किताबों से दोस्ती !    'किसी कमज़ोर पर कभी मत हंसना' !    बुज़ुर्गों के अधिकार !    ओ रे... कन्हैया !    गुस्से से मिली सीख !    लज़्जत से भरपूर देसी ज़ायका !    नयी खोजों का दौर जारी !    सार्वजनिक स्थल पर शिष्टाचार !    व्रत-पर्व !    बच्चों को सिखायें डे टू डे मैनर्स !    

अंगदान  जिंदगी का तोहफा

Posted On July - 29 - 2019

अदिति टंडन
भारतीय परिवार अंगदान को लेकर बनी अपनी अवधारणाएं तोड़ने लगे हैं, हालांकि इसकी दर पश्चिमी मुल्कों के मुकाबले शोचनीय रूप से कम है। इस तथ्य के बावजूद कि एक मृत देह से मिले अंग कम-से-कम 8 लोगों की जिंदगी बचाने में सहायक होते हैं, फिर भी यह महत्वपूर्ण बात लोगों को किसी दुर्घटना या अन्य घटनाओं में मृत हुए अपने रिश्तेदार के अंगदान-घोषणापत्र पर हस्ताक्षर करने को प्रेरित नहीं करती है। मृत देह से अंगदान करने की दर में भारत का स्थान विश्व में सबसे निचले पायदान पर है और यह आंकड़ा प्रति 10 लाख व्यक्तियों पर महज एक है, जबकि स्पेन और क्रोएशिया में यह गिनती क्रमशः 46.9 और 38.6 है।
पिछले साल भारत ने अंगदान पर स्पेन के मॉडल को अपनाया था। इस प्रयास के नतीजे अगले साल से पता चलने शुरू होंगे। तब तक अंगदान पर जागरूकता बनाना ही इस दिशा में प्रयास का मुख्य जरिया रहेगा। स्वास्थ्य मंत्रालय के अंतर्गत अंगदान पर बनाए गए शीर्ष विभाग ‘भारतीय अंग एवं उत्तक प्रत्यारोपण संस्थान’ की निदेशक वसंती रमेश कहती हैंः ‘भारतीय लोग अंगदान पर सहमति देने पर झिझकते हैं, इस नकारात्मकता के पीछे की मुख्य वजहों में अंगदान को लेकर बनी मिथकें, फिजूल अवधारणाएं, कतिपय धार्मिक मान्यताएं, अंगों और उत्तकों को लेकर जानकारी में कमी एवं अंगदान को वर्जित सरीखा मानना है।’ उक्त संस्थान ने राष्ट्रीय स्तर पर अंगदान के इच्छुकों का लेखाजोखा रखना शुरू किया है। लगभग 14 लाख लोगों ने अलग-अलग किस्म के अंगदान करने की इच्छा व्यक्त की है। यह लेखा वर्ष 2015 से बनना शुरू हुआ है और हमारी आबादी के हिसाब से दानकर्ताओं की संख्या बहुत कम है। इसलिए राष्ट्रीय संस्थान ने राज्यों के ‘अंग एवं उत्तक प्रत्यारोपण’ संस्थानों के साथ मिलकर इस संबंध में जागरूकता फैलाने के लिए ऑनलाइन अभियान चलाया है।
चिकित्सकीय विशेषज्ञ कहते हैं कि अंगदान दो तरीके से किया जा सकता है। पहला, कोई भी जीवित इनसान, जो 18 साल से ऊपर हो, वह अपने जीवनकाल के दौरान इसका प्रण कर सकता है और दूसरा तरीका है, हृदयाघात या मस्तिष्क के काम बंद करने से मृत हुए व्यक्ति के रिश्तेदार उसके किसी एक या कई अंगों का दान करें। दिल्ली के एक अस्पताल के प्रत्यारोपण समन्वयक का कहना है ः ‘मृत देह से दिल, आंख के दोनों कोर्निया-गुर्दे, पेनक्रियाज (अग्नाशय), अांतें और लीवर (जिगर) का भाग निकालकर जरूरतमंद रोगी को लगाया जा सकता है।’
ऐसा व्यक्ति जो ब्रेन डेड है, लेकिन दिल काम कर रहा है और अभी भी लाइफ-स्पोर्ट सिस्टम पर हो, उसके अंग प्रत्यारोपण को लेकर अनेक तरह की अवधारणाएं व्याप्त रही है। ऐसे हालात से गुजर रहे व्यक्ति के रिश्तेदारों को समय रहते अंगदान के बारे में जागरूक करने से हालात में पिछले कुछ समय से हल्का-सा सुधार आना शुरू हुआ है और इससे विश्व अंगदान सूची में भारत का स्थान ऊपर आने में मदद मिलेगी। पंचकूला निवासी राजबीर सिंह को सितंबर 2017 में पुत्र-शोक हुआ था। उन्होंने बताया ः ‘कोच्ची में जब बेटे की मरणासन्न अवस्था में चिकित्सकों ने अंगदान के बारे में हमें परामर्श दिया था, हालांकि इस सुझाव को स्वीकार करने में हमें कुछ समय तो लगा, लेकिन महसूस हुआ कि यही करना ठीक रहेगा। अतएव हमने बेटे का दिल, जिगर और दोनों गुर्दे दान कर दिए। नतीजतन आज चार लोग उसकी वजह से जीवित हैं। अतुल खुद भी एक नियमित रक्तदाता थे।’ 23 वर्षीय अतुल पवार पहले कमीशंड नौसेना अफसर थे, जिनके अंग प्रत्यारोपण के लिए गए थे। दुर्घटना के समय वे सब-लेफ्टिनेंट के रूप में नौसेना के जंगी जहाज ‘द्रोणाचार्य’ पर नियुक्त थे। उनके परिवार को अपने बेटे द्वारा भलाई करने की विरासत को लेकर संतोष है। राजबीर कहते हैं, ‘आज हमें इस बात की खुशी है कि हमारा बेटा चार रूहों में जिंदा है, मैं खुद भी एक नियमित रक्त एवं प्लेटलेट्स दानकर्ता हूं।’
भलाई करने वालों की इस जमात में अन्य लोग भी हैं, जो अंगदान की मिसाल से लोगों को जागरूक कर रहे हैं। ऐसे ही भरतपुर के अनिल कुमार हैं, जिन्होंने 22 जुलाई 2017 को दुर्घटना में मृत हुई अपनी बेटी दीपिका गुप्ता का दिल, जिगर और दोनों गुर्दे दान कर दिए थे। अपने संदेश में अनिल कहते हैं, ‘हरेक परिवार को अंगदान पर खुले मन और दिल से विचार रखने चाहिए, दूसरों को जिंदगी देने में इस कार्य का कोई समानांतर नहीं है। मेरी बेटी के अंगों ने 5 लोगों की जिंदगी बचाई है।’लेकिन इस किस्म की जागरूकता अभी बहुत कम है। इस साल 8 जुलाई को मानव अंग प्रत्यारोपण अधिनियम लागू होने की 25वीं वर्षगांठ पर ‘मानव अंग एवं उत्तक संस्थान’ ने ऑनलाइन अभियान के जरिए कोशिश की थी कि 100 करोड़ भारतीयों से अंगदान का आह्वान किया जाए, जिससे कम-से-कम 10 लाख लोग अंगदान का प्रण लें। लेकिन संस्थान के मुखिया रमेश कहते है, ‘उस दिन हमें केवल 746 आवेदन ही प्राप्त हो पाए। हालांकि, देशभर की राज्य इकाइयों से अंतिम आंकड़ें अभी आने बाही हैं। शायद सूची में कुछ सुधार हो पाए।’
आम लोगों में बहुत से लोगों को यह तक नहीं पता कि वे किस तरह अंगदान कर सकते हैं या अंगदान आने वाले समय में देश-समाज के लिए कितना जरूरी है, क्योंकि भारत में गैर-छूत रोग का बोझ और सड़क दुर्घटनाओं की संख्या में इजाफा हो रहा है। वर्ष 2018 में देशभर में लगभग 4.61 लाख सड़क दुर्घटनाएं दर्ज की गई थीं, जिनमें 1.49 लाख मौतें हुई हैं। अंगदान को लेकर यदि संतोषजनक जागरूकता हो जाए तो चिकित्सा विशेषज्ञ सड़क हादसे के प्रति एक मृतक की देह से लिए अंगों से आगे 8 जिंदगियों को बचा सकते हैं, बशर्ते उनके परिवार सहयोग करें। तथापि प्रत्यारोपण के िलए अंगों की वार्षिक मांग और उनकी उपलब्धता के बीच इतना बड़ा अंतर है, जिसे भर पाना फिलहाल संभव नहीं है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि प्रत्येक साल अंगों की मांग इस प्रकार है ः गुर्दे (2.5 लाख), जिगर (80,000) दिल (50,000), कॉर्निया (1 लाख), तो वहीं इनकी वास्तविक उपलब्धता है ः गुर्दे (160), कलेजा (33), दिल (45) और कॉर्निया (2,188)!
देखना यह है कि अंगदान की भारी किल्लत पर समाज क्या रुख अपनाएगा। इसी बीच सरकार इसको बढ़ावा देने लिए यथेष्ठ प्रेरणापुंज (ब्रांड एम्बेसडर) व्यक्तित्व की कमी से जूझती रहेगी। जब अभिनेत्री एेश्वर्या राय ने कुछ साल पहले अपनी आंखें दान देने की घोषणा की थी तो उसके बाद कुछ समय के लिए कॉर्निया के दान में इफाजा हुआ था, लेकिन बाद में यह संख्या फिर से कम होती गई। कुल मिलाकर, अभी भी उस एक अदद ब्रांड एम्बेसडर की तलाश है, जो समाज में अंगदान के पुनीत कार्य की स्वीकार्यता को बढ़ा पाए। जैसा कि रमेश कहते है, ‘इस कार्य के लिए प्रतिबद्धता रखने वाली ऐसी शख्सियत पा लेने के बाद हम उसे अपना ब्रांड एम्बेेडर बनाने पर विचार कर सकते हैं।’ हालांकि सरकार को अभी तक ऐसा व्यक्तित्व मिल नहीं पाया है।

जो मर कर भी दूसरों में जिंदा हैं
प्रियांक गुप्ता (दाएं) मध्यप्रदेश में अपनी बहनों के साथ। वर्ष 2017 में प्रियांक की एक सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी। उनके पिता द्वारका प्रसाद गुप्ता ने प्रियांक की मौत के बाद उनके अंग दान कर दिए। वे तो अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन कई लोंगों को नया जीवन दे गए।

ये हैं राजस्थान की दीप्ति गुप्ता। वर्ष 2017 में एक सड़क हादसे में उनकी मौत हो गई थी। उनके पिता अनिल गुप्ता ने उनके हार्ट, लीवर और दो किडनी दान कर दी। दीप्ति मरने के बाद भी अपने अंगों से पांच लोगों को नयी जिंदगी दे गयी।

अतुल पवार (नौसेना की यूनिफॉर्म में ) अपने परिवार के साथ। नौसेना में सब-लेफ्टिनेंट अतुल की वर्ष 2017 में सड़क हादसे में मौत हो गई थी। उनके पिता राजबीर सिंह पवार (दाएं से पहले) ने अतुल के अंग दान कर दिए। वे आज अपने अंगाें से 4 लोगों में जिंदा हैं।

किस उम्र में कौन से  अंग दिए जा सकते हैं
अंगदान करने वाले जीवित व्यक्ति की उम्र 18 साल से कम नहीं होनी चाहिए। 70 साल तक के मृतक के किडनी और लिवर, 50 साल तक के मृतक के दिल और फेफड़े, 60 से 65 साल तक के मृतक के अग्नाशय, आंतें और 100 साल तक के मृतक के कार्निया और स्किन दान किए जा सकते हैं।

जीवित अंगदाता : 18 साल से ऊपर जीवित व्यक्ति अपना
एक गुर्दा (शरीर को सुचारु रखने में एक गुर्दा काफी है), इसी तरह जिगर का कुछ भाग जिंदा रहते हुए भी दे सकता है।
मृतक अंगदाता : एक मृतक व्यक्ति के भी काफी अंग दान किए जा सकते हैं और इनसे कई लोगों की जिंदगियां बच सकती हैं।


Comments Off on अंगदान  जिंदगी का तोहफा
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading...
Both comments and pings are currently closed.

Comments are closed.

Powered by : Mediology Software Pvt Ltd.