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हर सांस पर ध्यान

Posted On June - 9 - 2019

सद‍्गुरु जग्गी वासुदेव
हमारे शरीर में चलने वाली सांस, एक यांत्रिक प्रक्रिया है, जो लगातार बिना रुके चलती है। यह बहुत आश्चर्यजनक है कि अधिकतर लोग इसके बारे में जागरूक हुए बिना ही जीते रहते हैं। लेकिन, एक बार जब आप सांस के बारे में जागरूक हो जाते हैं, तो यह एक अद‍्भुत प्रक्रिया बन जाती है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि आज ‘सांस को देखना’ संभवतः ध्यान की सबसे लोकप्रिय विधियों में से है। यह मूलभूत और सरल है। यह इतनी आसानी और स्वाभाविक रूप से होती है कि इसके लिए कोई तैयारी नहीं करनी पड़ती। अगर आप थोड़े से ज्यादा सचेत हो जाते हैं, तो आपकी सांस स्वाभाविक रूप से आपकी जागरूकता में आ जायेगी।
अधिकतर लोगों का ध्यान अपनी सांस की ओर तभी जाता है जब उनकी श्वास-नलियों में ऐंठन आ जाती है, या सांस ज्यादा तेजी से चलती है। वे अपनी सामान्य सांस को अनदेखा कर रहे हैं, सिर्फ इसलिए क्योंकि उनमें ध्यान देने की कमी एक गंभीर समस्या है।
अपने जीवन में, खासतौर पर अपने बच्चों के जीवन में, ध्यान की प्रवृत्ति लाना बहुत महत्वपूर्ण है। आखिर में, बात चाहे आध्यात्मिक हो या सांसारिक, दुनिया से आपको उतना ही मिलता है जितना आप ध्यान देने को तैयार हैं। सांस पर ध्यान देना वैसे तो एक जबरन प्रयास है। लेकिन यह आपको सचेत करने का एक तरीका भी है। महत्वपूर्ण चीज अपनी सांस पर ध्यान केंद्रित करना नहीं है, बल्कि अपनी जागरूकता के स्तर को इतना ऊंचा उठाना है कि आप स्वाभाविक रूप से अपनी सांस के प्रति सचेत हो जायें।
सांस लेना एक यांत्रिक प्रक्रिया है। मूल रूप से देखें तो जब भी आप सांस लेते या छोड़ते हैं, तो शरीर में स्पंदन होता है। जब तक आप अपने मनोवैज्ञानिक ढांचे में पूरी तरह मग्न हैं, तभी तक आपका ध्यान सांस पर नहीं होता। यदि अपनी भावनाओं या विचारों में पूरी तरह नहीं खोये हैं, और बस शांति से बैठते हैं, तो ऐसा कोई कारण नहीं कि आपका ध्यान सांस की प्रक्रिया पर न जाये। किसी चीज को अपनी जागरूकता में लाना कोई काम नहीं है। इसके लिए कोई प्रयास नहीं करना पड़ता।
वास्तव में, सांस एक बहुत बड़ी चीज है, बस आपको तब तक यह बात पता नहीं चलती, जब तक आप इसे खो नहीं देते। हम जब कोई खास प्रक्रिया सिखाते हैं तो लोगों को सांस पर ध्यान देने के लिए कहते हैं, क्योंकि उनमें जागरूकता का आवश्यक स्तर नहीं होता। लेकिन, आप यदि बस आराम से बैठें, तो ऐसा नहीं हो सकता कि अपनी सांस के प्रति सचेत न हों, जब तक कि आप अपने विचारों में खोये हुए न हों। तो अपने विचारों में खोये मत रहिये, इनका कोई खास महत्व नहीं है, क्योंकि यह बहुत सीमित जानकारी से आते हैं। आप अगर अपनी सांस के साथ रहें, तो यह आपको एक बड़ी सम्भावना की ओर ले जा सकता है। अभी तो सांस की प्रक्रिया ही ज्यादातर लोगों की जागरूकता में नहीं होती। वे सिर्फ अपने नथुनों या फेफड़ों में हवा के आवागमन के कारण हो रही हलचल को ही जान पाते हैं।
आप अगर बस बैठते हैं या लेटते हैं, एकदम स्थिर होकर, तो आपकी सांस एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया बन जायेगी। वास्तव में, सांस एक बहुत बड़ी चीज़ है, बस आपको तब तक यह बात पता नहीं चलती जब तक आप इसे खो नहीं देते।
आपने ‘भज गोविन्दम’ मंत्र सुना होगा जिसमें यह भी आता है, ‘निश्चल तत्वं, जीवन मुक्ति’। इसका अर्थ है कि अगर आप बिना विचलित हुए, किसी एक ही वस्तु पर लगातार ध्यान देते हैं, तो मुक्ति को, मुक्ति की संभावना को आपके लिए नकारा नहीं जा सकता।
दूसरे शब्दों में मनुष्य की मूल समस्या ध्यान की कमी ही है। ध्यान देने के पैनेपन और तीव्रता से आप ब्रह्मांड का कोई भी दरवाजा अपने लिए खोल सकते हैं। यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप का ध्यान कितना पैना और तीव्र है, और इस ध्यान के पीछे कितनी ऊर्जा है? इस संदर्भ में सांस एक सुंदर साधन है, क्योंकि यह हमेशा ही चलती रहती है। जब तक हम जीवित हैं, सांस हर समय उपस्थित है। बस आपको उसके प्रति सचेत होना है।

(isha.sadhguru.org से साभार)


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