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हिंदी हैं हम तो विरोध क्यों?

Posted On June - 10 - 2019

गोविंद सिंह

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पिछली सरकार ने नयी शिक्षा नीति लाने के लिए विशेषज्ञों और जनता से सुझाव मांगे थे। आप कहेंगे इस नयी शिक्षा नीति की आवश्यकता क्या थी? आमतौर पर वर्ष 2014 से पहले कांग्रेस पार्टी द्वारा रचित शिक्षा नीति चल रही थी। भाजपा या दक्षिणपंथी विचार वालों का यह मानना रहा है कि कांग्रेस जनित शिक्षा नीति के रूप में वास्तव में 1837 में लागू लॉर्ड मैकाले की शिक्षा नीति ही चल रही थी, जिसका सबसे प्रमुख मकसद था- भारतीय जीवन मूल्यों को नीचा दिखाकर पाश्चात्य जीवन मूल्यों को ऊंचे पायदान पर स्थापित करना। आजादी के बाद भले ही इसमें थोड़ी-बहुत लीपापोती हुई हो, लेकिन इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि मूल तत्व वही रहा। नतीजा यह हुआ कि हम अपनी शिक्षा और अपने जीवन-मूल्यों से दूर होते चले गए। भारतीय भाषाओं का पराभव और अंग्रेजी का वर्चस्व इसका सबसे प्रबल उदाहरण है। अपने देश में पाश्चात्य शिक्षा का एक ऐसा अभेद्य दुर्ग बना दिया गया कि उसे तोड़ पाना लगभग असंभव-सा लगने लगा। बीच में, अटल बिहारी वाजपेयी की गठबंधन सरकार ने इसकी चूलें हिलाने की असफल कोशिश की, लेकिन वह कुंभकर्ण के शरीर में च्यूंटी काटने जैसा था। इसलिए वर्ष 2014 में सत्ता में आने पर मोदी सरकार ने इस दिशा में गंभीरता से प्रयास किया। देशभर से सुझाव आए। राष्ट्रव्यापी कवायद शुरू हुई। उन्हीं में से एक सुझाव यह भी था कि वर्ष 1968 में कोठारी आयोग ने जो त्रिभाषा सूत्र शिक्षा की बेहतरी के लिए दिया था, यदि वह ईमानदारी से लागू हो गया होता तो शिक्षा की बहुत-सी दिक्कतें दूर हो गईं होतीं। वैसे कहने को वह सूत्र भी लागू हो गया था, चूंकि अपने देश में शिक्षा राज्य सूची और समवर्ती सूची का विषय है, इसलिए जिन राज्यों को लगा कि यह सूत्र अच्छा है, उन्होंने लागू कर दिया और जिन्हें यह उचित नहीं लगा, उन्होंने छोड़ दिया। तब की केंद्र सरकारों ने इसे लागू करने की कोशिश ही नहीं की। जो कुछ भी किया, आधे-अधूरे मन से किया।
यहां यह जानना जरूरी है कि यह त्रिभाषा सूत्र क्या है? और यह क्यों जरूरी है? पहले जरूरत पर आते हैं। यह सामान्य मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि बच्चे को अपनी मातृभाषा में ज्ञान हासिल करने में सबसे ज्यादा आसानी होती है। साथ ही यह भी सच है कि मनुष्य के दिमाग का विकास 12 वर्ष तक सबसे ज्यादा होता है और इस दौर में वह एक साथ तीन-चार भाषाएं तक सीख सकता है। लेकिन बच्चे का सहज विकास उसकी मातृभाषा में ही होता है। इसी सिद्धांत पर तमाम यूरोपीय देशों के बच्चे अपनी भाषा को तो सीखते ही हैं, साथ ही अपने पड़ोसी देशों की भाषाएं भी सीख लेते हैं। अपने देश में इसके विपरीत अंग्रेजी का ही वर्चस्व रहा है। यही नहीं, अंग्रेजी शिक्षा बच्चे में अपने स्वदेशी मूल्यों के प्रति एक हीन भावना को भी जन्म देती है, जिससे उबरने में कई बार पूरी जिंदगी लग जाती है। यहां अग्रेजी जाने बिना व्यक्ति को शिक्षित ही नहीं माना जाता। इन्हीं विकृतियों को देखते हुए 1961 में मुख्यमंत्रियों के एक सम्मेलन में यह त्रिभाषा सूत्र उभर आया। उसके बाद 1968 में प्रो. डीएस कोठारी की अध्यक्षता में बने शिक्षा आयोग ने भी इसे अपना लिया और उसके बाद राष्ट्रीय शिक्षा नीति के संकल्प के जरिये इसे लागू कर दिया गया। इसके तहत हिंदी, अंग्रेजी और एक आधुनिक भारतीय भाषा का शिक्षण अनिवार्य कर दिया गया।
दक्षिण भारतीय राज्यों को एक आधुनिक भारतीय भाषा के रूप में अपनी भाषा को पढ़ाना था तो उत्तर भारतीय राज्यों को कोई एक दक्षिण भारतीय भाषा पढ़ानी थी। तमिलनाडु ने इसे नहीं माना। अन्य अहिंदी भाषी राज्यों ने भी आधे-अधूरे मन से तीसरी भाषा के रूप में हिंदी को अपनाया। दगाबाजी हिंदी भाषी राज्यों ने भी की। उन्होंने दक्षिण भारतीय भाषा को पढ़ाने की बजाय संस्कृत को अपनाया, जिसे किसी भी अंदाज से आधुनिक नहीं कहा जा सकता। इसने उत्तर-दक्षिण के बीच खाई को और चौड़ा कर दिया। यानी त्रिभाषा सूत्र हमेशा प्रासंगिक बना रहा, इसीलिए मोदी सरकार द्वारा तैयार नयी शिक्षा नीति के मसौदे में भी इसका उल्लेख हुआ। सच बात यह भी है कि जनवरी में ही यह खबर आ गई थी कि सरकार त्रिभाषा सूत्र को लागू करना चाहती है, लेकिन तब किसी ने कुछ नहीं कहा।
अब चूंकि मोदी पुनः सत्ता में आ गए हैं, इसलिए विरोध के लिए विरोध हो रहा है। द्रविड़ मुनेत्र कष्गम (डीएमके) ही नहीं, राजनीति के समुद्र में गायब हो चुके राज ठाकरे को भी इसके खिलाफ बोलने का मौका मिल गया। अंततः राष्ट्रीय शिक्षा नीति की मसौदा समिति के अध्यक्ष के. कस्तूरी रंगन समेत 2 कैबिनेट मंत्रियों निर्मला सीतारमण और एस जयशंकर आगे आए और उन्होंने स्पष्ट किया कि मसौदे में अनिवार्यता जैसी कोई चीज नहीं है।
गौरतलब है कि ये तीनों ही तमिल भाषी हैं। दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, चेन्नई के कुलपति डॉ. राममोहन पाठक कहते हैं कि इससे हिंदी विरोधी आंदोलन की हवा निकल गई है। सच्चाई यह भी है कि दक्षिण में आज पहले की तुलना में कहीं ज्यादा लोग हिंदी पढ़ रहे हैं।

तमिलनाडु में इसलिए होती है खिलाफत
हिंदी का तमिलनाडु से ही विरोध होने का पहला कारण तो यह है कि तमिल अपनी भाषा को संस्कृत से भी पुरानी मानते हैं। इसलिए यदि कोई भी भाषा राष्ट्र भाषा बन जाये, वहां उसका विरोध होगा ही। तमिलनाडु की इस हिंदी विरोधी ग्रंथि को भांपते हुए ही संभवतः गांधीजी ने दक्षिण भारत में हिंदी को प्रचारित करने का बीड़ा उठाया था। उन्होंने 1918 में ही मद्रास में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की स्थापना कारवाई। अपने बेटे देवदास गांधी को मद्रास भेजा। सी राजगोपालाचारी, जो दक्षिण भारत के सबसे बड़े राजनेता थे, उनका संरक्षण मिला। रामास्वामी नायकर जैसे द्रविड़ नेता तब हिंदी समर्थक बन गए थे। इनके अलावा, उस समय के तमाम बड़े नेता हिंदी प्रचार से जुड़े। आजादी के बाद 1949 में जो संविधान बनकर तैयार हुआ उसमें भी हिंदी को राजभाषा बनाया गया तो दक्षिण के तमाम बड़े नेताओं का पूरा समर्थन प्राप्त हुआ था, लेकिन विडम्बना यह है कि वर्ष 1960 तक आते-आते तमिलनाडु हिंदी विरोधियों का गढ़ बन गया।
दरअसल, 1949 में सबके सामने राष्ट्र निर्माण का सपना था। वर्ष 1960 तक आते-आते इस सपने पर राजनीति हावी हो गई। 1950 से 1960 तक केंद्र सरकार को हिंदी को राजभाषा बनाने के लिए जो तैयारियां करनी चाहिए थीं, वे नहीं हुईं। संविधान में अनुच्छेद 343 स्पष्ट कहता है कि हिंदी राजभाषा होगी और अंग्रेजी सह राजभाषा, लेकिन जब तक हिंदी को राजभाषा बनाने की तैयारियां पूरी नहीं हो जातीं, अंग्रेजी राजभाषा बनी रहेगी। चूंकि इस विचार को प्रधानमंत्री नेहरू का समर्थन नहीं था, इसलिए उन्होंने हिंदी को लागू करने के लिए कोई प्रयास ही नहीं किए। बाद में जब राजभाषा आयोग बना और भाषावार प्रान्तों के गठन की बात हुई तो तमिलनाडु में हिंदी विरोधी दंगों को भड़का दिया गया। इस तरह हिंदी के मुद्दे को हमेशा के लिए दबा दिया गया। उसके बाद नख-दंतविहीन राजभाषा अधिनियम बना। उसमें संशोधन हुए, लेकिन ये सब लीपापोती से अधिक कुछ नहीं थे। हिंदी आज तक लागू नहीं हो सकी। यानी हिंदी के साथ हमेशा से ही राजनीति खेली गई। कभी अंग्रेजों ने उसे उर्दू से लड़वाया। आज़ादी के आंदोलन के दौरान हिंदी और हिंदुस्तानी का झगड़ा मुखर रहा। कांग्रेस के भीतर ही गांधी-नेहरू और राजर्षि टंडन के बीच तनाव खुलकर सामने आ गया था। आज़ादी के बाद कहा गया कि हिंदी राष्ट्र या राजभाषा के काबिल ही नहीं है। जो भाषा देश की 50 प्रतिशत से भी अधिक जनता की भाषा हो, जिसे 80 प्रतिशत जनता समझती हो, दुनिया में जिसके समझने वालों की संख्या दूसरे नंबर पर हो, उसे मखौल की भाषा बनाकर रखा गया। उसे राज-काज की भाषा नहीं बनने दिया जाता। बिल्ली और बंदर का खेल जारी है। आज हिंदी मीडिया की भाषा है, मनोरंजन की भाषा है। उसमें व्यापार भी हो रहा है, लेकिन उसे स्कूलों में लागू नहीं होने दिया जा रहा। जिस देश के केंद्रीय विद्यालयों में चुपचाप जर्मन भाषा को दूसरी भाषा के रूप में लागू कर दिया जाता है, उस देश में हिंदी तीसरी भाषा भी नहीं बन सकती, क्योंकि उन्हें डर है कि कहीं बच्चे उसे पढ़ लेंगे तो उनके पैर तले की जमीन खिसक जाएगी!

दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा
दक्षिण और उत्तर भारत के बीच की खाई को दूर करने के लिए महात्मा गांधी शुरू से ही चिंतित थे। 1915 में उन्होंने अपने साबरमती आश्रम में काम करने वाले तिरुनेल्वेलि के हरिहर शर्मा और मद्रास के शिवराम शर्मा को हिंदी सीखने के लिए प्रयाग भेजा, जहां राजर्षि टंडन की देख-रेख में चल रहे हिंदी साहित्य सम्मेलन में उन्होंने हिंदी सीखी। वर्ष 1918 में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की स्थापना की गई। गांधीजी ने अपने पुत्र देवदास गांधी को इस कार्य के लिए मद्रास भेजा और राजाजी के घर पर रह कर शुरुआत में उन्होंने यह काम किया। राजाजी के अतिरिक्त कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पट्टाभि सीतारमैया, नागेश्वर राव, श्रीनिवास अयंगर, रामस्वामी नायकर जैसे तमाम दक्षिण के बड़े नेता इस कार्य से जुड़ गए। 1948 में अपनी मृत्युपर्यंत गांधीजी इसके अध्यक्ष बने रहे। बाद में बाबू राजेंद्र प्रसाद, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, नरसिंहा राव सहित कई नेता इसके अध्यक्ष रहे। यह संस्था दक्षिणी राज्यों में हिंदी सीखने-सिखाने का काम करती है। भले ही सरकारें अपने स्कूलों में हिंदी नहीं पढ़ाती, हिंदी प्रचार सभा की परीक्षाएं देकर आप दूरस्थ माध्यम से हिंदी सीख सकते हैं। अब तक लाखों छात्र यहां से हिंदी सीख चुके हैं। अब यह केंद्र सरकार का एक मानित विश्वविद्यालय है। इसके कुलपति प्रो. राम मोहन पाठक बताते हैं कि यहां हर माह हिंदी मेला लगता है। सैकड़ों की संख्या में लोग मेले में आते हैं। हिंदी यहां चुपचाप आगे बढ़ रही है। तमिलनाडु के निजी स्कूलों में भी तेजी से हिंदी पढ़ाई जा रही है। चेन्नई के अलावा दक्षिण के अन्य राज्यों में भी अब इसी तरह की संस्थाएं काम कर रही हैं।

लगातार बढ़ रहे हिंदी  सीखने वाले विद्यार्थी
बेशक तमिलनाडु में हिंदी का विरोध हो रहा है, लेकिन यहां सीबीएसई से मान्यता प्राप्त स्कूलों की संख्या बढ़ने के साथ-साथ हिंदी सीखने वाले स्टूडेंट्स की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है। इन स्टूडेंट्स के पेरेंट्स का मानना है कि बच्चों के बेहतर करिअर विकल्प के लिए तमिल और अंग्रेजी ही काफी नहीं है। दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के माध्यम से स्वेच्छा से हिंदी सीखने वाले छात्रों की संख्या 2009-10 के बाद से लगातार बढ़ रही है। इसका मुख्य कारण समैचर कालवी (समान राज्य पाठ्यक्रम) अनिवार्य करना और सीबीएसई स्कूलों का फलना-फूलना है। 10 साल पहले राज्य में सीबीएसई से मान्यता प्राप्त स्कूल जहां केवल 98 थे, वहीं अब 950 संस्थान सीबीएसई से मान्यता प्राप्त हैं। इस अवधि के दौरान हिंदी प्रचार सभा की ओर से लिए जाने वाले एग्जाम में बैठने वाले अभ्यर्थियों की संख्या 2 लाख से बढ़कर 5.7 लाख पहुंच गई है। इनमें 80 फीसदी स्कूल स्टूडेंट हैं। सभा की ओर से साल में दो बार प्रारंभिक टेस्ट ‘परिचय’ कराया जाता है। इस बार फरवरी में इस टेस्ट में 30 हजार अभ्यर्थी बैठे थे। जुलाई में इस टेस्ट के लिए आने वाले अभ्यर्थीयों की संख्या में कमी आती है, क्योंकि शिक्षा सत्र के शुरुआत में ज्यादातर अभ्यर्थी इस परीक्षा में शामिल नहीं होना चाहते।


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