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कारगिल युद्ध से उपजी तल्ख सच्चाइयां

Posted On July - 11 - 2019

ठीक दो दशक पहले भारतीय सेना की तीन बटालियनों को कश्मीर के कारिगल सेक्टर में अनेक चोटियों पर डटे पाकिस्तानी घुसपैठियों पर धावा बोलकर इन्हें फिर से अपने कब्जे में लेने का काम सौंपा गया था। इनमें टाइगर हिल सबसे ऊंची चोटी है। यह शिखर श्रीनगर को लेह से जोड़ने वाले राजमार्ग के रास्ते में है और अत्यंत ऊंचा होने की वजह से वहां बैठकर दूर-दूर तक निगरानी की जा सकती है। टाइगर हिल को फिर से अपने अधिकार में लेने का सैन्य अभियान मई 1999 के आखिरी हफ्ते में शुरू किया गया था। ठीक इसी वक्त साथ लगती तोलोलिंग चोटी के लिए भी अभियान शुरू हो गया था और 3-4 जून 1999 को सफलता मिली थी। टाइगर हिल और तोलोलिंग पर हार मिलते ही तत्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ आननफानन में वाशिंगटन पहुंचे और 4 जुलाई को, जो अमेरिका का स्वतंत्रता दिवस है, अपनी फौज वापिस बुलाने पर सहमति दी थी। यह काम अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन द्वारा भारत-पाक के बीच मध्यस्थता करने की पेशकश को अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा नकारे जाने के बाद करना पड़ा था। वह भी उस समय जब क्लिंटन प्रशासन भारत के परमाणु कार्यक्रम पर ‘रोक लगाने, वापिस लेने और खत्म करने’ पर अड़ा था।

जी. पार्थसारथी

वाजपेयी सरकार के समय भारत ने परमाणु परीक्षण किया था, जिसके चलते अमेरिका सहित अनेक देश भारत से नाराज थे। माना जाता है कि पोखरण परीक्षण के बाद पाक ने कारगिल सेक्टर में घुसपैठ करनी शुरू कर दी थी। कहा जाता है कि नवाज शरीफ सरकार को पहले इस घटनाक्रम का भान नहीं था, लेकिन जनरल मुशर्रफ द्वारा प्रधानमंत्री को जानकारी दिए जाने के बाद वह भी इस कारनामे में शामिल रहे। प्रचलित धारणा के विपरीत मुशर्रफ ने नवाज शरीफ को एक से ज्यादा बार अपनी योजना के बारे में जानकारी दी थी, जिसमें स्कर्दू स्थित पाकिस्तानी सेना के क्षेत्रीय मुख्यालय पर प्रधानमंत्री की आमद के समय हुई बातचीत भी शामिल है।
भारत की खुफिया एजेंसियों को अपनी सीमा के अंदर हुई घुसपैठ का पता लगभग एक साल बाद ही लगा था। इसी बीच प्रधानमंत्री वाजपेयी ने फैसला किया था कि अमेरिका के नेतृत्व में पड़ रहे अंतरराष्ट्रीय दबाव से निपटने में एक रास्ता पाकिस्तान के साथ शांति स्थापना की कोशिश करना है, इसलिए तय किया गया कि एक बड़े मैत्री संकेत के तौर पर वाजपेयी लाहौर-दिल्ली बस सर्विस का आरंभ करने हेतु खुद पाकिस्तान जाएंगे। जब वे लाहौर पहुंचे, उस वक्त उन्हें कारगिल समेत समूची नियंत्रण रेखा पर पाकिस्तानी सेना क्या खेल कर रही है, इस बारे जरा भी पता नहीं था। उधर नवाज़ शरीफ मैत्री का नाटक करते रहे। वाजपेयी जी की इस्लामाबाद यात्रा से कुछ महीने पहले भारतीय दूतावास में अपनी नियुक्ति होने पर मैंने वहां माहौल में दोगलेपन को पाया था। नवाज शरीफ के कुछ नजदीकी जैसे कि सूचना मंत्री मुशाहिद हुसैन एक ओर मैत्री की बात करते थे तो ठीक इसी वक्त पाकिस्तान के गुरुद्वारों में दुनियाभर से आने वाले सिख तीर्थयात्रियों को भारत के खिलाफ भड़काने में लिप्त थे, वह खुद और पंजाब के गवर्नर भी लश्कर-ए-तैयबा के सरगना मुहम्मद सईद के साथ राबता बनाए हुए थे।
वाजपेयी जी, जिनकी इज्जत पाकिस्तान में उस वक्त भी थी और आज भी है, का स्वागत राजनेताओं ने बड़ी गर्मजोशी से किया गया था, तथापि आगमन स्थल पर पाकिस्तानी सेना के तीनों अंगों के प्रमुख नदारद थे। अलबत्ता पाकिस्तानी पंजाब के राज्यपाल के आधिकारिक निवास पर इनकी मुलाकात वाजपेयी जी से हुई थी, जहां उन्हें ठहराया गया था। लाहौर में हुए एक सार्वजनिक स्वागत समारोह में वाजपेयी जी ने जादुई भाषण दिया था, जिससे वहां मौजूद श्रोता अभिभूत हो उठे थे लेकिन पाकिस्तानी सेना और राजनीतिक संस्थानों का बड़ा हिस्सा हमेशा की तरह कुछ अलग ही धारणा पाले हुए था। विवेक काटजू जो उस वक्त पाकिस्तान संबंधी मामलों के मुखिया थे, ने समझौता शर्तों पर दृढ़ता और बड़े कौशल से मोलभाव किया था। लेकिन वाजपेयी जी की यात्रा के पहले और बाद वाले महीनों में जम्मू-कश्मीर में आतंकी हमलों में कोई कमी दर्ज नहीं हुई थी।
कारगिल युद्ध जीतने में भारतीय सेना, विशेषकर इसके युवा अफसर और जवानों द्वारा रणभूमि में दिखाया शौर्य देश के धन्यवाद का सुपात्र है। पाकिस्तान ने 11 साल बाद जाकर माना था कि इस लड़ाई में उसके 453 सैनिक मारे गए हैं। यह अंधेरगर्दी वह इसलिए भी कर पाया क्योंकि मारे गए फौजियों में अधिकांश गिलगित-बाल्टिस्तान से संबंध रखने वाले शिया सैनिक थे। पाकिस्तान के तत्कालीन विदेश सचिव शमशाद अहमद ने पहले-पहल अपने बड़बोलों में इस युद्ध में परमाणु बम की धमकी दी थी, उसे भारत ने शांत भाव से रहकर बड़ी दक्षता से संभाल लिया था। भारत को इस लड़ाई में 527 जवानों की क्षति हुई थी और 1,363 जख्मी हुए थे।
मई के तीसरे सप्ताह में प्रधानमंत्री वाजपेयी सेना के युद्ध संचालन कक्ष पहुंचे थे जहां तत्कालीन सेनाध्यक्ष वेद कुमार मलिक ने उन्हें जानकारी दी थी। इस बैठक में मैं भी उपस्थित था। जनरल मलिक ने वाजपेयी को भरोसा दिया था कि हमारी सेना तमाम पाकिस्तानी घुसपैठियों को खदेड़ देगी। जनरल मलिक ने अभियान में वायुसेना की मदद की जरूरत जताई थी। इस प्रस्ताव को वाजपेयी जी ने उसी दिन मंजूरी दे दी थी लेकिन इस शर्त के साथ कि भारतीय लड़ाकू जहाज सीमा नियंत्रण रेखा को पार नहीं करेंगे।
मुझे इस्लामाबाद तुरंत वापिस पहुंचने को कहा गया था क्योंकि हवाई हमले अगले दिन सुबह से शुरू होने वाले थे। पाकिस्तान को अहसास हो गया था कि नाहक दुस्साहस दिखाना ठीक नहीं रहेगा, इसीलिए उसके विमानों ने सीमा नियंत्रण रेखा के बहुत पास आने से गुरेज बनाए रखा था। भारत को दो लड़ाकू जहाजों की क्षति उठानी पड़ी थी, इनमें एक मिग-21 को उड़ा रहे स्कवाड्रन लीडर आहूजा वीरगति को प्राप्त हुए थे और मिग-27 के चालक फ्लाइट लेफ्टिनेंट नचिकेता गिरते जहाज से निकले थे लेकिन पैराशूट पाकिस्तानी सीमा के अंदर उतरने पर पकड़े गए थे। पाकिस्तान ने उस वक्त भी खेल खेला जब उसने अपने विदेश विभाग में एक बड़ी मीडिया वार्ता का आयोजन करके सीमा पर जारी युद्ध के बावजूद अपनी ‘दरियादिली’ का दिखावा करते हुए नचिकेता को वापिस सौंपने की पेशकश की थी। इस मौके पर मेरी उपस्थिति चाही थी, लेकिन मैंने यह कहते हुए जाने से इनकार कर दिया था कि यह नाटक ‘मीडिया के सामने प्रपंच’ है, जो बंदी बने भारतीय वायुसेना अधिकारी की गरिमा को ठेस पहुंचाने के मकसद से है।
कारगिल युद्ध ने हमारे सामने अनेक तल्ख सच्चाइयां भी उघाड़ कर रख दी थीं। पहली, पाकिस्तान की असली शासक बनी हुई सेना 1971 के युद्ध में मिली करारी शिकस्त की बेइज्जती की टीस कभी भी नहीं भुला पाएगी और किसी न किसी रूप में इसका बदला लेने की फिराक में रहेगी। दूसरा, अपने देश में इसका परोक्ष राज बना रहे, इस हेतु भारत के साथ शत्रुता का माहौल सदा बनाए रखना एक आवश्यक अवयव की तरह है। दिल्ली-लाहौर बस सेवा और समझौता एक्सप्रैस यात्रियों को सीमा के आरपार ला-ले जाकर आज भी अपने मकसद को बखूबी अंजाम दे रही हैं। जहां पाकिस्तानियों को चीख-चीखकर यह यकीन दिलावाया जाता है कि कश्मीरियों को ‘आजादी’ दिलवाने के अभियान में जीत होने ही वाली है।
आइए, कारगिल युद्ध के 20 साल पूरे होने के अवसर पर इसकी याद में पूरी संजीदगी और यथेष्ठ तरीके से अपनी कृतज्ञता पेश करें। जनरल वी. पी. मलिक और उनके सैनिकों के अलावा एयर चीफ मार्शल अनिल यशवंत टिपनिस और उनके लड़ाकू विमान चालकों एवं अन्य सभी वीरों का राष्ट्र की ओर से बहुत-बहुत आभार और अभिनंदन।

लेखक पूर्व राजनयिक हैं।


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