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एसवाईएल पर उम्मीदें

Posted On July - 11 - 2019

राजनेता जनहित में आम सहमति बनायें
सुप्रीमकोर्ट ने एक बार फिर केंद्र, हरियाणा और पंजाब सरकार को निर्देश दिया है कि तीनों पक्ष मिलकर सतलुज-यमुना लिंक नहर यानी एसवाईएल विवाद का समाधान निकालने का प्रयास करें। जस्टिस अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने तीनों राज्यों को सुप्रीमकोर्ट का आदेश लागू करवाने पर चर्चा करने को कहा है। हरियाणा एवं पंजाब सरकारों को वरिष्ठ अधिकारियों की कमेटी गठित करने को कहा है ताकि अदालत के आदेशों की पालना सुगम हो सके। कोर्ट ने चेताया है कि यदि बातचीत का कोई नतीजा नहीं निकलता तो कोर्ट आदेश पारित करेगी। दरअसल, इस बाबत पंजाब सरकार आनाकानी करती आ रही है और उसकी दलील है कि वह अपने किसानों के हितों की अनदेखी नहीं कर सकती। साथ ही मामले की सुनवाई एक ट्रिब्यूनल के जरिये करवाने की मांग पंजाब करता रहा है। यह विडंबना है कि पिछले लगभग चार दशक से एसवाईएल के मुद्दे पर जमकर राजनीति होती रही है। हरियाणा के हिस्से का निर्माण पूरा होने तथा शीर्ष अदालत के आदेशों के बावजूद पंजाब के राजनीतिक दल किसानों की भावनाओं का दोहन करने और उन्हें उकसाने में भी लगे रहे हैं, जिसके चलते हरियाणा की लाखों एकड़ भूमि आज भी प्यासी है। हर चुनाव से पहले एसवाईएल का मुद्दा दोनों राज्यों के किसानों को बरगलाने के लिये उछलता है  और फिर शांत हो जाता है। कृषि प्रधान हरियाणा व पंजाब के बीच पानी के बंटवारे को लेकर यह संकीर्णता दुर्भाग्यपूर्ण ही कही जायेगी। यूं तो देश के अन्य भागों में नदियों के पानी के बंटवारे को लेकर विवाद सामने आते रहते हैं, लेकिन एसवाईएल का विवाद लगातार जटिल होता रहा है। वर्ष 1982 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पंजाब में नहर निर्माण कार्य को हरी झंडी दिखायी थी। कालांतर इसके विरोध और संकीर्ण राजनीति ने पंजाब में उबाल ला दिया। इस घटनाक्रम का गवाह इतिहास है।
पंजाब में राजनेताओं की दलील रही है कि राज्य में पानी के संकट को देखते हुए किसानों के हिस्से का पानी हरियाणा को नहीं दिया जा सकता। जिसकी वजह से हरियाणा में बनी नहर समय के साथ जर्जर होती जा रही है और खेत प्यासे खड़े हैं। विडंबना यही है कि लंबे अरसे से लंबित इस विवाद के समाधान की प्रभावी कोशिश केंद्र सरकारों की तरफ से भी नहीं हुई। कई बार ऐसा हुआ कि पंजाब, हरियाणा व केंद्र में एक दल की सरकारें थीं। तब विवाद के समाधान की ईमानदार कोशिश क्यों नहीं हुई? दरअसल, एक ही दल के नेता राज्य में दूसरी भाषा बोलते हैं और केंद्र में जाकर दूसरी, जो राजनेताओं की नीयत पर सवालिया निशान लगाता है। सवाल यह भी है कि चुनाव से ठीक पहले ही यह मुद्दा क्यों सुर्खियों में आता है? यहां तक कि पंजाब में पिछले विधानसभा चुनाव से ठीक पहले अकाली सरकार ने वोट की फसल काटने के लिये एसवाईएल नहर के लिये अधिगृहीत जमीन किसानों को लौटा दी थी। इतना ही नहीं, उस समय विपक्षी कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने एसवाईएल नहर को पाटने का काम शुरू कर दिया था। इससे पहले मौजूदा मुख्यमंत्री कैप्टन अमरेंद्र सिंह ने वर्ष 2004 में अपने पिछले कार्यकाल के दौरान हरियाणा के साथ पानी के बंटवारे संबंधी वर्ष 1981 के समझौते को ही निरस्त कर दिया था। ऐसी संकीर्णताओं के बीच एसवाईएल को अंजाम तक पहुंचाना बेहद मुश्किल लगता है। ऐसे में केंद्र सरकार द्वारा मामला सुलझाने की पहल व कोर्ट की सक्रियता के बावजूद एसवाईएल के भविष्य के बारे में निष्कर्ष देना कठिन लगता है। ऐसे में उम्मीद की जानी चाहिए कि राजनेता संकीर्णताओं से मुक्त व्यापक जनहित में आम राय बनाने की कोशिश करेंगे। सुप्रीमकोर्ट इस मामले में  अगली सुनवाई तीन सितंबर को करेगा।


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