर के भवन का निर्माण इन्द्रप्रस्थ की स्थापना के साथ ही हुआ था। इसीलिए कुछ लोग इसे इन्द्रप्रस्थ देवी का मंदिर भी कहते हैं। मान्यता है कि महाराजा युधिष्ठिर के आग्रह पर भगवान श्री कृष्ण ने माता के सिद्धपीठ की स्थापना की थी। महाभारत के युद्ध में विजयी होने पर युधिष्ठिर ने यहां मां भगवती की अाराधना की थी।
मंदिर में मां के पिंडी रूप में दर्शन होते हैं। मंदिर अष्टकोण है। इसमें 12 द्वार हैं और बाहर की परिक्रमा में 36 द्वार हैं। मंदिर के बिल्कुल सामने बाहरी परिक्रमा से सटा है शंकर जी का मंदिर। उत्तर दिशा में गणेश जी की प्रतिमा है। पिछली ओर हनुमान जी और भैरव जी के मंदिर हैं। मंदिर के सामने 84 घंटे हैं।
कालका जी मंदिर जहां है, उस जगह का पौराणिक नाम सूर्यकोट है। अरावली पर्वतों की शृंखला यहीं से शुरू होती है। मंदिर का दरवाजा मुगलकालीन है। ईंटों का द्वार मेहराबनुमा है। ‘इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हैरिटेज’ की किताब ‘दिल्ली द बिल्ड हैरिटेज’ में दर्ज है कि मंदिर 1764 में बना है। हालांकि, 19वीं और 20वीं सदी में इसमें भवन जुड़ते रहे हैं। धर्मशाला का निर्माण 1845 में हुआ बताते हैं।
कालका जी मंदिर से संबंधित एक पौराणिक कथा है- भरतपुर के महाराजा सूरजमल ने 1768 में दिल्ली विजय से पहले भगवती पूजन किया था। विजय के फौरन बाद उन्होंने यहां भवन बनवाया था। कई चबूतरों पर महाराज सूरजमल के स्मृतिचिन्ह हैं। महाराजा सूरजमल के परिवार के एक सदस्य केदार सिंह का नाम भी मंदिर से जुड़ा है।
यह मंदिर समय-समय पर अलग-अलग नाम से जाना जाता रहा है। अकास कालका देवी मंदिर, इन्द्रप्रस्थ देवी मंदिर, काली माई मंदिर, जयंती काली मंदिर इसके कुछ नाम हैं। बशीरूद्दीन अहमद अपनी किताब ‘वाक्यात-ए-दारूल हुकूमत-ए-दिल्ली’ के द्वितीय भाग में बताते हैं कि मुगल राज के दौरान इस मंदिर का नाम ‘अकास कालका देवी मंदिर’ था, क्योंकि इसका अकास यानी गोपुरम बादशाह अकबर शाह सानी (अकबर-द्वितीय) के पेशकार राजा मिर्जा केदारनाथ ने बनवाया था। तभी से धीरे-धीरे आसपास की बस्तियों का नाम भी कालका जी हो गया।
मां ने असुराें का किया था नाश
कालका जी नाम काली देवी के सन्दर्भ में है। एक पौराणिक कथा है कि असुरों से परेशान होकर देवताओं ने ब्रह्मा जी से मदद मांगी। ब्रह्मा जी ने देवताओं को देवी पार्वती की शरण में जाने की राय दी।  देवताओं की व्यथा सुनकर देवी पार्वती ने असुरों के संहार के लिए कौशिकी देवी को प्रकट किया। कौशिकी देवी ने तमाम असुरों का वध कर दिया। लेकिन, इसके साथ ही एक विकराल समस्या उठी। जमीन पर जहां-जहां असुरों का खून गिरा, वहां-वहां राक्षस पैदा हो गये। इस पर देवी पार्वती की शक्ति से कौशिकी देवी की भौहों से काली देवी का िवकराल रूप प्रकट हुआ। बेहद विशाल मुंह वाली काली देवी ने सभी राक्षसों का अंत कर दिया और उनके रक्त की एक बूंद भी पृथ्वी पर नहीं गिरने दी। नतीजा यह हुआ कि राक्षस दोबारा पैदा ही नहीं हो सके। अंततः पार्वती देवी की जय-जयकार हुई और देवताओं को दैत्यों से छुटकारा मिला।
कालका जी मंदिर में मिश्री के प्रसाद का चलन सदियों से जारी है। नवरात्र के अलावा रोज सैकड़ों भक्त मां के दर्शन करने उमड़ते हैं। ‘जय माता दी’ के जयकारों से मंदिर गूंजित रहता है, लेकिन गंदगी का आलम और भिखारियों का जमघट भक्तों को अखरता है।


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