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स्नान-दान का महापर्व गंगा दशहरा

Posted On June - 9 - 2019

ओपी शर्मा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार राजा भगीरथ ने अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए पतित-पावनी मां गंगा के पृथ्वी लोक पर अवतरण हेतु घोर तपस्या की। कई वर्ष बीतने के पश्चात मां गंगा भगीरथ की तपस्या से प्रसन्न हो गयीं। फलस्वरूप भगवान शिव की जटाओं में अधिष्ठित होकर मां गंगा अपने भक्त की पुकार पर स्वर्ग लोक से पृथ्वी लोक पर अवतरित हो गयीं। इस प्रकार मां गंगा ने भगीरथ के वंशजों का उद्धार किया। मां गंगा के अवतरण दिवस को गंगा दशहरा के रूप में मनाया जाता है। मान्यता है कि इस दिन गंगा में डुबकी लगाने से पापों का क्षय हो जाता है।
यह परम पावन पर्व प्रत्येक वर्ष ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की दशमी को मनाया जाता है। इस महोत्सव का शुभारंभ दशमी तिथि से करीब 10 दिन पहले ही हो जाता है। गंगा दशहरा उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल सहित देश के कई प्रांतों में मनाया जाता है।
इस दिन देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु गंगा स्नान के लिए ऋषिकेश, हरिद्वार, वाराणसी, गढ़ मुक्तेश्वर, पटना समेत विभिन्न तीर्थ स्थलों पर पहुंचते हैं। इस अवसर पर श्रद्धालु विधिवत रूप से मां गंगा का पूजन, अर्चन करते हैं। गंगा किनारे आरती का आयोजन किया जाता है। वृत्ताकार रूप में दीप जलाकर मां गंगा की आराधना की जाती है। इस अवसर पर दान का भी अपना एक विशेष महत्व है। इसलिए
कई श्रद्धालु जीवन में सुख, शांति के लिए जरूरतमंदों को कपड़े, धूप से बचने के लिए छाता, जूते देते हैं। अन्न दान भी करते हैं। मां गंगा का उद‍्गम स्थान हिमालय है। गंगोत्री से लेकर बंगाल की खाड़ी में समाहित होने तक कई पड़ाव पार करती हुई कल-कल बहती मां गंगा अपने निर्मल पावन जल से जहां प्राणिमात्र के पापों का क्ष्ाय करती हैं, वहीं उनके भरण पोषण के लिए जल प्रदान कर जीवन को गति प्रदान करने में सहायक सिद्ध होती हैं।


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